भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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एकादश अध्याय आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा द्राविड़ भाषाओं के साहित्य में रामकथा तमिलरामायण २५७ वाँ अनु० : कहा जाता है कम्बरकृतरामायण द्राविड़ भाषा का सबसे प्राचीन काव्यग्रन्थ ( १२ वीं- श० ई० का ) है। इनमें बाल्मीकिरामायण के छहों काण्डों की कथा-वस्तु के साथ अनेक नये वृत्तान्त जोड़े गये हैं। कम्बर के पूर्व ओट्टक्कूतन ने भी तमिल भाषा में रामायण लिखी थी। कम्बर की रामायण सुन कर वे अपना काव्य नष्ट कर रहे थे। कम्बर ने जाकर उत्तर-काव्य को बचाया। तमिलरामायण का उत्तर-काण्ड ओट्टक्कूतन का है। उसमें धोबी के कारण सीता-त्याग की कथा है। इसमें राम और लक्ष्मण के विश्वामित्र के साथ मिथिला में प्रवेश का स्वतन्त्र वर्णन है। विस्तृत मिथिला- वर्णन के पश्चात् इसमें सीता और राम एक दूसरे को देखते हैं और दोनों विरह-व्याकुल होते हैं (बालका० सर्ग १०) । इसके बाद जनक द्वारा राम का स्वागत तथा सीता-स्वयंवर वर्णित है। उसमें सपत्नीक दशरथ की यात्रा का विस्तृत वर्णन है। सीताहरण के वृत्तान्त में रावण सीता को स्पर्श करने के भय से पृथ्वी खोदकर भूमिभाग के साथ-साथ उन्हें ले जाता है ( अरण्यकाण्ड सर्ग ८ ) । युद्धकाण्ड में विभीषण नृसिंहावतार की कथा सुनाकर नारायणावतार राम से युद्ध न करने का रावण से अनुरोध करते हैं ( सर्ग ३ ) । एक राक्षस जनक का रूप धारण कर सीता से अनुरोध करता है कि वे रावण को पतिरूप में स्वीकार कर लें ( सर्ग १६ ) । इन्द्र का विडालरूप धारण करना, इन्द्र तथा अहल्या के प्रति गौतम का शाप, हनुमान् के भूषणों का उल्लेख, लक्ष्मण द्वारा दुन्दुभि के अस्थिकङ्काल का प्रक्षेपण, विभीषण की पुत्री के रूप में त्रिजटा का उल्लेख, मन्दोदरी का सहगमन, केवल लक्ष्मण का नागपाशबन्धन, मायासीता-वध आदि अंशों में वाल्मीकिरामायण से उसमें विभिन्नता है। भक्तिभावना से प्रेरित होकर अनेक रामायणों और संहिताओं के आधार पर वर्णित तथा भावना से साक्षात्कृत अंशों का वर्णन मान्य कृतियों में सम्भव होता है; परन्तु ऐतिहासिक तथ्य की दृष्टि से आर्ष बाल्मीकिरामायण तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों का ही अधिक महत्त्व है। तेलुगुरामायण २५८ वाँ अनु० : द्विपदरामायण १३ वीं शती की रचना मानी जाती है। यह बाल्मीकिरामायण के दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार है। इसमें कैकेयी का अपने पति द्वारा अपमानित होना, लङ्का-देवी-वृत्तान्त, रावण-सुग्रीव- युद्ध, अगस्त्य द्वारा राम को सूर्यस्तव का उपदेश, मैनाक, सुरसा, सिंहिका आदि का वर्णन दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार है। रङ्गनाथरामायण में ये सब विद्यमान हैं। उदीच्य पाठ की दशरथ-सागर-मैत्री, रावण-मन्दोदरी-संवाद आदि कथाएँ वर्णित हैं। पश्चिमोत्तर-पाठ के अनुसार कैकेयी के विद्याबल प्राप्त करने की कथा भी है। वाल्मीकिरामायण गौड़ीय पाठ के अनुसार द्विपदरामायण में भरत-हनुमान् का संवाद, इन्द्र द्वारा गौतम ऋषि की तपस्या भङ्ग करने के लिए अहल्या के सतीत्व को भङ्ग करना, जनक का यह कहना कि यज्ञ के समय हल चलाते समय मैंने सीता को एक मञ्जूषा में पाया, लक्ष्मण के द्वारा कुटी के चारों ओर सात रेखाएँ खींची जाने का