रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ रामायणमीमांसा दशम टिट्टिभसर की कथा यों है—किसी टिट्टिभी के सतीत्व को प्रमाणित करने के लिए लोकपालों ने टिट्टिभ-सरोवर का निर्माण किया था । आश्रम के कुछ ऋषियों के अनुसार उस टिट्टिभ-सरोवर के पास जाकर सीता अपने सतीत्व की शपथ खाकर जल ने प्रवेश करती है । इसपर पृथ्वी देवी प्रकट होकर सीता को अपनी गोद में लेकर सरोवर के उस पार पहुँचाती है । यह देखकर ऋषि लोग सीता के सतीत्व के प्रति विश्वस्त होकर राम को शाप देना चाहते हैं, परन्तु सीता के अनुरोध पर वे वैसा नहीं करते । इसमें लव के जन्म के बाद कुश के अलौकिक जन्म की कथा है । लव और कुश का रामसेना से युद्ध, राम और सीता के मिलन पर कथा की सुखान्त समाप्ति होती है । वस्तुतः प्रामाणिक ऐतिहासिक कथा वाल्मीकिरामायण की ही है। पुराणों तथा संहिताओं की अनेक कथाएँ अनेक भिन्न कल्पानुसारिणी हैं । पर्याप्त कालातिक्रमण के कारण अनेक काल्पनिक कथाएँ भी उनमें जुड़ गयी हैं। बहुत कवियों ने अपनी वाणी पवित्र करने के लिए, बहुतों ने विनोदवशात् एवं बहुतों ने अद्भुत-रस-वर्णन की दृष्टि से विभिन्न कल्पनाएँ की हैं, पर इतनेमात्र से राम की प्रामाणिक कथा कल्पनामात्र नहीं हो जाती है । किन्तु वह परम सत्य एवं महर्षि वाल्मीकि द्वारा ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा अनुभूत है । २५५ वां अनु० : चम्पूरामायण (११वीं शती) विदर्भ के राजा भोज की कृति है । वह वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य-पाठ के अनुसार है । इसमें भोजकृत ५ काण्ड हैं; छठे युद्धकाण्ड का निर्माण लक्ष्मणभट्ट ने किया है । उत्तररामायणचम्पू की रचना वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार हुई है । २५६ वाँ अनु० : वासुदेव ने (१७वीं शती) रामकथा में ६ काण्डों की संक्षिप्त कथा वाल्मीकिरामायण के अनुसार गद्य में लिखी है । इसमें महाभारत के रामोपाख्यान के अनुसार मन्थरा एक दुन्दुभी नाम की गन्धर्वी का अवतार थी तथा अहल्या के वास्तव में ही पत्थर बन जाने का उल्लेख है । पिटर्सन की संस्कृत हस्तलिपियों की सूची में एक अनन्तभट्टकृत रामकल्पद्रुम का भी नाम मिलता है ।