रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
२. द्वितीय काण्ड: अयोध्या एवं अरण्यकाण्ड: पितृ-आज्ञा, वनगमन व शूर्पणखा प्रसंग
२०४ रामायणमीमांसा षष्ठ ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥ (वा० रा० ५।५१।१०४) क्या किसी मनुष्य में इतनी शक्ति है कि उसके सामने युद्ध में ब्रह्मा; इन्द्र तथा रुद्र भी खड़े नहीं रह सकते हों ? राम स्वयं कहते हैं कि यदि इच्छा करूँ तो अंगुली के अग्रभाग से ही पृथ्वी के सम्पूर्ण पिशाच, दानव तथा राक्षसों को मार सकता हूँ। क्या किसी जीव में ऐसी शक्ति हो सकती है ? “सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥ (वा० रा० ५।१८।३३ ) अर्थात् जो एक बार भी मेरी शरणागति स्वीकार करता है और मैं तुम्हारा हूँ ऐसी प्रार्थना करता है उसे मैं सभी भूतों से अभय प्रदान करता हूँ । क्या सर्वभूतों से अभय प्रदान करने की शक्ति ईश्वर से अतिरिक्त किसी जीव में भी सम्भव हो सकती है ? “विष्णुं मन्यामहे रामं मानुषं देहमास्थितम् ।” ( वा० रा० ६।३५।३६ ) उक्त वचन से स्पष्ट ही राम का विष्णु होना कहा जा सकता है । अहं सखा ते काकुत्स्थ प्रियः प्राणो बहिश्चरः ।” ( वा० रा० ६।५०।४६ ) राम से गरुड़ कहते हैं, मैं तुम्हारा प्राणतुल्य सखा हूँ। इससे भी राम विष्णु हैं यह सिद्ध होता है । “विष्णोरमीभांस्यभागमात्मानं प्रत्यनुस्मरन् ।” ( वा० रा० ६।५९।११० ) लक्ष्मण ने अपना विष्णु के अंशरूप से स्मरण किया । मन्दोदरी विलाप करती हुई अनेक श्लोकों से राम का अमानव तथा परमेश्वर होना कहती है । “यदैव वानरैर्घोरैर्बद्धः सेतुर्महार्णवे । तदैव हृदयेनाहं शङ्के रामो न मानुषः ॥” अर्थात् जब घोर वानरों ने महार्णव में सेतु बाँध लिया तभी मेरे दिल में शङ्का हो गयी थी कि राम मनुष्य नहीं हैं । वह यह भी कहती हैं कि राम सनातन परमात्मा हैं, अनादि, अनन्त, महान् से भी महान् हैं । तम से परे, शङ्ख-चक्रधारी, श्रीवत्सवक्षा शाश्वत विष्णु हैं— “व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा सनातनः । अनादिमध्यनिधनो महतः परमो महान् ॥ तमसः परमो धाता शङ्खचक्रगदाधरः । श्रीवत्सवक्षा नित्यश्रीरजय्यः शाश्वतो ध्रुवः ॥ मानुषं रूपमास्थाय विष्णुः सत्यपराक्रमः । सर्वैः परिवृतो देवैर्वानरत्वमुपागतैः ॥ सर्वलोकेश्वरः श्रीमाँल्लोकानां हितकाम्यया ॥” ( वा० रा० ६।१११।११-१४ ) ऐसे अनेक उदाहरण रामायण के राम-प्रकरण में पाये जाते हैं । इतना ही नहीं, मन्दोदरी सीता को भी वसुधा की वसुधा और श्री की भी श्री कहती है ।
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०५ "सीतां धर्षयता मान्यां त्वया ह्यसदृशं कृतम्। वसुधाया हि वसुधां श्रियाः श्रीं भर्तृवत्सलाम् ॥" (वा० रा० ६।११३।२१) तदनन्तर इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण आदि देवताओं के साथ साक्षात् लोकपिता ब्रह्मा ने स्पष्टरूप से राम को परमात्मा, अक्षर, नारायण, पुरुषोत्तम, कर्ता आदि सम्बोधनों से सम्बोधित किया है। यह भी सभी रामायणों के राम-प्रकरण में विस्तार से प्राप्त होता है । बुल्के उपर्युक्त सभी श्लोकों को प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं। वे अनुच्छेद १२३ के ( ५ ) में लिखते हैं; "अग्निपरीक्षा के समय देवता आकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं।¹ इस सर्ग के प्रक्षेप होने में कोई सन्देह नहीं है। (दे० आगे अनु० ५६५) इसमें सीता और लक्ष्मी की अभिन्नता का भी उल्लेख है।" परन्तु उनका यह कथन निःसार है, कारण वाल्मीकिरामायण के सभी पाठ प्रामाणिक हैं। पाठ-भेद या समानान्तर में किसी श्लोक का न होना प्रक्षिप्त होने में कारण नहीं कहा जा सकता, ऐसे विभिन्न पाठों के श्लोक समानान्तर में न होने पर भी प्रक्षिप्त नहीं हैं। आश्चर्य तो यह है कि बुल्के पहले युद्धकाण्ड को प्रामाणिक मानते हैं, किन्तु उसमें भी राम के परमात्मा होने के सर्ग और श्लोक मिलते हैं तो वे इन सर्गों और श्लोकों को ही प्रक्षिप्त कह देते हैं । वाल्मीकिरामायण से श्लोक उद्धृत कर मैंने भी यह बताया ही है कि मन्दोदरी ने सीता को श्री की भी श्री कहा है । पुनः बुल्के लिखते हैं, "सीता की अग्निपरीक्षा के प्रक्षिप्त होने में कम सन्देह है। इस प्रसङ्ग में सीता के प्रति राम के प्रेम में जो सहसा परिवर्तन दिखाया गया है, वह अप्रत्याशित ही नहीं सर्वथा अस्वाभाविक भी है। सीताहरण के बाद राम के विरह का बहुत से सर्गों में वर्णन किया गया है। युद्धकाण्ड के प्रारम्भ में राम स्वयं कहते हैं कि मेरा विरहजनित शोक दिनों-दिन बढ़ता जाता है— "शोकश्च किल कालेन गच्छता ह्यपगच्छति । मम चापश्यतः कान्तामह्न्यहनि वर्धते ॥" लङ्कावरोध के बाद भी सीता के लिए राम की अभिलाषा का उल्लेख किया गया है "जगाम मनसा सीतां दूयमानेन चेतसा ।” (वा० रा० ५।४२।७ ) इन्द्रजित् द्वारा माया सीता के वध का समाचार सुनकर राम मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े— "तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवः शोकमूर्च्छितः । निपपात तदा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥” (वा० रा० ५।८३।१०) इससे स्पष्ट है कि सीता के प्रति राम का प्रेम अपरिवर्तित बना हुआ था, किन्तु यह सब होते हुए भी रावणवध के पश्चात् राम सीता को देख कर उनसे कहते हैं कि मैं अपने शत्रु के अपमान का प्रतीकार कर चुका हूँ। मुझे तुम्हारे प्रति कोई आकर्षण नहीं रहा। लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव, अथवा विभीषण किसी को भी पति के रूप में चुन सकती हो। मुझे तुम्हारे चरित्र पर सन्देह है। अग्निपरीक्षा के बाद राम अवश्य स्वीकार करते हैं कि मैंने तो तुम पर सन्देह नहीं किया, किन्तु जनता की दृष्टि से तुम्हारे इस शुद्धिकरण की आवश्यकता थी। इस प्रकार का दिखावा समस्त मूल वाल्मीकिरामायण की भावधारा के विरुद्ध है और अवतारवाद स्वीकार होने के पश्चात् ही ऐसा सम्भव था। परवर्ती साहित्य में इसपर बारम्बार बल दिया जाता है कि राम को वास्तविक दुःख नहीं है। वह केवल मनुष्य-चरित्र करते हैं। अतः आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि इस प्रसङ्ग में राम तथा सीता दोनों के अवतार १. दे० वा० रा० सर्ग ११७ तथा अन्य पाठों के समानान्तर स्थल ।
२०६ रामायणमीमांसा षष्ठ होने का उल्लेख है। ब्रह्मा आदि देवता प्रकट होकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं तथा सीता को लक्ष्मी से अभिन्न मानते हैं (वा० रा० ६।११९।२७) । यह वाल्मीकिरामायण का एकमात्र स्थल है जहाँ सीता तथा लक्ष्मी की अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। उपर्युक्त तर्क के अतिरिक्त भी यह ध्यान देने योग्य बात है कि युद्धकाण्ड के बाद दो बार समस्त रामकथा का सिंहावलोकन प्रस्तुत किया गया है (सर्ग १२४ और १२६), किन्तु इसमें अग्निपरीक्षा का उल्लेख नहीं होता। बालकाण्ड के प्रारम्भ की दोनों अनुक्रमणिकाओं (सर्ग १ और सर्ग ३) का प्रामाणिक संस्करण अग्निपरीक्षा के विषय में कुछ नहीं कहता। दो स्थलों पर राम सीता की निर्दोषता के प्रमाण का उल्लेख करते हैं। प्रथम बार सीता- त्याग के समय वह केवल देवताओं के साक्ष्य की चर्चा करते हैं। दूसरी बार वे वाल्मीकि से कहते हैं मैंने लङ्कानिवास के बाद सीता को तभी ग्रहण किया जब उन्होंने अपने सतीत्व की शपथ की थी। यदि उस सर्ग के रचनाकाल में अग्निपरीक्षा का वृत्तान्त प्रचलित होता तो यहाँ पर राम द्वारा अवश्य ही सीता के सतीत्व के सब से महत्त्वपूर्ण प्रमाण का उल्लेख हुआ होता। अतः यह मानना पड़ेगा कि उत्तरकाण्ड की आधिकारिक कथावस्तु के लिपिबद्ध होने के पश्चात् ही अग्निपरीक्षा विषयक प्रक्षेप युद्धकाण्ड का अंश बन गया है। महाभारत के रामोपाख्यान से भी हमारे निर्णय की पुष्टि होती है। रामायण के इस प्राचीनतम संक्षेप में भी कहीं भी अग्निपरीक्षा का निर्देशमात्र भी नहीं मिलता। अग्निपरीक्षा के बाद दो सर्ग (११९ और १२०) भी अनावश्यक हैं और प्रायः प्रक्षिप्त माने जाते हैं। इनमें शिव राम की स्तुति करते हैं, दशरथ दिखायी देते हैं तथा इन्द्र राम का निवेदन स्वीकार कर मृत वानर सैनिकों को जीवित कर देते हैं।१” बुल्के के उक्त शब्दाडम्बर का सार इतना ही है कि राम का सीता में बहुत प्रेम था। अकस्मात् उसमें परिवर्तन कैसे हो सकता था ? युद्धकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा बालकाण्ड के संक्षिप्त वृत्तान्तों में अग्निपरीक्षा की चर्चा नहीं है, अतः अग्निपरीक्षा प्रक्षिप्त है। किन्तु बुल्के भारतीय परम्पराओं एवं संस्कारों से अपरिचित हैं। अतः उनके लिए यह असम्भव प्रतीत होता है कि राम और सीता, विष्णु और लक्ष्मी थे। वे देवताओं का कार्य करने आये थे। यह सर्वथा प्रमाणसिद्ध उन प्रमाणों को बुल्के धूलि-प्रक्षेपमात्र से झुठलाना चाहते हैं। भारतीय धर्म-शास्त्रों की दृष्टि से स्त्री-रक्षा एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पहलू है। स्त्री-रक्षा से ही कुल, गोत्र आदि की रक्षा होती है; इसलिए धर्मशास्त्र कहते हैं— “स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च। स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥” (मनु० ९।७ ) तथा पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥” (मनु० ९।३ ) अर्थात् बाल्यकाल में पिता, यौवनकाल में पति, वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में स्त्री को रहना चाहिये; वह कदापि पूर्ण स्वतन्त्र होकर न रहे। स्त्री की पवित्रता पर ही कुल और गोत्र की पवित्रता निर्भर होती है। माता के सदाचारिणी होने पर ही व्यक्ति निश्चयपूर्वक अपने कुल-गोत्र का परिचय दे सकता है। माता का आचरण सन्दिग्ध होने पर उसकी सन्तान का कुल-गोत्र भी सन्दिग्ध ही होगा। इस दृष्टि से, भारतीय सभ्यता के अनुसार, स्त्री पिता, पति एवं पुत्र आदि संरक्षकों के बिना स्वतन्त्ररूप से नहीं रह सकती। पाश्चात्य देशों में ऐसी परम्परा १. रामकथा, पृष्ठ ५३३, ५३४ (अनु० ५६५) ।
नहीं है । कोई स्त्री किसी के साथ हाथ मिला सकती है, किसी के साथ नाच सकती है अथवा घूमने जा सकती है । भारतीय सभ्यता इसके विपरीत है । तदनुसार यह सब निन्द्य एवं त्याज्य है । इसी दृष्टि से उत्तरकाण्ड में कुछ पौरों ने भी सीता के सम्बन्ध में शङ्काएँ उठायीं थीं । राम यद्यपि सीता के प्रति अत्यन्त प्रेम रखते थे, तो भी उनका प्रेम अन्धप्रेम नहीं था । वे मर्यादापुरुषोत्तम थे, अतः प्रेम में मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं कर सकते थे । आधुनिक इङ्गलैण्ड की राजकुमारी मार्गरेट ने भी अपने बाइबिल तथा कुल की मर्यादा की रक्षा हेतु प्रेम ठुकराया था । परम प्रिय सीता के हरण पर उनका शोक, विलाप, मूर्च्छा आदि सब उचित ही था । सीता के अन्वेषण और प्राप्ति के लिए समुद्र में सेतु-बन्धन, सैन्य-सङ्ग्रह तथा भीषण युद्ध आदि भी पूर्णतः उचित ही था; परन्तु इन सब के सम्पूर्ण होने पर जब सीता उपस्थित हुईं तो मर्यादा का भी प्रश्न स्वतः उत्थित हुआ । जो प्रश्न अयोध्या के पौरों के सामने था वही प्रश्न राम के सामने भी उठना अत्यन्त स्वाभाविक था । फिर भी राम को सीता के सतीत्व के प्रति पूर्ण विश्वास था और साथ ही यह भी विश्वास था कि सीता शपथ और प्रत्यय देकर अपने सतीत्व को प्रमाणित करेगी । इसी लिए प्रेम रहने पर भी परिस्थिति और लोकमर्यादा को ध्यान में रखते हुए राम ने प्रत्यय देने की दृष्टि से ही सीता के प्रति परुष (कठोर) भाषण किया । उस समय अपने मन में उठते भावों को राम ने इस तरह व्यक्त किया है। भद्रे ! मैंने पौरुष से रणाङ्गण में शत्रु को जीतकर, शत्रु के हाथ से तुम्हें जीतकर लौटा लिया । पौरुष यत्न से जो करना चाहिये वह किया । इस तरह अमर्ष का अन्त कर अपने अभिभव का मार्जन किया है । अवमान और शत्रु दोनों को युगपत् नष्ट कर दिया है । आज मेरे पौरुष को लोगों ने देख लिया । मेरा श्रम सफल हो गया । रावण-वध की प्रतिज्ञा को पूर्ण कर अब मैं उससे मुक्त हो गया । दुष्ट-चित्त रावण ने मेरे न रहने पर तुम्हारा हरण किया था, यह दैवकृत दोष था । मैंने मनुष्य-साध्य प्रयत्न से उसे मिटा दिया । जो इस तरह प्राप्त अवमान का अपने तेज से मार्जन नहीं करता उस अल्पचेता के महान् पौरुष से भी क्या अर्थ ? समुद्र-लङ्घन, लङ्का-मर्दन आदि हनुमान् का श्लाघ्य कर्म भी आज सफल हुआ । युद्ध में विक्रम और मेरे हित की मन्त्रणा करनेवाले सैन्य सहित सुग्रीव का भी परिश्रम आज सफल हो गया; जो अपने दुष्ट भ्राता रावण को त्याग कर मेरे पास आये, उन विभीषण का भी परिश्रम सफल हो गया । राम के ऐसे वचनों को सुन कर सीता उनके दर्शन से प्रसन्न होकर मृगी के तुल्य उत्फुल्लनयन हुईं और परुष वचन सुन कर अश्रुपरिप्लुत हो खिन्न हुईं । वानरों और राक्षसों के बीच में राम ने पुनः कहा—"धर्षणा का मार्जन करते हुए मनुष्य को जो करना चाहिये, मान की आकाङ्क्षा से रावण को मारकर मैंने वह किया । तप से भावितात्मा अगस्त्य ने जैसे इल्वल, वातापी आदि राक्षसों के भय से जीवलोक के लिए दुराधर्ष दक्षिणा दिक् को जीत लिया, वैसा ही, रावण के भय से जीवमात्र के लिए दुराधर्ष तुम (सीता) को मैंने प्रत्याहृत किया । तुम्हें यह विदित होना चाहिये कि सुहृदों के पराक्रम से जैसे मैंने यह श्रम किया है वह तुम्हारे लिए नहीं, किन्तु सर्वतः प्रख्यात अपने वंश के वृत्त की रक्षा और अपवाद तथा न्यग्भाव कलङ्क का मार्जन करने के लिए किया । तुम्हारे चरित्र में सन्देह प्राप्त है । तुम हमारे सम्मुख स्थित होकर नेत्ररोगी को दीपशिखा के समान प्रतिकूल प्रतीत हो रही हो । मैं तुम्हें अनुज्ञा देता हूँ, ये दशों दिशाएँ तुम्हारे लिए पड़ी हैं । जहाँ चाहो जाओ । मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं । भला कौन कुलीन तेजस्वी पुमान् सुहृद् के लोभ से युक्त चित्त से परगृहोषित स्त्री को ग्रहण कर सकता है ? रावण के अङ्ग से परिक्लिष्ट और उसकी दुष्ट दृष्टि से दृष्ट होने के कारण अपने महान् कुल का ध्यान रखते हुए मैं तुम्हें पुनः कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ? जिसके लिए मैंने रावण को मारकर तुम्हारा प्रत्याहरण किया वह सब सम्पन्न हो गया । तुम लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव या विभीषण किसी भी मेरे सम्बन्धी के पास रह सकती हो, अथवा जहाँ भी तुम्हें सुख हो, अपने माता-पिता के पास रह सकती हो । यहाँ बुल्के ने “पतिरूप से चुन सकती हो” जैसे शब्द लिखकर अपनी कलुषित भावनाओं का ही परिचय दिया है, क्योंकि इस अर्थ के द्योतक कोई शब्द उक्त प्रसङ्ग में कहीं प्राप्त नहीं होते ।
मनोरमा तथा दिव्य रूपवाली विशेषतः अपने गृह में पर्यवस्थित तुम्हें देखकर रावण अधिक काल तक सहन नहीं कर सकता था। कालान्तर में अवध के कुछ पौरों ने भी लगभग राम के कथन के सदृश शब्दों में ही वैसी शङ्का उप- स्थित की थी । यह सब भारतीय धर्म तथा संस्कृति के अनुसार स्वाभाविक ही था। श्रीसीता ने अग्नि-प्रवेशरूप दिव्य प्रत्यय देकर इन सभी आरोपों एवं अपवादों का समूल उन्मूलन कर अपने अखण्ड अनन्त दिव्य पातिव्रत्य तेज को प्रकट कर दिया। यही भारतीय नारी का आदर्श है। साक्षात् अग्नि ने तथा सब देवताओं ने सीता की शुद्धता का साक्ष्य दिया। तब राम ने सीता को ग्रहण किया। भारतीय प्रेम और मर्यादा के समन्वय का यही सुन्दर आदर्श है। पाश्चात्य संस्कारों के कारण बुल्के के लिए यह सब अस्वाभाविक एवं असम्भव प्रतीत होता है। यथार्थतः यह सब दिखावा नहीं अपितु वस्तुस्थिति थी। राम को सीता के सतीत्व पर पूर्ण विश्वास होने से ही राम ने उन राक्षसों और वानरों के सम्मुख ही सीता से यह सब कहा । इस कथन का एकमात्र उद्देश्य यही था कि जनता में कोई लोकापवाद न हो । सीता के चरित्र पर कहीं किसी को कोई शङ्का न हो। “मनसा, वाचा, कर्मणा, बुद्ध्या, चक्षुषा किसी तरह भी सीता ने तुम्हारा अतिक्रमण नहीं किया यह अत्यन्त निष्पापा और विशुद्धभावा है।” लोकसाक्षी पावक के यह कहने पर राम ने कहा यद्यपि सीता पवित्र है फिर भी लोक में इसकी पवित्रता व्यक्त होनी चाहिये, क्योंकि वह दीर्घकाल तक रावण की लङ्का में रही है। यदि मैं बिना विशुद्धि किये उसको ग्रहण करता तो लोक यही कहता कि दशरथात्मज राम बालिश एवं कामात्मा थे, इसलिए परगृहोषिता सीता की विशुद्धि किये बिना ही उसको ग्रहण कर लिया (सर्ग ११५-११८) अतः सीता शुद्धि नितरां अपेक्षित थी। मूलरामायण में जिसको बुल्के पहली अनुक्रमणिका कहते हैं, अग्निपरीक्षा का स्पष्ट वर्णन है। “तेन गत्वा पुरीं • लङ्कां हत्वा रावणमाहवे । रामः सीतामनुप्राप्य परा व्रीडामुपागमत् ॥ तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि । अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ॥ ततोऽग्निवचनात् सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम् । कर्मणा तेन महता त्रैलोक्ये सचराचरम् ॥ सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः । बभौ रामः सम्प्रहृष्टः पूजितः सर्वदैवतैः ॥” ( वा० रा० १।१।८१-८४ ) अर्थात् सेतु के द्वारा लङ्का जाकर, रावण को मारकर एवं सीता को प्राप्त कर सीता के रावणगृह-निवास के कारण राम व्रीड़ा ( लज्जा ) को प्राप्त हुए और जन-संसद् में ही सीता के प्रति परुष वचन बोले । उन्हें अमृष्य- माणा ( सहन न कर ) सीता ने अग्नि में प्रवेश किया। पुनश्च अग्नि-वचन से सीता को विगतकल्मषा जान कर राम संप्रहृष्ट हुए। उस अग्नि-प्रवेश से देवर्षिगण सहित सचराचर त्रैलोक्य राम पर परितुष्ट हुआ। सब देवताओं से पूजित राम सम्यक् प्रसन्न हुए। प्रस्तुत संस्करण को प्रामाणिक न मानना भी निराधार है। १८५२ शक, १९३० ई० में यह निर्णय सागर में प्रकाशित हुआ है। इसपर अत्यन्त प्रामाणिक रामाभिरामी टीका है। प्रसिद्ध शब्देन्दुशेखरकार नागेशभट्ट ने अपने शिष्य राम के नाम से इस टीका का निर्माण किया है। संक्षिप्त वर्णन में कितनी ही बातें छूट जाती हैं। अतः कहा नहीं कहा जा सकता कि किसी एक वर्णन में सभी कथाएँ अनिवार्य अपेक्षित हैं। फिर भी अग्नि परीक्षा का तो स्पष्ट उल्लेख है ही जिससे बुल्के कितना झूठ बोलते हैं यह भी साफ हो जाता है।
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०९ महाभारत में यद्यपि सीता का अग्नि-प्रवेश नहीं कहा गया है, परन्तु सीता के चरित्र पर राम का सन्देह करना वाल्मीकिरामायण के समान ही कहा गया है। सीता का दुःखित होकर मूर्च्छित होना कहा गया है। वायु, अग्नि, वरुण आदि देवताओं तथा ब्रह्मा का स्वयं आकर सीता को शुद्ध बताना कहा गया है। तब जाकर राम द्वारा सीता को स्वीकार किया जाना आदि कथाएँ दी गयी हैं। नागोजीभट्ट ने रामाभिरामी टीका में कहा है कि शास्त्रों के समन्वय की दृष्टि से महाभारत में अनुक्त होने पर भी सीता का अग्नि-प्रवेश मध्य में समझ लेना चाहिये, क्योंकि ‘रामचरित्र’ में वाल्मीकिरामायण ही मुख्य प्रमाण है। इतर शास्त्रीय वचनों को उसी के अनुसार ही लगाना चाहिये । अतएव पद्मपुराण में भी कहा गया है— ‘सा तेन गर्हिता साध्वी विविशे ज्वलनं सती ।’ राम के द्वारा गर्हित होने से सीता अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। उत्तरकाण्ड इस सम्बन्ध में मौन है बुल्के का ऐसा कहना भी अशुद्ध है। उत्तरकाण्ड के (४५वें सर्ग) में कहा गया है— ‘‘जानासि त्वं यथा सौम्य दण्डके विजने वने । रावणेन हृता सीता स च विध्वंसितो मया ॥ तत्र मे बुद्धिरुत्पन्ना जनकस्य सुतां प्रति । अशोषितामिमां सीतामानयेयं कथं पुरीम् ॥ प्रत्ययार्थं ततः सीता विवेश ज्वलनं तदा । प्रत्यक्षं तव सौमित्रे देवानां हव्यवाहनः ॥ अपापां मैथिलीमाह वायुश्चाकाशगोचरः । चन्द्रादित्यौ च शंसेते सुराणां संनिधौ पुरा ॥ ऋषीणां चैव सर्वेषामपापां जनकात्मजाम् । एवं शुद्धसमाचारा देवगन्धर्वसंनिधौ ॥ लङ्काद्वीपे महेन्द्रेण मम हस्ते निवेशिता । अन्तरात्मा च मे वेत्ति सीतां शुद्धां यशस्विनीम् ॥’’ (वा० रा ७।४५।५-१०) अर्थात् राम ने लक्ष्मण से कहा, सौमित्रे ! तुम जानते ही हो जिस तरह विजन वन में रावण ने जानकी का हरण किया और मैंने रावण का वध किया। वहाँ जनकजा के प्रति मेरे मन में बुद्धि उत्पन्न हुई कि लङ्का में दीर्घकाल पर्यन्त रहने के कारण मैं सीता को अयोध्या कैसे ले जा सकता हूँ। तब सीता ने प्रत्ययार्थ देवताओं के सन्निधान में अग्नि में प्रवेश किया। तुम्हारे समक्ष ही अग्नि ने सीता को पवित्र कहा, आकाशगोचर वायु तथा चन्द्र, आदित्य आदि ने देवताओं एवं ऋषियों के समक्ष सीता को निष्पाप कहा। वाल्मीकि के समक्ष भी राम ने कहा था— ‘‘प्रत्ययश्च पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसंनिधौ । शपथश्च कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता ॥’’ ( वा० रा० ७।९७।३ ) अर्थात् देवताओं के सन्निधान में पहले भी जानकी ने प्रत्यय दिया था और शपथ किया था तभी महलों में सीता लायी गयी थीं। बुल्के भी सीता द्वारा शपथ लिये जाने का उल्लेख करते हैं। वस्तुतः यह शपथ भी बुल्के द्वारा उद्धृत “सच्चकिरियम्” (सच्चक्रिया, ८६ अनु०) के समान थी जो कि अग्निप्रवेशरूप ही थी। महाभारत में रामोपाख्यान संक्षिप्त रूप से प्राप्त है, अतः उसमें अग्निपरीक्षा ही नहीं अन्य भी अनेक चरित्रों का अभाव हो सकता २७
२१० रामायणमीमांसा षष्ठ है। यदि रामायण की सारी बातों का उल्लेख हो तो फिर संक्षिप्तता ही कैसे हो ? इसी तरह अग्निपरीक्षा के बाद के सर्गों को प्रक्षिप्त कहना भी निस्सार है। फिर भी उसमें अग्नि द्वारा सीता का पवित्र होना कहा ही गया है। उसे बुल्के अग्निपरीक्षा का उपलक्षण क्यों नहीं मानते ? श्रीराम का विष्णु का अवतार होना बुल्के को मान्य नहीं। उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड से भिन्न बीच के पाँच काण्डों को वे प्रामाणिक कहते हैं। उनके द्वारा प्रामाणिक मान्य ‘युद्धकाण्ड’ में विस्तार से राम के परब्रह्म, अक्षरब्रह्म होने का प्रमाण मिलता है। तब उनके पास सिवा प्रक्षिप्त कहने के कोई चारा नहीं रह गया। वस्तुतस्तु कोई भी घटना एवं तद्विषयक इतिहास किसी की बुद्धि या इच्छा पर निर्भर नहीं। घटनासम्बन्धी इतिहास के आधार पर घटना का निर्णय करना उचित है। घटना औचित्य-अनौचित्य का भी अनुसरण नहीं करती। अन्याय तथा अत्याचार सम्बन्धी घटना अनुचित होने पर भी घटती ही है। अतः बुल्के या अन्य सभी को प्रामाणिक आर्ष इतिहास रामायण के आधार पर ही रामकथासम्बन्धी घटनाओं को मानना चाहिये। उन्हें अपनी बुद्धि के अनुसार घटनाओं के भाव तथा अभाव कहने का कोई अधिकार नहीं है। राम का सीता में प्रेम है, इसी लिए राम सीता के प्रति शङ्का नहीं कर सकते एवं परुष वचन नहीं बोल सकते, यह कल्पना सर्वथा गलत है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनुसार नारी का परगृह-निवास विशेष मर्यादातिक्रमण अत्यन्त शङ्कनीय तथा लोकापवाद का कारण होता है। इस दृष्टि से राम का सीता में अत्यन्त प्रेम होने पर भी सीता की शुद्धि अत्यन्त आवश्यक है। इसी दृष्टि से राम का परुष वचनों का प्रयोग और सीता का अग्निप्रवेश अत्यन्त स्वाभाविक है। कल्पनाएँ तो अनेक प्रकार की हो सकती हैं। परन्तु वस्तुस्थिति इतिहास के अनुसार ही जानी जाती है। कल्पनाओं के आधार पर घटना का ज्ञान असम्भव है। अध्यात्मरामायण, पद्मपुराण तथा रघुवंश आदि ग्रन्थों में सीता की अग्निपरीक्षा का विशद वर्णन है। 'नागपाश' का वृत्तान्त भी क्षेपक नहीं है; हाँ पाठों में कुछ भेद हो सकता है। कुम्भकर्ण ने नारदवर्णित विष्णु के अवतार द्वारा रावणवध का रहस्य बतलाया है, यह ठीक ही है। प्रामाणिक पाठ-भेद उपेक्ष्य नहीं है। उनकी उपपत्ति हो सकती है; यह अन्यत्र वर्णित है। उत्तरकाण्ड में ८-१७ आदि अनेक सर्गों में राम का अवतार होने का उल्लेख भी ठीक ही है। बुल्के कहते हैं—"प्रामाणिक काण्डों के अवतारवाद की सामग्री जो तीनों पाठों में मिलती है नही के बराबर है और जो सामग्री तीनों पाठों में मिलती है वह एक ऐसे अंश में पायी जाती है जो स्पष्टतया प्रक्षिप्त है।" बुल्के के उक्त विचारों का पूर्व में पूर्णतया खण्डन किया जा चुका है। अपनी भावना के अनुसार प्रक्षेप का वर्णन करना अत्यन्त असङ्गत है। बुल्के ने बारम्बार कई लोगों के समक्ष अपने को गोस्वामी तुलसीदास का अनन्य भक्त कहा है। तुलसीदास ने राम को परब्रह्म का अवतार माना है। अग्नि-परीक्षा का भी उल्लेख किया है। क्या गोस्वामी तुलसीदास के परम भक्त बुल्के के लिए तुलसीदास की उक्ति के विरुद्ध ऐसा अनर्गल प्रलाप उचित हो सकता था ? अनु० १२३ में वे लिखते हैं, "रामायण के प्रधान पात्र राम के अवतार होने से परिचित नहीं हैं। इस तर्क के विरुद्ध सम्भवतः कहा जा सकता है कि यह आवश्यक नहीं कि वे राम को अवतार समझें। फिर भी उत्तर- कालीन रामकाव्य में प्रायः सब पात्र राम को अवतार मानकर उनसे प्रार्थना करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि इस तर्क में कुछ तत्त्व है।"१ बुल्के का उपर्युक्त तर्क तर्क न होकर तर्काभास ही है। करुण-रस-प्रधान वाल्मीकि के आदिकाव्य में ऐश्वर्य- प्रधान कथाओं का विस्तार अभीष्ट नहीं था। रावण-वध के पूर्व ही राम के देवेश्वरत्व एवं वानर तथा भालुओं के देवत्व की प्रख्याति रावण-वध में बाधक हो सकती थी, क्योंकि ब्रह्मा के वरदान के प्रभाव से देव या देवेश्वर द्वारा १. रामकथा, पृष्ठ १३५।१ ।
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २११ उसका वध नहीं हो सकता था। अतः रावण-मरण के बाद ही ब्रह्मादि देवताओं ने तथा शिव ने सार्वजनिकरूप में राम को ब्रह्मस्वरूप बतलाया । इसी प्रसङ्ग में वे आगे लिखते हैं, "सीता अपने आपको साधारण स्त्री मानती हैं और अपने इस जन्म के दुःखों का कारण पूर्व जन्म में किये हुए पाप को समझती हैं। १ यही नहीं राम का अवतार होना भी उनसे छिपा हुआ है। वह राम की तुलना विष्णु से करती हैं। २ राक्षसों के प्रति राम की हिंसात्मक प्रवृत्ति देखकर वह राम के परलोक के विषय में चिन्तित हैं ( वा० रा०, ३।९।१२ ) ! और जब रावण उनसे अनुरोध करता है कि वह राम, साधारण मनुष्य, को छोड़ दे, तो वह उत्तर नहीं देती कि राम साधारण मनुष्य नहीं हैं। युद्ध के समय भी वह राम को अमर नहीं समझती ।”३ बुल्के के उपर्युक्त बालोचित तर्क अकिञ्चित्कर हैं। यदि सीता ने रावण से या अन्य से राम के अवतार होने की बात कही भी होती तो बुल्के उसे प्रक्षेप कह देते। श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण को स्पष्टतः अवतार कहा गया है और अनेक बार नन्द और यशोदा को तथा गोप और गोपिकाओं को भी श्रीकृष्ण का परमेश्वरत्व विदित हुआ है तो भी नन्द, यशोदा एवं गोप तथा गोपिकाएँ विरह से संतप्त होती हैं। क्योंकि मानव-जन्म के कारण मानवीय भावनाओं का पुनः पुनः सञ्चार होना स्वाभाविक है। इसी दृष्टि से सीता एवं राम के व्यवहारों को भी समझना उचित है। तुलसी के राम शुद्ध परमात्मा हैं तो भी लक्ष्मण को शक्ति लगने पर वे मूच्छित होते हैं और तरह तरह के प्रलाप करते हैं। इसी तरह की घटना सीता एवं राम के सम्बन्ध में भी हो तो क्या आश्चर्य ? साधारणतः भाग्यवैषम्य के दोष से पुराकृत दुष्कृतों के अनुसार ही प्राणी को सुख-दुःख की प्राप्ति होती है। सभी को स्वकृत कर्मों का फल भोगना पड़ता है—इस लौकिकी दृष्टि से ही सीता का उक्त कथन सङ्गत है। वस्तुतः सीता एवं राम लक्ष्मी एवं विष्णु के अवतार होते हुए भी जिस रूप को धारण कर प्रकट हुए हैं उसके अनुरूप ही उनका व्यवहार होना भी उचित ही है। यदि परब्रह्म या विष्णु नररूप में प्रकट हो सकता है तो नरानुरूप ही अन्य व्यवहार में भी अग्रसर हो सकता है। जब राम विष्णु से भिन्न नररूप में अवतीर्ण हैं तब विष्णु तुलना भी उचित ही है । रावण-वध के लिए भिन्नरूपता ही अपेक्षित भी थी । किं बहुना परब्रह्म के नरावतार में प्रायः सभी चेष्टाएँ नरानुरूप ही होती हैं; उसी दृष्टि से राम की हिंसात्मक प्रवृत्ति से आपाततः सीता को चिन्ता होती है। “अनिष्टाशङ्कीनि सुहृदां चेतांसि ।” सुहृदों के चित्तों में स्वभाव से अनिष्ट की चिन्ता बनी रहती है। यशोदा ने अनेक बार कृष्ण की ब्रह्म- रूपता का अनुभव कर लिया था, फिर भी कृष्ण के अनिष्ट की चिन्ता उनके मन में बनी ही रहती थी। ऐसी भावनाएँ वस्तुस्थितिमूलक न होकर सौहार्द-मूलक ही समझी जानी चाहिये । रावण को उत्तर देने के लिए सीता के द्वारा राम को विष्णु अवतार बताये जाने की अपेक्षा नहीं थी; “नहि कस्तूरिकामोदः शपथेन विभाव्यते ।” कस्तूरी की गन्ध को बताने के लिए शपथ की अपेक्षा नहीं होती। राम के लौकिक रूप से रावण का दर्पदलन होना सीता सम्भव मानती हैं। राम का लौकिक रूप ही रावण के छक्के छुड़ा देता है। १. दे० रा० ५।२५।१८; ६।११३।३६, ३७; ७।४८।३, ४ । २. दे० रा० ५।२१।२८; ५।३८।६५ । ३. रामकथा, पृष्ठ १३५ ।
२१२ रामायणमीमांसा षष्ठ “भुञ्जाना मानुषान् भोगान् दिव्यांश्च वरवर्णिनि । न स्मरिष्यसि रामस्य मानुषस्य गतायुषः ॥” (वा० रा० ३।४८।१४ ) रावण के उपर्युक्त वचनों का सीता ने भी राम की विशेषता का वर्णन करते हुए उत्तर दिया है, “जीवेच्चिरं वज्रधरस्य वज्राच्छचीं प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम् । न मादृशीं राक्षस धर्षयित्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्षः ॥” (वा० रा० ३।४८।२४) अर्थात् वज्रधर इन्द्र की शची का हरण करके भी कोई जीवित रह सकता है, परन्तु मुझ जैसी का धर्षण कर अमृत पी लेने पर भी तुम्हारा बचना कदापि सम्भव नहीं है । इतने पर भी क्या राम विष्णु ही हैं ऐसा कहना ही अनिवार्यतः अपेक्षित है ? वस्तुतः ऐसा कथन निरर्थक ही होता, क्योंकि विष्णु आदि के द्वारा अवध्य होने का वरदान उसे प्राप्त था । सीता पुनः कहती हैं— “वर्जयेद् वज्रमुत्सृष्टं वर्जयेदन्तकश्चिरम् । त्वद्विधं न तु संक्रुद्धो लोकनाथः स राघवः ॥” (वा० रा० ५।२१।३२ ) अर्थात् इन्द्र द्वारा उत्सृष्ट वज्र कदाचित् तुम्हारे प्राणों को छोड़ दे, साक्षात् अन्तक ( काल ) भी भले तुम्हें छोड़ दे, परन्तु संक्रुद्ध लोकनाथ राम त्वादृश पापी को प्राणदण्ड दिये बिना कभी नहीं छोड़ सकते । यहाँ लोक- नाथ शब्द स्पष्ट ही राम को परमेश्वर बता रहा है । क्या भगवान् से भिन्न भी कोई लोकनाथ हो सकता है ? “रामस्य धनुषः शब्दं श्रोष्यसि त्वं महारस्वनम् । शतक्रतुविसृष्टस्य निर्घोषमशनेरिव ॥” (वा० रा० ५।२१।२४ ) अर्थात् इन्द्र के छोड़े हुए वज्र की गड़गड़ाहट के समान श्रीरामचन्द्र के धनुष का घोर टंकार तुम शीघ्र ही सुनोगे । “राक्षसेन्द्रमहासर्पान् स रामगरुड़ो महान् । उद्धरिष्यति वेगेन वैनतेय इवोरगान् ॥” (वा० रा० ५।२१।२७ ) अर्थात् जैसे विनतानन्दन गरुड़ सर्पों का संहार करते हैं, वैसे ही रामरूपी गरुड़ राक्षसरूपी सर्पों का उन्मूलन करेंगे । “नहि गन्धमुपाघ्राय रामलक्ष्मणयोस्त्वया । शक्यं संदर्शने स्थातुं शुना शार्दूलयोरिव ॥” (वा० रा० ५।२१।३१ ) अर्थात् जैसे शार्दूल सिंह की गन्ध पाकर श्वान ठहर नहीं सकता वैसे ही राम और लक्ष्मण की गन्ध के आघ्राणमात्र से ही तुम भी नहीं ठहर पाओगे । “क्षिप्रं तव स नाथो मे रामः सौमित्रिणा सह । तोयमल्पमिवादित्यः प्राणानादास्यते शरैः ॥” (वा० रा० ५।२१।२३ ) अर्थात् जैसे आदित्य अल्पतोय को अनायास ही सुखा देता है, वैसे ही राम तुम्हारे प्राण ले लेंगे । “गिरिं कुबेरस्य गतोऽथवाऽऽलयं समागतो वा वरुणस्य राज्ञः । असंशयं दाशरथेर्न मोक्ष्यसे महाद्रुमः कालहतोऽशनेरिव ॥” (वा० रा० ५।२१।३४ )
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१३ अर्थात् तुम कुबेर के कैलास पर्वत पर चले जाओ अथवा वरुण की सभा में जाकर छिपे रहो, किन्तु जैसे काल से आहत विशाल वृक्ष भी वज्र का आघात लगते ही नष्ट हो जाता है निस्सन्देह वैसे ही तुम भी दशरथ- पुत्र के बाणों से तत्क्षण मारे जाओगे । “अपनेष्यति मां भर्ता त्वत्तः शीघ्रमरिन्दमः । असुरेभ्यः श्रियं दीप्तां विष्णुस्त्रिभिरिव क्रमैः ।।” ( वा० रा० ५।२१।२८ ) अर्थात् जैसे भगवान् विष्णु ने अपने तीन ही पगों द्वारा असुरों से उनकी उद्दीप्त राजलक्ष्मी छीन ली थी, वैसे ही मेरे स्वामी शत्रुसूदन श्रीराम मुझे शीघ्र ही तेरे यहाँ से निकाल ले जायेंगे । बुल्के लिखते हैं; लक्ष्मण भी राम को सान्त्वना देते हुए कहते हैं— “प्राप्स्यते त्वं महाप्राज्ञ मैथिलीं जनकात्मजाम् । यथा विष्णुर्महाबाहो बलिं बद्ध्वा महीमिमाम् ॥” अर्थात् हे महाबाहो, जैसे महातेजस्वी विष्णु ने बलि को बाँध कर यह पृथिवी प्राप्त की वैसे ही आप भी जनकात्मजा सीता को प्राप्त कर लेंगे । हनुमान् राम की तुलना विष्णु से करते हैं¹ और राम से कहते हैं कि जिस तरह विष्णु गरुड़ पर आरूढ होते हैं उसी तरह आप मेरी पीठ पर आरूढ़ होइये— “मम पृष्ठं समारुह्य राक्षसं शास्तुमर्हसि । विष्णुर्यथा गरुत्मन्तमारुह्यामरवैरिणम् ॥” ( वा० रा० ६।५९।२२ ) राम के दूत बनकर हनुमान् रावण से कहते हैं, मैं विष्णु की ओर से नहीं आया हूँ लेकिन राम की ओर से; “विष्णुना नास्मि चोदितः । केनचिद्रामकार्येण आगतोऽस्मि तवान्तिकम् ॥” ( वा० रा० ५।४०।१३, १८ ) इसी तरह और उदाहरण दिये जा सकते हैं । अगस्त्य राम को विष्णु का धनुष देते हुए राम और विष्णु की अभिन्नता से परिचित नहीं हैं; “इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम् । वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा ॥” ( वा० रा० ३।१२।२३ )” परन्तु उपर्युक्त उद्धरण से यह नहीं जाना जा सकता है कि ऋषि अगस्त्य विष्णु एवं राम को अभिन्नता से परिचित नहीं थे; प्रत्युत विष्णु का दिव्य धनुष राम को देने से यही सिद्ध होता है कि राम विष्णु ही हैं । अतः उन्हें विष्णु का धनुष दिया जा रहा है । इसके अतिरिक्त यदि सीता, लक्ष्मण, हनुमान्, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि सब राम को विष्णु ही बताते और विष्णुरूप से ही उनसे व्यवहार करते तो रावण का वध उनसे, ब्रह्मा द्वारा प्राप्त वरदान के कारण ही, सम्भव न होता । साथ ही, रामरूप में प्रादुर्भाव की उपयोगिता भी सिद्ध नहीं होती । अतः व्यावहारिकरूप में भिन्नता है ही । इसके अतिरिक्त अभेद में भी उपमा या तुल्यता का व्यवहार होता है । उदाहरणार्थ ‘वाक् करोति’ यहाँ सन्धि के लिए सवर्ण अपेक्षित है । तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् ( पा० सू० १।१।९ ) के अनुसार तुल्य आस्य प्रयत्न होना चाहिये । वाक् करोति इस स्थल में अभेद में भी तुल्यता मान्य होती है । भूवादयो धातवः ( पा० सू० १।३।१ ) इससे भू आदि वासदृश की धातु संज्ञा होती है । इसमें वा धातु स्वयं भी वासदृश होकर ही धातुसंज्ञक होता है अतः १. रामकथा, पृष्ठ १३५ में उद्धृत वा० रा० ५।३४।२९; ५।३७।२४ ।
२१४ रामायणमीमांसा षष्ठ अभेद में तुल्यता मान्य है । इसी तरह 'सागरं चाम्बरप्रख्यमम्बरं सागरोपमम् । रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।।' (वा० रा० ६।१०७।५१,५२ ) इस श्लोक में जैसे गगन और सागर की उपमा गगन और सागर से ही दी गयी है वैसे ही राम-रावण के युद्ध की उपमा राम-रावणयुद्ध से ही दी गयी है । बुल्के लिखते हैं, “राम न केवल नारायण तथा मधुसूदन ( दे० ३।६।३७ ) से प्रार्थना करते हैं, विधाता के विरुद्ध अपराध करने से डरते भी हैं। अधर्म और परलोक के भय से राज्याधिकार प्राप्त नहीं करते ( २।५३।२६ ) वरन् वह अपने आपको साधारण मनुष्य समझ कर विश्वास करते हैं कि पूर्व जन्म के किये हुए पापों का मुझे इस जन्म में फल भोगना है— “पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि ।।” ( वा० रा० ३।६३।४ ) “किं मया दुष्कृतं कर्म कृतमन्यत्र जन्मनि ।” (वा० रा० ६।१०१।१८ ) इसके अतिरिक्त अवतारवाद की भावना की नवीनता ब्रह्मा के प्रति राम की उक्ति से स्पष्ट है—मैं तो अपने आपको मनुष्य, दशरथ-पुत्र समझता हूँ । वास्तव में मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, इसे आप मुझसे कहिये— “आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम् । सोऽहं यश्च यतश्चाहं भगवांस्तद् ब्रवीतु मे ।।” (वा० रा० ६।११७।११)” बुल्के के उपर्युक्त सभी तर्क कुशकाशावलम्बन ही हैं। स्वयं भगवान् विष्णु नररूप में प्रकट हुए हैं, अतः अपने इस स्वीकृत रूप के अनुकूल ही मनुष्य जैसा उनका व्यवहार उचित ही है । वास्तव में बुल्के को हिन्दी विभागा- ध्यक्ष होते हुए भी साहित्य का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है । यदि होता तो वे 'पूर्वं मया' इस श्लोक में आये हुए 'नूनम्' शब्द का विश्वास करना अर्थ नहीं करते । क्योंकि 'नूनम्' शब्द यहाँ उत्प्रेक्षा वाचक है, जैसा कि “मन्ये शङ्के ध्रुवं प्रायो नूनमित्येवमादिभिः । उत्प्रेक्षा व्यज्यते शब्दैरिवशब्दोऽपि तादृशः ।।” इस कोष से सिद्ध होता है । तदनुसार दुःखों के मूल के रूप में दुष्कृतों की कल्पना भी होती ही है । वस्तुतः भारतीय शास्त्रों का परस्पर एक दूसरे से सम्बन्ध होता है। योगवासिष्ठ एवं पुराणों के अनुसार देवकार्यार्थ विष्णु ने भृगुपत्नी का वध किया था, भृगु ने शाप दिया था कि तुम अज्ञानी हो जाओगे और स्त्री-निमित्तक दुःख पाओगे । नारद का भी शाप था कि स्त्री-निमित्तक दुःख भोगोगे । तुलसीदासजी ने भी इस शाप की चर्चा की है । यद्यपि वह देव-कार्यार्थ ही था और ईश्वर का पुण्य-पाप से संसर्ग नहीं होता तथापि भगवान् विष्णु ने ऋषियों का शाप अङ्गीकार किया था । इसलिए अज्ञान एवं शोक, विलाप आदि उनमें दृष्ट हुए हैं । इसी दृष्टि से राम कहते हैं कि मैं अपने को साधारण मनुष्य मानता हूँ । यदि बुल्के ईमानदारी से विचार करें तो वे भी मानेंगे कि— “आत्मानं मानुषं मन्ये” इस श्लोक से भी राम की ब्रह्मरूपता ही सिद्ध होती है । कब, किससे और किस सन्दर्भ में राम ने उक्त वचन कहा है और साथ ही उसका क्या उत्तर मिला आदि प्रश्नों पर पूर्वापरप्रसङ्गों के तारतम्य को बनाये रखते हुए विचार करने पर निस्सन्देह सिद्ध हो जाता है कि वाल्मीकिरामायण में राम को ब्रह्म कहा गया है और ये वचन अथवा सर्ग प्रक्षेप नहीं हैं । फिर इस पद्य में 'मन्ये' शब्द उत्प्रेक्षावाचक ही है, इसलिए उसका 'समझता हूँ' यह अर्थ करना बुल्के के साहित्य ज्ञान को चुनौती देता है । यदि बुल्के उपर्युक्त श्लोक 'आत्मानं मानुषं मन्ये' ( वा० रा० ६।११७।११ ) को प्रक्षेप मानते हैं तब तो उनके द्वारा राम मनुष्य हैं अवतार नहीं हैं यह भी नहीं कहा जा सकता । यदि यह वचन क्षेपक नहीं है तो इससे सम्बद्ध पूर्वापर भी वचन क्षेपक नहीं हैं ।
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१९ रामाभिरामी टीका सम्मत पाठ के अनुसार प्रसङ्ग निम्नाङ्कित है— ११६ वें सर्ग में सीता वानरों, ऋक्षों और राक्षसों के समक्ष प्रज्वलित चिता में निःशङ्क होकर प्रवेश करती है। ऋषियों ने, देवताओं और गन्धर्वों ने यज्ञ की पूर्णाहुति एवं मन्त्र-संस्कृत वसोर्धारा के समान अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता को देखा। सर्ग ११७ में धर्मात्मा राम खिन्न तथा बाष्पव्याकुललोचन होकर मुहूर्त भर ध्यान- परायण हुए। तदनन्तर ही राजा वैश्रवण (कुबेर) तथा पितरों के साथ यम तथा सहस्राक्ष देवेन्द्र और जलेश्वर वरुण और त्रिनेत्र वृषभध्वज महादेव तथा लोकपितामह ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा आदि देवता सूर्य-संनिभ विमानों द्वारा लङ्का नगरी में राम के पास आये और प्राञ्जलि हो राघव से बोले, "आप सब लोकों के कर्ता हैं, देवताओं में श्रेष्ठ हैं, फिर अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? देवताओं में श्रेष्ठ ! आप अपने को क्यों नहीं जान रहे हैं? यहाँ देवगण, इन्द्र आदि से भी राम को श्रेष्ठ कहा गया है। नागेश के अनुसार यह बात 'विष्णुमुखा वै देवाः' इस श्रुति से भी सिद्ध है। राम ने कहा कि मैं तो अपने को दशरथ-पुत्र (शापादिवशात्) उत्प्रेक्षित करता हूँ। मैं तत्त्वतः जो हूँ और जैसा हूँ वह आप भगवान् बताये । पश्चात् ब्रह्माजी ने कहा — भवान् नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः । एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित् ॥ १३ ॥ अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव । लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः ॥ १४ ॥ शार्ङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः ! अजितः खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः ॥ १५ ॥ सेनानीर्ग्रामणीः सर्वं त्वं बुद्धिस्त्वं क्षमा दमः । प्रभवश्चाव्ययश्च त्वमुपेन्द्रो मधुसूदनः ॥ १६ ॥ इन्द्रकर्मा महेन्द्रस्त्वं पद्मनाभो रणान्तकृत् । शरण्यं शरणं च त्वामाहुर्दिव्या महर्षयः ॥ १७ ॥ सहस्रशृङ्गो वेदात्मा शतशीर्षो महर्षभः । त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ॥ १८ ॥ सिद्धानामपि साध्यानामाश्रयश्चापि पूर्वजः । त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोङ्कारः परात्परः ॥ १९ ॥ प्रभवं निधनं चापि नो विदुः को भवानिति ।
- दृश्यसे सर्वभूतेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ २० ॥ दिक्षु सर्वासु गगने पर्वतेषु नदीषु च । सहस्रचरणः श्रीमाञ्छतशीर्षः सहस्रदृक् ॥ २१ ॥ त्वं धारयसि भूतानि पृथिवीं सर्वपर्वतान् । अन्ते पृथिव्याः सलिले दृश्यते त्वं महोरगः ॥ २२ ॥ त्रींल्लोकान् धारयन् राम देवगन्धर्वदानवान् । अहं ते हृदयं राम जिह्वा देवी सरस्वती ॥ २३ ॥ देवा रोमाणि गात्रेषु ब्रह्मणा निर्मिताः प्रभो । निमेषस्ते स्मृता रात्रिस्त्वन्मेषो दिवसस्तथा ॥ २४ ॥
२१६ रामायणमीमांसा षष्ठ संस्कारास्त्वभवन् वेदा नैतदस्ति त्वया विना । जगत् सर्वं शरीरं ते स्थैर्यं ते वसुधात लम् ॥ २५ ॥ अग्निः कोपः प्रसादस्ते सोमः श्रीवत्सलक्षणः । त्वया लोकास्त्रयः क्रान्ताः पुरा स्वैर्विक्रमैस्त्रिभिः ॥ २६ ॥ महेन्द्रश्च कृतो राजा बलिं बद्ध्वा सुदारुणम् । सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ॥ २७ ॥ वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् । तदिदं नस्त्वया कार्यं कृतं धर्मभृतां वर ॥ २८ ॥ निहतो रावणो राम प्रहृष्टो दिवमाक्रम । अमोघं देव वीर्यं ते न ते मोघाः पराक्रमाः ॥ २९ ॥ अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ३० ॥ ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् । प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥ ३१ ॥ (वा० रा० ६।११९ ) अर्थात् आप भोक्ता और भोग्यरूप सकल प्रपञ्च के आश्रय साक्षात् नारायण हैं, सुदर्शन चक्रधारी श्रीविष्णु हैं, आप ही एकशृङ्ग वराह तथा भूत भव्य सभी सपत्नों (शत्रुओं) के विजेता हैं । आप ही आदि, अन्त और मध्य में रहने- वाले सत्य अक्षर हैं । सब लोकों के आप ही परम धर्म हैं। आप ही चतुर्भुज विष्वक्सेन, शार्ङ्गधन्वा, सर्वेन्द्रियनियामक हृषीकेश पुरुष एवं पुरुषोत्तम हैं। आप अजित खड्गधर विष्णु हैं एवं आप ही सेनानी एवं ग्रामणी हैं, आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा तथा दम हैं। जगत् की उत्पत्ति और प्रलय के आप ही एकमात्र कारण हैं एवं आप ही मधुसूदन हैं। आप ही इन्द्रकर्मा इन्द्र की सृष्टि करनेवाले ( सबके अधिपति ) महेन्द्र हैं। रणान्तकृत् पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षि आपको शरणयोग्य परम आश्रय एवं रक्षक कहते हैं। आप ही सहस्रशृङ्ग वेद एवं शतशीर्ष महान् धर्म हैं। आप तीनों लोकों के आदिकर्ता स्वयंप्रभु हैं। आपका अन्य कोई प्रभु नहीं है । सिद्धों एवं साध्यों के आप ही आश्रय एवं पूर्वज अर्थात् कारण हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार हैं। आप ही ओंकार हैं। आप परात्पर परमेश्वर हैं। आपकी उत्पत्ति एवं निधन कोई नहीं जानता अर्थात् आप उत्पत्ति तथा लय से रहित नित्य हैं। आप कौन हैं इसे लोग नहीं जानते, परन्तु आप अन्तर्यामी रूप से सब भूतों में विशेषरूप से गो एवं ब्राह्मणों में दृष्टिगोचर होते हैं। अत्यन्त अचेतन सभी दिशाओं में, आकाश में एवं पर्वतों में, नदियों में अन्तर्यामी रूप से योगियों के आप दृष्टिगोचर होते हैं। आप सहस्रचरण, शतशीर्ष तथा सहस्रदृक् हैं। महाविराट् के रूप से संसार के सभी चरण, शीर्ष और नेत्र आप ही के हैं। सभी भूतों तथा पर्वतसहित पृथ्वी को आप ही धारण करते हैं। अन्त में पृथ्वी के कारणभूत जल में, देव, गन्धर्व, दानव सहित तीनों लोकों को धारण करनेवाले महोरग शेष आप ही हैं। श्रीराम ! मैं ( ब्रह्मा ) आपका हृदय हूँ। सरस्वती आपकी जिह्वा हैं। ब्रह्मा के द्वारा निर्मित सभी देव आपके गात्रों के रोम हैं। आपका नेत्रनिमीलन रात्रि है एवं नेत्रोन्मीलन दिन है। आपके ज्ञान-विज्ञान संस्कार ही वेद हैं। वस्तुतः आपके बिना संसार कुछ भी नहीं है। सारा जगत् आपका वैराज शरीर है। आपकी स्थिरता वसुधातल है। आप का कोप ही अग्नि है। आपका प्रसाद ही श्रीवत्स- लक्षण सोम है। आपने अपने तीन विक्रमों (पगों) से तीनों लोकों को आक्रान्त कर दारुण बलि को बाँधकर महेन्द्र को राजा बनाया है। सीता लक्ष्मी हैं। आप प्रजापति विष्णु कृष्ण हैं। रावण के वधार्थ ही आप मानव देह में प्रविष्ट हुए हैं। हे देव, वह रावण-वधादि हम देवताओं का कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो गया है। अब आप प्रसन्नता से परम धाम में पधारिये। हे देव, आपका अमोघ वीर्य एवं अमोघ पराक्रम हैं। आपका अमोघ दर्शन तथा अमोघ
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अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१७ स्तवन है । भूतल में होनेवाले आपके भक्त नर भी अमोघ ( सर्वत्र सफल ) होंगे । वे भक्त इहलोक के सब कामों ( कामनाओं ) को प्राप्त करेंगे और अन्त में आपके पुराण पुरुषोत्तम रूप को ही प्राप्त होंगे । ब्रह्माजी के इन वचनों से भी स्पष्ट है कि राम ही परात्पर परब्रह्म हैं । "आत्मानं मानुषं मन्ये" जैसे वचन के आधार पर ही यह समझा जा सकता है कि ब्रह्मा आदि ने राम से कहा था— "कथं देवगणश्रेष्ठमात्मानं नावबुद्ध्यसे" ( वा० रा० ६।११७।६ ) तभी राम ने कहा कि मैं तो अपने को मनुष्य जानता हूँ, आप बतायें कि मैं कौन हूँ ? इसपर अवश्य ही ब्रह्मा ने भी कुछ कहा होगा । यदि पूर्वापरप्रसङ्ग को छोड़ दिया जाय तो बुल्के के द्वारा उद्धृत उक्त वचन सर्वथा असङ्गत ही होगा । उक्त वचन को बुल्के प्रक्षिप्त भी नहीं मानते । राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं । उनके द्वारा नारायण की प्रार्थना तथा विधाता आदि के प्रति अपराध हो जाने की भावना से डरना उचित ही है, क्योंकि उनके द्वारा मनुष्योचित क्रियाओं का अनुसरण लोकशिक्षार्थ ही है । श्रीमद्भागवत में स्पष्ट उल्लेख है कि भगवान् राम का मर्त्यावतार मर्त्य-शिक्षा के लिए ही है; केवल रावणादि राक्षसों के वधमात्र के लिए नहीं— 'मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम्, रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।" (भा० पु० ५।१९।५ ) राम चित्रकूट में पर्णशाला का संस्कार करते हैं, वैश्वदेव बलि तथा वैष्णव, रौद्र बलि और जप आदि सभी मनुष्योचित कार्य भी करते हैं— "वैश्वदेवबलिं कृत्वा रौद्रं वैष्णवमेव च । वास्तुसंशमनीयानि मङ्गलानि प्रवर्तयन् ॥" ( वा० रा० २।५६।३१,३२ ) १२८वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, "रामायण के अनेक पात्र राम की तुलना विष्णु से करते हैं । इसका अर्थ यह है कि वे राम और विष्णु को भिन्न समझते हैं । अन्य स्थलों पर भी कवि स्वयं इस तुलना का प्रयोग करते हैं (वा० रा० १।७८।२९;६।५९।१२५) अथवा अन्य पात्रों द्वारा करवाते हैं । अनसूया द्वारा (वा० रा० २।११८।२०), देवताओं द्वारा (वा० रा० ३।२३।२९;३।२४।२२;३।३०।३२) एवं अयोध्यावासियों द्वारा ( वा० रा०२।२।४३ ) । न केवल राम की परन्तु अन्य पात्रों की भी तुलना विष्णु से की जाती है । उदाहरणार्थ रावण ( वा०रा० ७।२०।५ ), अतिकाय ( वा० रा० ६।७१।८ ), इन्द्रजित् ( वा० रा० ६।७३।७ ) एवं हनुमान् ( वा० रा०६।५६।३८ ) । दूसरी ओर राम की तुलना अन्य देवताओं से भी की जाती है।"** बुल्के का उपर्युक्त कथन भी निरर्थक ही है, क्योंकि काव्यों में कहीं-कहीं आंशिक गुणों के आधार पर भी तुलना की ही जाती है । "रविरिव राजते राजा" प्रसिद्ध ही है अर्थात् राजा सूर्य के तुल्य राजमान है । विष्णु के साथ राम की तुलना किये जाने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि वे राम को विष्णु से भिन्न मानते थे, क्योंकि वास्तविक अभिन्नता होने पर भी व्यावहारिक भिन्नता के आधार पर ही अभिन्न में भी तुलना होतो ही है । इस तुलना में भी प्रकारान्तर से राम के ही महत्त्व का वर्णन किया गया है । प्रथम प्रसिद्ध विष्णु की उपमा दी जा सकती है, क्योंकि उपमान उपमेय की भिन्नता और उपमान की प्रसिद्धता लोकसिद्ध है । शङ्कराचार्य के अनुसार तो अभेद होने पर भी औपाधिक भेद के आधार पर भक्ति की उपपत्ति होती है— २८
२१८ रामायणमीमांसा षष्ठ “सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्, सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ।” भेद न होने पर भी मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं, क्योंकि समुद्र का तरङ्ग है यही व्यवहार होता है, तरङ्ग का समुद्र यह व्यवहार नहीं होता । “सागरः सागरोपमः” इत्यादि स्थलों में अभेद में भी तुलना की गयी है । १२८ वें अनु० में बुल्के लिखते हैं, “राम की तुलना विष्णु से १८ बार की जाती है, इन्द्र से ७७ बार । कई स्थानों पर राम तथा लक्ष्मण की तुलना क्रमशः इन्द्र तथा विष्णु से की गयी है जिससे स्पष्ट है कि विष्णु की अपेक्षा इन्द्र श्रेष्ठ माने जाते हैं ( वा० रा० ६।१९।१२; ६।३३।२८; ३।६८।२८ ) । एक उदाहरण पर्याप्त होगा— “ततो राममभिक्रम्य सौमित्रिरभिवाद्य च । तस्थौ भ्रातृसमीपस्थः शक्रस्येन्द्रानुजो यथा ॥” ( वा० रा० ६।४१।४ ) अर्थात्—लक्ष्मण भ्राता राम के समीप आकर अभिवादन कर वैसे ही समीप में बैठ गये जैसे इन्द्र के समीप उपेन्द्र बैठते हैं । इस उद्धरण में वैदिक साहित्य के अनुसार विष्णु इन्द्र के अनुज माने जाते हैं । वैदिक साहित्य के अनुसार भी प्रामाणिक 'आदिरामायण' में इन्द्र सर्वश्रेष्ठ देवता थे । राम की विजय इन्द्र की सहायता से होती है। यह भी इन्द्र की श्रेष्ठता को सूचित करता है ।” बुल्के का उक्त कथन भी अकिञ्चित्कर है, क्योंकि 'आदिरामायण' नामक कोई ग्रन्थ प्रसिद्ध नहीं है । बुल्के एवं अन्य पाश्चात्य विद्वानों द्वारा रामायण एवं महाभारत के सम्बन्ध में ऐसी विविध दुष्कल्पनाएँ की गयी हैं जिनका उद्देश्य प्रसिद्ध रामायण एवं महाभारत में शङ्का उत्पन्न करना है । अपने अनुकूल अर्थवाले कतिपय श्लोकों को आदिरामायणस्थ बताते हुए प्रामाणिक मान लेना प्रतिकूल अर्थ के द्योतक अन्य श्लोकों को प्रक्षेप कह कर अप्रामाणिक कह देना असङ्गत है । विशेषतः जब कि 'आदिरामायण' नामक कोई भी प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है । विष्णु की अपेक्षा इन्द्र की श्रेष्ठता की बात भी निराधार है । लक्ष्मण को इन्द्रानुज की उपमा देने मात्र से यह नहीं सिद्ध होता; वस्तुतः वामनावतारधारी विष्णु ही इन्द्र के अनुज हैं । मूलविष्णु नहीं; जैसे रामादि अन्य अवतार हुए हैं वैसे ही उपेन्द्र या वामनावतार भी हुआ है । यह वामन ही इन्द्र के अनुज हैं । यह कथा पुराणों के अतिरिक्त वाल्मीकिरामायण में भी वर्णित है । कश्यप ने कठिन तपस्या कर विष्णु से वरदान माँगा है कि आप मेरी पत्नी अदिति के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट होकर इन्द्र के छोटे भाई बनकर शोकार्त देवों की सहायता करें— “वरं वरद सुप्रीतो दातुमर्हसि सुव्रत । पुत्रत्वं गच्छ भगवन्नदित्या मम चानघ ॥ भ्राता भव यवीयांस्त्वं शक्रस्यासुरसूदनः । शोकार्तानां तु देवानां साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥” ( वा० रा० १।२९।१६, १७ ) तदनन्तर विष्णु अदिति में वामनरूप से उत्पन्न हुए और बलि के पास गये— “अथ विष्णुर्महातेजाः अदित्यां समजायत । वामनं रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत् ॥” ( वा० रा० १।२९।१९ )
अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१९ इस तरह वामनरूप से भगवान् विष्णु इन्द्र के अनुज हुए और उपेन्द्र कहलाये । उपेन्द्र आख्यात होने पर भी वस्तुतः इन्द्र की अपेक्षा उपेन्द्र का ही सर्वाधिक महत्त्व एवं पूज्यता है—ठीक उसी तरह जैसे श्रीमद्भागवत और महाभारत के अनुसार श्रीकृष्ण बलराम के छोटे भाई हैं । अतः व्यवहारतः श्रीकृष्ण उनको प्रणाम करते हैं, उनकी आज्ञा भी मानते हैं तथापि श्रीकृष्ण ही पूर्ण परब्रह्म होने के कारण सर्वोत्कृष्ट एवं पूज्य हैं, बलराम श्रीकृष्ण के ही अंश और उपासक हैं । लोकदृष्ट्या श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से छोटे थे, भीष्म की दृष्टि से बहुत ही छोटे थे तो भी भीष्म, युधिष्ठिर आदि सभी कृष्ण के उपासक थे और उनको परब्रह्म और परम पूज्य मानते थे । अस्तु, उपेन्द्र इन्द्र के छोटे भाई होते हुए भी इन्द्र के लिए वैसे ही आदरणीय एवं पूज्य हैं जैसे बलराम के लिए श्रीकृष्ण । उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि विष्णु की अपेक्षा इन्द्र का श्रेष्ठत्व कहना निराधार है । वेदों में विष्णु को परब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु इन्द्र देवताओं के राजा देवश्रेष्ठमात्र हैं । विष्णु का स्वरूपभूत प्राप्य पद परम उत्कृष्ट है जिसे व्यवहारविरत विद्वान् सूरि ही देख पाते हैं। “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय ” ( ऋ० सं० १।२२।२१ ) “तद्विप्रासो विपन्यवः” ( ऋ० मं १।२२।२१) । मन्त्रों में कहा गया है कि पुराकाल में चतुर्मुख ने जिस परम पुरुष की स्तुति की है और प्रविद्वान् शक्र, इन्द्र ने भी जिसकी स्तुति की है उस परब्रह्म विष्णु को जानकर ही अमृतत्व मिलता है । जहाँ “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” (ऋ० सं० ६।४७।१८) आदि स्थलों में इन्द्र शब्द का परमेश्वर ही अर्थ है । वहाँ तो इन्द्र और विष्णु, दोनों एक ही तत्त्व हैं । अतः वहाँ एक के उत्कर्ष और दूसरे के अपकर्ष का प्रश्न ही असम्भव हो जाता है । बुल्के कहते हैं, “राम की विजय इन्द्र की सहायता से होती है । यह भी इन्द्र की श्रेष्ठता को सूचित करता है ।” किन्तु वस्तुस्थिति की सर्वथा उपेक्षा कर ही वे ऐसा कह पाते हैं । उपेन्द्र की सहायता से इन्द्र इन्द्रासन पर रह पाते हैं। इस दृष्टि से उपेन्द्र ही इन्द्र की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं, अतः इन्द्र उपेन्द्र से श्रेष्ठ हैं, ऐसा बुल्के का उपर्युक्त कथन सुतरां बाधित हो जाता है। यथार्थतः इन्द्रादि देवताओं के हितार्थ ही राम ने रावण का वध किया; अतः राम की सहायता करना इन्द्र का कर्तव्य ही था । यह सहायता भी वैसी ही थी जैसी की वानर और भालुओं द्वारा की गयी सहायता । क्या इससे यह तात्पर्य लिया जाय कि वानर और भालू राम से श्रेष्ठ थे ? बुल्के लिखते हैं,१ “इन्द्र शरभङ्ग से बातचीत करते हुए और राम को आते देखकर साथ के देवताओं से कहते हैं—राम इधर आ रहे हैं । उनके यहाँ आने के पूर्व ही हम लोग यहाँ से चले जायें, क्योंकि राम मुझको देखने योग्य नहीं हैं । जब राम रावण पर विजय प्राप्त करेंगे तब उनकी मुझसे भेंट होगी ( वा० रा० ३।५।२२ ) । इस वृत्तान्त से जो ध्वनि निकलती है वह विष्णु नारायण अक्षर ब्रह्म के अवतार राम ( वा० रा० ३।११।७) से कितनी दूर हैं ।” किन्तु इन्द्र के वाक्यों का यथार्थ अर्थ न समझ कर ही बुल्के वैसा कहते हैं गौ० पाठ के अनुसार— “यास्याम्यहमयं रामो यावन्मां नाभिभाषते । कृतार्थमेनमचिराद् द्रष्टास्म्यहमरिन्दम् ॥” हम लोग राम के भाषण से पहले चले जायें, शीघ्र कृतार्थ होनेपर राम को देखेंगे । दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार— “यतः समभिगच्छन्तं प्रेक्ष्य रामं शचीपतिः । शरभङ्गमनुज्ञाप्य विबुधानिदमब्रवीत् ॥ १. रामकथा, पृ० १३७ ।
२२० रामायणमीमांसा षष्ठ इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते। निष्ठां नयत तावत्तु ततो मा द्रष्टुमर्हति ॥ जितवन्तं कृतार्थं हि तदाहमचिरादिमम्। कर्म ह्यानेन कर्तव्यं महदन्यैः सुदुष्करम् ॥ ( वा० रा० ३।५।२१-२३ ) उपर्युक्त श्लोकों का शुद्ध अर्थ है : शरभङ्ग मुनि के आश्रम में आते हुए रामको देखकर इन्द्र ने शरभङ्ग से जाने की अनुमति लेकर देवताओं से कहा कि राम इधर आ रहे हैं। वे मुझसे भाषण करें उसके पूर्व ही हम लोग अदृश्य हो जायें, क्योंकि विपद्मयी अवस्था में होने के कारण राम का मुझे देखना योग्य नहीं है। नागेशभट्ट कहते हैं कि—"विपदीव स्थितेन वैभवस्थदर्शनम् अनुचितम्” विपद्ग्रस्त के लिए वैभव में स्थित का दर्शन उचित नहीं है। इससे यह नहीं सिद्ध होता कि राम में इन्द्र के दर्शन की योग्यता नहीं है। उनमें कुछ कमी है। हाँ यह प्रश्न हो सकता है कि राम इन्द्र के दर्शन के योग्य क्यों नहीं हैं ? इन्द्र जिन शरभङ्ग को लेने के लिए उनके आश्रम में गये थे वे शरभङ्ग राम से कहते हैं—राम, शचीपति इन्द्र मुझे अकृतात्माओं के दुष्प्राप्य उग्र तप से विजित ब्रह्मलोक ले जाना चाहते हैं, परन्तु नर-व्याघ्र तुम्हें समीप में आया जानकर बिना प्रिय अतिथि तुमको देखे मैं ब्रह्मलोक नहीं जाऊँगा— “अहं ज्ञात्वा नरव्याघ्र वर्तमानमदूरतः । ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम् ।।” ( वा० रा० ३।५।२९ ) इसके अतिरिक्त यदि राम इन्द्र के द्वारा देखे जाने योग्य नहीं थे तो रावण-वध के बाद वह योग्यता कैसे आ जाती ? बुल्के इस प्रश्न का क्या उत्तर देंगे ? इन्द्र स्वयं ही कह रहे हैं कि इनको अति दुष्कर कर्म करना है, अतः विजयी तथा कृतकार्य होने पर ही मैं इनका दर्शन करूँगा। सम्बद्ध श्लोक में “जितवन्तं कृतार्थं" अधूरा वाक्य है, अतः 'द्रक्ष्यामि' क्रिया का अध्याहार करना होगा । तथाच इस इन्द्रवाक्य का निष्कर्ष यह है कि अभी वनवास-दशा में नहीं किन्तु रावण पर विजय प्राप्त करने के अनन्तर पूर्ण वैभव दशा में मैं इनका दर्शन करूँगा । “सर्वथापि राम मुझे देखने योग्य नहीं हैं” बुल्के का यह अर्थ अशुद्ध है। “स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थितुमर्हसि ।” ( वा० रा० २।३०।१० ) जनकनन्दिनी सीता कह रही हैं, "मुझको बिना लिए आपको वन जाना उचित नहीं है।” उक्त वचन का यह तात्पर्य कदापि नहीं लिया जा सकता कि सीता को लिये बिना राम में वन जाने की योग्यता नहीं है। ऐसे स्थानों में औचित्यबोध ही 'अर्ह' धातु का अर्थ है; गन्तुं नार्हसि, वक्तुं नार्हसि, भोक्तुं नार्हसि इत्यादि प्रयोगों द्वारा किसी में गमन, वचन एवं भोजन की अयोग्यता का प्रतिपादन नहीं होता। 'अर्हति' क्रिया के आधार पर बुल्के ने राम में इन्द्र के दर्शन की योग्यता नहीं है, ऐसा अर्थ लगा कर अपनी ही कलुषित भावनाओं का परिचय दिया है, साथ ही साहित्य ज्ञान शून्यता का भी । शब्दकल्पद्रुम कोष के अनुसार “अर्हति योग्यो भवति, उपयुक्तो भवति, उचितो भवति ।” अर्थात् 'अर्हति' पद का प्रयोग योग्य, उपयुक्त और उचित, तीनों ही अर्थों में किया जाता है। 'उचित' अर्थ में प्रयुक्त 'अर्हति' शब्द का उदाहरण श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है— “तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।” ( भ० गी० १।३७ ) अपने बान्धव धार्तराष्ट्रों का हनन करना हम लोगों के लिए उचित नहीं है। यहाँ भी ऐसा अर्थ नहीं किया जाता कि हम लोगों में उन लोगों को मारने की योग्यता नहीं है । साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यदि इन्द्र राम से मिलते तो वे उनकी वैसी ही स्तुति करते जैसे युद्धकाण्ड में मिलने पर उन्होंने देवताओं के साथ स्तुति की थी। इस स्थिति में राम की विष्णुरूपता स्पष्ट हो जाने से रावण के वध में उसके द्वारा प्राप्त वरदान के कारण ही बाधा पड़ती, क्योंकि उसका वध नर से ही होना
था किसी देवता से नहीं। इस दृष्टि से रावणवध के अनन्तर ही सब देवता राम से मिले थे और उनकी स्तुति करते हुए उन्हें विष्णु या परब्रह्म कहा। 'सुन्दरकाण्ड' में हनुमान् ने स्पष्ट कहा है कि राम के सामने युद्ध में ब्रह्मा, रुद्र या इन्द्र कोई भी टिक नहीं सकता— “ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥” (वा० रा० ५।५१।४४) फिर भी इन्द्र को राम से श्रेष्ठ कह कर राम को इन्द्र के दर्शन के अयोग्य ठहराना बुल्के की धृष्टता और अज्ञान ही है । कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयसंहिता द्वितीयाष्टक द्वादश अनुवाक में निम्नाङ्कित एक आख्यायिका है। त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का इन्द्र ने वध किया था, अतः त्वष्टा ने इन्द्ररहित सोमयाग किया। उसमें इन्द्र का आह्वान नहीं किया गया। इन्द्र ने यज्ञ का विघात कर बलात् सोमपान कर लिया। त्वष्टा ने अवशिष्ट सोम से इन्द्र-वध के लिए आहवनीय अग्नि में होम किया। उस होम में "इन्द्रशत्रो विवर्धस्व" मन्त्र का उच्चारण किया गया। इस मन्त्र का अर्थ है इन्द्र का शातयिता (घातक) पुरुष उत्पन्न होकर वृद्धि को प्राप्त हो । परन्तु मन्त्र में स्वर की त्रुटि हो गयी । तत्पुरुषसमास के अनुसार घातक पुरुष की उत्पत्ति हो सकती थी और उसका द्योतक अन्तोदात्त स्वर होता है। त्वष्टा ने मन्त्र में अन्तोदात्त स्वर का प्रयोग न कर भूल से आद्युदात्त स्वर का प्रयोग किया जो बहुव्रीहिसमास का द्योतक हो गया। इस स्वरदोष के कारण मन्त्र का "इन्द्र जिसका शातयिता (घातक) है, वह इन्द्रशत्रु वृद्धि को प्राप्त हो" ऐसा अर्थ हो गया, फलतः होम से वृत्रासुर उत्पन्न हुआ और वृद्धि को भी प्राप्त हुआ, परन्तु वह इन्द्र का घातक न हो सका। इन्द्र ही उसके घातक हुए। वह वृत्र, धनुष द्वारा प्रक्षिप्त बाण जितनी दूर जाता है उतने परिमाण में, प्रतिदिन बढ़ने लगा। इस वृद्धि के द्वारा उसने सब लोकों को आवृत्त कर लिया । उसका नाम वृत्र हुआ। उसकी इस वृद्धि से ही इन्द्र को ही भाँति स्वयं त्वष्टा भी चिन्तित हुए, अतः वृत्र को मारने के लिए इन दोनों ने मैत्री कर ली। त्वष्टा ने मन्त्र से अभिमन्त्रित जल से वज्र को सिक्त किया । वह वज्र अभिमन्त्रित होने से तपोरूप हो गया। इन्द्र उसे उठाने में समर्थ नहीं हुए। तब इन्द्र ने विष्णु से सहायता के लिए प्रार्थना की । वृत्रासुर के वीर्य का स्मरण कर इन्द्र भयभीत हुए। इन्द्र ने विष्णु से कहा कि हम दोनों वृत्र के वीर्य का हरण करे। विष्णु ने अपनी तीन मूर्तियाँ बनाकर उन्हें लोकरक्षा के लिए स्थापित किया। पृथिवी में स्थापित तीसरे विष्णु-शरीर को आगे कर इन्द्र ने विष्णु के पीछे स्थित होकर वज्र उठाया। वृत्र भयभीत हुआ। उसने कहा मेरे शरीर को मत मारो। मेरे शरीर के वीर्य (शक्ति) में पृथ्वी भर में व्याप्त हो जाने की क्षमता है। वह सब मैं तुम्हें देता हूँ। इन्द्र ने उसको स्वीकार कर विष्णु से कहा आप मुझको धारण करें, यह कहते हुए उस वीर्य को विष्णु के लिए सादर प्रदान कर दिया । विष्णु ने भी इन्द्र के हितार्थ ही उस वीर्य को ग्रहण किया । पुनश्च विष्णु का जो दूसरा रूप अन्तरिक्ष में था उससे युक्त होकर इन्द्र ने वज्र उठाया; फिर, वृत्र ने कहा, "मुझ पर प्रहार मत करो, मुझमें जो वीर्य है उसे मैं तुम्हें देता हूँ" और उसने प्रदान किया; इन्द्र ने ग्रहण किया और पुनः विष्णु से कहा कि पहले के समान दूसरी बार भी मुझको धारण करो (सँभालो) और विष्णु को वह वीर्य दे दिया। विष्णु ने इन्द्र के हितार्थ ही पुनः उस वीर्य को भी स्वीकार किया । पुनश्च द्युलोक में जो विष्णु का तीसरा रूप था उससे युक्त होकर इन्द्र ने वज्र उठाया; पुनः वृत्र ने भयभीत होकर अपना वीर्य प्रदान करने को कहा। इन्द्र ने अङ्गीकार किया । इस बार वृत्र ने कहा, "हम दोनों सन्धि कर लें। इन्द्र, मैं तुममें प्रवेश करूँगा ।" इन्द्र ने कहा मुझमें प्रवेश कर तुम मुझको ही खा जाओगे । वृत्र ने
२२२ रामायणमीमांसा षष्ठ 'कहा नहीं, तुमको नहीं खाऊँगा। तुम्हारे उदर की अग्नि को उद्दीप्त करूँगा जो तुम्हारे लिए बहुविध अन्नभक्षण के लिए उपयोगी होगा। यह कह कर वृत्र इन्द्र में प्रविष्ट हो गया । यह सब इन्द्र के हवि का त्रिधा विभाग और इन्द्र- विष्णुमिलित देवतत्व की प्रशंसा है । तस्मादिन्द्रोऽबिभेदपि त्वष्टा तस्मै वज्रमसिञ्चत्तपो वै स वज्र आसीत्तमुद्यन्तुं नाशक्नोदथ वै तर्हि विष्णुः (२) अन्या देवतासीत् सोऽब्रवीद्विष्णवे होदमाहरिष्यावो येनायमिदमिति स विष्णुस्त्रेधात्मानं वि न्यधत्त । पृथिव्यां तृतीयमन्तरिक्षे तृतीयं दिवि तृतीयम् अभिपर्या वर्त्ताद्वयबिभेद यत् पृथिव्यां तृतीयमासीत्तेनेन्द्रो वज्रमुदयच्छत् विष्ण्वनुस्थितः सोऽब्रवीन्मा मे प्रहरास्ति वा इदम् (३) मयि वीर्यं तत्ते प्रदास्यामीति तदस्मै प्रायच्छत् तत्प्रत्यगृह्णादधा मेति तद्विष्णवेऽतिप्रायच्छत् तद् विष्णुः प्रत्यगृह्णाद- स्मास्विन्द्र इन्द्रियं दधात्विति । इस प्रघट्टक से स्पष्ट है कि विष्णु की सहायता से ही इन्द्र वज्र उठाने में समर्थ हुए; विष्णु ने ही वृत्रदत्त वीर्य (शक्ति) को भी धारण किया । अतः इन्द्र की अपेक्षा विष्णु की विशेष महत्ता स्वयं सिद्ध हो जाती है। वैदिक साहित्य में कहीं भी इन्द्र की अपेक्षा विष्णु को अपकृष्ट या विष्णु की अपेक्षा इन्द्र को उत्कृष्ट नहीं कहा गया है। वेद के अनेक मन्त्रों में विष्णु के स्वरूप को ही परमपद और सूरिवेद्य कहा गया है— “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ।” (ऋ० सं० १।२२।२०) सूरयः विद्वांस ऋत्विगादयः । विष्णोः । परमम् उत्कृष्टम् । तत्तत् शास्त्रप्रसिद्धम् । पदं स्वर्ग- स्थानम् । शास्त्रदृष्ट्या सदा । पश्यन्ति । दिवीव आकाशे यथा । आततं सर्वतः प्रसृतम् । चक्षुः । तद् यथा निरोधाभावेन विशदं पश्यति तद्वत् । विद्वान् लोग विष्णु के उत्कृष्ट शास्त्रप्रसिद्ध पद (स्वरूप) को शास्त्रदृष्टि से इस तरह सदा देखते हैं जैसे निरोध न रहने के कारण आकाश में सर्वतः प्रसृत चाक्षुष तेज विशदरूप से देखता है । तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् (ऋ० सं० १।२२।२१) । विष्णोः । यत् । परमं । पदं पूर्वोक्तमस्ति । तत् पदम् । विप्रासो मेधाविनः समन्धिते सम्यक् दीपयन्ति । कीदृशाः, विपन्यवः विशेषेण स्तुतिकर्तारः । विष्णु के पद को मेधावी लोग सम्यक् प्रकाशित करते हैं जो शब्द और अर्थ के सम्बन्ध में प्रमादरहित रहकर जागरूक रहते हैं । जागृवांसः शब्दार्थयोः प्रमादराहित्येन जागरूकाः । उपर्युक्त वचनों से विष्णु की परमेश्वरता प्रसिद्ध है । ✤
सप्तम अध्याय
रामकथा का प्रारम्भिक विकास
बुल्के लिखित रामकथा में १२९ वें अनु० में कहा गया है "वैदिक साहित्य में आख्यान, इतिहास तथा पुराण मिलते हैं। ये ब्राह्मणों के अर्थवाद के एक आवश्यक अङ्ग समझे जाते थे। प्राचीन काल से धार्मिक संस्कारों तथा यज्ञों के अवसर पर ऐतिहासिक तथा पौराणिक इन्हें सुनाते थे। (शत० ब्रा० १३।४।३ ) तथा अर्वाचीन वैदिक साहित्य (शा० गृ० सू० १।२२।११ ) में ये पाँचवें वेद कहे जाते हैं— 'अथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमम् ।" (छा० उ० ७।१।२ ) आख्यानों के गद्य के साथ जो पद्य दिया जाता था, उसे गाथा कहा गया है। प्रारम्भ से ही दानस्तुति- स्वरूप 'नाराशंसी' गाथाओं का उल्लेख मिलता है (ऋ० सं० १०।८५।६ ) और इनके विषय में कहा जाता है कि ये सब झूठी हैं 'गाथानृतं नाराशंसी' (का० सं० १४।५) । इस नाराशंसी गाथासाहित्य के रचयिता तथा रक्षक राजदरबारों में रहनेवाले सूत थे। इनके अतिरिक्त कुशीलव जनसाधारण में इन गीतों का प्रचार करते थे।"¹
वेद और वेदान्त के रहस्य के अनभिज्ञ प्राञ्चात्यों की उक्त कल्पना अशुद्ध एवं निराधार है। वैदिक साहित्य के आख्यान तथा इतिहासपुराण अपौरुषेय वेदरूप ही हैं। ऋक्, साम, यजुः तथा अथर्व के मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों एवं उपनिषदों में आनेवाले आख्यान या पुराण-इतिहास सब अनादि अपौरुषेय ही हैं। वे ब्राह्मणों के नहीं किन्तु विधियों के अर्थवादरूप होते हैं; विधि-अर्थवाद स्वयं भी ब्राह्मण के अन्तर्गत हैं; इन वैदिक आख्यानों को वैदिक ही सुनाते थे, पौराणिक या ऐतिहासिक नहीं। मन्त्रों तथा ब्राह्मणों में आनेवाले आख्यान तथा इतिहास-पुराण तो वेद ही हैं, पञ्चम वेद नहीं। पञ्चम वेद तो पौरुषेय महाभारत, रामायण, इतिहास तथा पद्मपुराण, नारदीयपुराण आदि आर्ष इतिहास-पुराण ही हैं।
आख्यानों के गद्य के साथ जो पद्य दिया जाता है; उसे गाथा बौद्धों के यहाँ ही कहा जाता है। वेदों तथा पुराणों में तो पद्यों के साथ भी पद्यरूप गाथाएँ मिलती हैं। नाराशंसी गाथा वेदरूप ही हैं। मनुष्यों के स्तुतिवाले मन्त्र ही नाराशंसी कहे जाते हैं। मनुष्यों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूप मन्त्र नाराशंसी होते हैं। नरों की आशंसा (प्रशंसा) ही नाराशंसी है। ये सब सुखावबोधार्थ कल्पित आख्यायिका रूप होते हैं। इसी लिए स्वार्थ में अनृत कहे जाते हैं अर्थात् वस्तुतः किसी नर के वर्णन में उनका तात्पर्य नहीं होता है। सम्पूर्ण वेदों का धर्म या ब्रह्म ही मुख्य अर्थ है। परमार्थ वस्तु ब्रह्म ही सब वेदों का अर्थ है— "सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।" "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ॥" इत्यादि श्रुति और स्मृति इसमें प्रमाण हैं जब कि बुल्के के कथन में कुछ भी प्रमाण नहीं है। गाथा नाराशंसी भी मन्त्र, ब्राह्मणादिरूप होते हैं। वे भी अपौरुषेय होते हैं। उनका रचयिता कोई नहीं होता। राजदरबारों के सूत आदि को तो इनके पठन का भी अधिकार नहीं है। मुख्य पुराणप्रवक्ता उग्रश्रवा सूत तथा उनके पुत्र सौति भी आर्ष इतिहास-पुराण के ही प्रवचन में अधिकृत थे। इसी लिए श्रीमद्भागवत में कहा है—
१. एम्. विंटरनित्सः हि० इं० लि० भाग १, पृष्ठ ३१४।