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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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वृत्तान्त तथा लक्ष्मण के जागरण के वृत्तान्त में मानवीकरण, समुद्र मन्थन के समय वालि-सुग्रीव द्वारा देवताओं की सहायता तथा तारा की उत्पत्ति, नल द्वारा वर-प्राप्ति, रावण के छत्र-चामरों पर राम द्वारा बाण चलाने का वृत्तान्त, सुलोचना के सहगमन की कथा, रावण की नाभि में अमृत की स्थिति, अयोध्या प्रत्यागमन के समय शिव- प्रतिष्ठा, सेतुभङ्ग आदि का वर्णन है। २५९-२६३ अनु० : उत्तररामायण, निर्वचनोत्तररामायण, भास्कररामायण, मोल्लरामायण, गोपीनाथ- रामायण आदि भी तेलुगु भाषा में रचित रामायण हैं। मलयालम में रामचरितसाहित्य २६४ अनु० : रामचरितम् तथा रामकथप्पाट्टु की रामकथाओं में बाल्मीकिरामायण का अनुसरण है। २६५ अनु० : कण्णश्शरामायण ( १४वीं शती ) वाल्मीकिरामायण का अनुवाद-मात्र है। उनमें अना- वश्यक वृत्तान्त छोड़ दिये हैं। रामायणचम्पू आदि भी १५वीं ई० शती के हैं। २६७ अनु० : अध्यात्मरामायण १५७५ ई० में संस्कृत अध्यात्मरामायण का मलयाली भाषा में अनुवाद- मात्र है। केरलवर्मा रामायण वाल्मीकिरामायण का अनुवाद है। कन्नड़ रामायण २६८ अनु० : ११ वीं ई० शताब्दी से कन्नड़ भाषा में एक विस्तृत जैन रामकथा साहित्य की सृष्टि होने लगी थी। १६वीं शती में तोरवेनिवासी नरहरि ने तोरवेरामायण लिखी है। मैरावण-कालग ( मैरावण का युद्ध ) भी उन्हीं का है। सोलहवीं शताब्दी का जैमिनिभारत कर्नाटक में अत्यन्त लोकप्रिय है। इस कथा में सीता-वनवास का अत्यन्त करुणापूर्ण वर्णन है। इसमें वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ का अनुसरण है। तोरवेरामायण भक्तिभाव से ओत-प्रोत है। इसमें आनन्दरामायण का भी अनुकरण है। इसमें रावण का शिव-धनुष के नीचे दब जाना, इन्द्र की माला के कारण वाली की अजेयता, ब्रह्मा के अनुरोध से हनुमान् का पूंछ बढ़ाना बन्द करना, रावण की दाढ़ी का जलना, अन्ध मुनि के पुत्र का ताण्डव, नाम, अत्रि द्वारा जयन्त को शाप, विष्णुमाया के रूप में मन्थरा का उल्लेख, जाबालि का वन में राम से मिलना, ओषधि-पर्वत का अपने आप अदृश्य हो जाना, विभीषण के स्पर्शमात्र से माया सीता के शव का अदृश्य हो जाना आदि इस रामायण की असाधारण सामग्री हैं। आदिवासियों में प्रचलित रामकथाएँ २७० अनु० : आदिवासियों के साहित्य सुरक्षित न होने से उनमें राम-कथा ढूँढ़ना व्यर्थ है। उनमें से कई जातियों में शबरी की कथा मिलती है। बोंडो जाति में सीता-त्याग की कथा में धोबी का वृत्तान्त विकृत रूप में मिलता है। २७१ अनु० : बिहार और बंगाल की संथाल जाति में निम्नोक्त कथाएँ मिलती हैं। गुरु के आज्ञानुसार आम खाकर दशरथ की पत्नियाँ गर्भवती हुई थीं। कैकेयी के गर्भ से भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ है। रावण- वध के बाद लौटकर राम ने संथालों के यहाँ रह कर एक शिव-मन्दिर बनाया था। उसमें वे सीता के साथ नित्य- प्रति पूजा करने आते थे। सीता की खोज के समय राम ने गिलहरी और बेर को वरदान दिया एवं बगुले को दण्ड दिया। शरच्चन्द्र रायकृत बिर्होर ग्रन्थ ( पृ० ४०५-४२७ ) में विर्होर जाति में प्रचलित रामकथा का वर्णन है। उसमें राम के जन्म से लेकर रावण तथा कुम्भकर्ण के वध तक का वृत्तान्त वर्णित है। इसमें दशरथ की सात पत्नियों का उल्लेख है। इसके अनुसार पहले दशरथ ने विश्वामित्र के साथ भरत और शत्रुघ्न को भेज दिया;