रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०९ महाभारत में यद्यपि सीता का अग्नि-प्रवेश नहीं कहा गया है, परन्तु सीता के चरित्र पर राम का सन्देह करना वाल्मीकिरामायण के समान ही कहा गया है। सीता का दुःखित होकर मूर्च्छित होना कहा गया है। वायु, अग्नि, वरुण आदि देवताओं तथा ब्रह्मा का स्वयं आकर सीता को शुद्ध बताना कहा गया है। तब जाकर राम द्वारा सीता को स्वीकार किया जाना आदि कथाएँ दी गयी हैं। नागोजीभट्ट ने रामाभिरामी टीका में कहा है कि शास्त्रों के समन्वय की दृष्टि से महाभारत में अनुक्त होने पर भी सीता का अग्नि-प्रवेश मध्य में समझ लेना चाहिये, क्योंकि ‘रामचरित्र’ में वाल्मीकिरामायण ही मुख्य प्रमाण है। इतर शास्त्रीय वचनों को उसी के अनुसार ही लगाना चाहिये । अतएव पद्मपुराण में भी कहा गया है— ‘सा तेन गर्हिता साध्वी विविशे ज्वलनं सती ।’ राम के द्वारा गर्हित होने से सीता अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। उत्तरकाण्ड इस सम्बन्ध में मौन है बुल्के का ऐसा कहना भी अशुद्ध है। उत्तरकाण्ड के (४५वें सर्ग) में कहा गया है— ‘‘जानासि त्वं यथा सौम्य दण्डके विजने वने । रावणेन हृता सीता स च विध्वंसितो मया ॥ तत्र मे बुद्धिरुत्पन्ना जनकस्य सुतां प्रति । अशोषितामिमां सीतामानयेयं कथं पुरीम् ॥ प्रत्ययार्थं ततः सीता विवेश ज्वलनं तदा । प्रत्यक्षं तव सौमित्रे देवानां हव्यवाहनः ॥ अपापां मैथिलीमाह वायुश्चाकाशगोचरः । चन्द्रादित्यौ च शंसेते सुराणां संनिधौ पुरा ॥ ऋषीणां चैव सर्वेषामपापां जनकात्मजाम् । एवं शुद्धसमाचारा देवगन्धर्वसंनिधौ ॥ लङ्काद्वीपे महेन्द्रेण मम हस्ते निवेशिता । अन्तरात्मा च मे वेत्ति सीतां शुद्धां यशस्विनीम् ॥’’ (वा० रा ७।४५।५-१०) अर्थात् राम ने लक्ष्मण से कहा, सौमित्रे ! तुम जानते ही हो जिस तरह विजन वन में रावण ने जानकी का हरण किया और मैंने रावण का वध किया। वहाँ जनकजा के प्रति मेरे मन में बुद्धि उत्पन्न हुई कि लङ्का में दीर्घकाल पर्यन्त रहने के कारण मैं सीता को अयोध्या कैसे ले जा सकता हूँ। तब सीता ने प्रत्ययार्थ देवताओं के सन्निधान में अग्नि में प्रवेश किया। तुम्हारे समक्ष ही अग्नि ने सीता को पवित्र कहा, आकाशगोचर वायु तथा चन्द्र, आदित्य आदि ने देवताओं एवं ऋषियों के समक्ष सीता को निष्पाप कहा। वाल्मीकि के समक्ष भी राम ने कहा था— ‘‘प्रत्ययश्च पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसंनिधौ । शपथश्च कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता ॥’’ ( वा० रा० ७।९७।३ ) अर्थात् देवताओं के सन्निधान में पहले भी जानकी ने प्रत्यय दिया था और शपथ किया था तभी महलों में सीता लायी गयी थीं। बुल्के भी सीता द्वारा शपथ लिये जाने का उल्लेख करते हैं। वस्तुतः यह शपथ भी बुल्के द्वारा उद्धृत “सच्चकिरियम्” (सच्चक्रिया, ८६ अनु०) के समान थी जो कि अग्निप्रवेशरूप ही थी। महाभारत में रामोपाख्यान संक्षिप्त रूप से प्राप्त है, अतः उसमें अग्निपरीक्षा ही नहीं अन्य भी अनेक चरित्रों का अभाव हो सकता २७