रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० रामायणमीमांसा षष्ठ है। यदि रामायण की सारी बातों का उल्लेख हो तो फिर संक्षिप्तता ही कैसे हो ? इसी तरह अग्निपरीक्षा के बाद के सर्गों को प्रक्षिप्त कहना भी निस्सार है। फिर भी उसमें अग्नि द्वारा सीता का पवित्र होना कहा ही गया है। उसे बुल्के अग्निपरीक्षा का उपलक्षण क्यों नहीं मानते ? श्रीराम का विष्णु का अवतार होना बुल्के को मान्य नहीं। उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड से भिन्न बीच के पाँच काण्डों को वे प्रामाणिक कहते हैं। उनके द्वारा प्रामाणिक मान्य ‘युद्धकाण्ड’ में विस्तार से राम के परब्रह्म, अक्षरब्रह्म होने का प्रमाण मिलता है। तब उनके पास सिवा प्रक्षिप्त कहने के कोई चारा नहीं रह गया। वस्तुतस्तु कोई भी घटना एवं तद्विषयक इतिहास किसी की बुद्धि या इच्छा पर निर्भर नहीं। घटनासम्बन्धी इतिहास के आधार पर घटना का निर्णय करना उचित है। घटना औचित्य-अनौचित्य का भी अनुसरण नहीं करती। अन्याय तथा अत्याचार सम्बन्धी घटना अनुचित होने पर भी घटती ही है। अतः बुल्के या अन्य सभी को प्रामाणिक आर्ष इतिहास रामायण के आधार पर ही रामकथासम्बन्धी घटनाओं को मानना चाहिये। उन्हें अपनी बुद्धि के अनुसार घटनाओं के भाव तथा अभाव कहने का कोई अधिकार नहीं है। राम का सीता में प्रेम है, इसी लिए राम सीता के प्रति शङ्का नहीं कर सकते एवं परुष वचन नहीं बोल सकते, यह कल्पना सर्वथा गलत है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनुसार नारी का परगृह-निवास विशेष मर्यादातिक्रमण अत्यन्त शङ्कनीय तथा लोकापवाद का कारण होता है। इस दृष्टि से राम का सीता में अत्यन्त प्रेम होने पर भी सीता की शुद्धि अत्यन्त आवश्यक है। इसी दृष्टि से राम का परुष वचनों का प्रयोग और सीता का अग्निप्रवेश अत्यन्त स्वाभाविक है। कल्पनाएँ तो अनेक प्रकार की हो सकती हैं। परन्तु वस्तुस्थिति इतिहास के अनुसार ही जानी जाती है। कल्पनाओं के आधार पर घटना का ज्ञान असम्भव है। अध्यात्मरामायण, पद्मपुराण तथा रघुवंश आदि ग्रन्थों में सीता की अग्निपरीक्षा का विशद वर्णन है। 'नागपाश' का वृत्तान्त भी क्षेपक नहीं है; हाँ पाठों में कुछ भेद हो सकता है। कुम्भकर्ण ने नारदवर्णित विष्णु के अवतार द्वारा रावणवध का रहस्य बतलाया है, यह ठीक ही है। प्रामाणिक पाठ-भेद उपेक्ष्य नहीं है। उनकी उपपत्ति हो सकती है; यह अन्यत्र वर्णित है। उत्तरकाण्ड में ८-१७ आदि अनेक सर्गों में राम का अवतार होने का उल्लेख भी ठीक ही है। बुल्के कहते हैं—"प्रामाणिक काण्डों के अवतारवाद की सामग्री जो तीनों पाठों में मिलती है नही के बराबर है और जो सामग्री तीनों पाठों में मिलती है वह एक ऐसे अंश में पायी जाती है जो स्पष्टतया प्रक्षिप्त है।" बुल्के के उक्त विचारों का पूर्व में पूर्णतया खण्डन किया जा चुका है। अपनी भावना के अनुसार प्रक्षेप का वर्णन करना अत्यन्त असङ्गत है। बुल्के ने बारम्बार कई लोगों के समक्ष अपने को गोस्वामी तुलसीदास का अनन्य भक्त कहा है। तुलसीदास ने राम को परब्रह्म का अवतार माना है। अग्नि-परीक्षा का भी उल्लेख किया है। क्या गोस्वामी तुलसीदास के परम भक्त बुल्के के लिए तुलसीदास की उक्ति के विरुद्ध ऐसा अनर्गल प्रलाप उचित हो सकता था ? अनु० १२३ में वे लिखते हैं, "रामायण के प्रधान पात्र राम के अवतार होने से परिचित नहीं हैं। इस तर्क के विरुद्ध सम्भवतः कहा जा सकता है कि यह आवश्यक नहीं कि वे राम को अवतार समझें। फिर भी उत्तर- कालीन रामकाव्य में प्रायः सब पात्र राम को अवतार मानकर उनसे प्रार्थना करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि इस तर्क में कुछ तत्त्व है।"१ बुल्के का उपर्युक्त तर्क तर्क न होकर तर्काभास ही है। करुण-रस-प्रधान वाल्मीकि के आदिकाव्य में ऐश्वर्य- प्रधान कथाओं का विस्तार अभीष्ट नहीं था। रावण-वध के पूर्व ही राम के देवेश्वरत्व एवं वानर तथा भालुओं के देवत्व की प्रख्याति रावण-वध में बाधक हो सकती थी, क्योंकि ब्रह्मा के वरदान के प्रभाव से देव या देवेश्वर द्वारा १. रामकथा, पृष्ठ १३५।१ ।