रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंथा किसी देवता से नहीं। इस दृष्टि से रावणवध के अनन्तर ही सब देवता राम से मिले थे और उनकी स्तुति करते हुए उन्हें विष्णु या परब्रह्म कहा। 'सुन्दरकाण्ड' में हनुमान् ने स्पष्ट कहा है कि राम के सामने युद्ध में ब्रह्मा, रुद्र या इन्द्र कोई भी टिक नहीं सकता— “ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥” (वा० रा० ५।५१।४४) फिर भी इन्द्र को राम से श्रेष्ठ कह कर राम को इन्द्र के दर्शन के अयोग्य ठहराना बुल्के की धृष्टता और अज्ञान ही है । कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयसंहिता द्वितीयाष्टक द्वादश अनुवाक में निम्नाङ्कित एक आख्यायिका है। त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप का इन्द्र ने वध किया था, अतः त्वष्टा ने इन्द्ररहित सोमयाग किया। उसमें इन्द्र का आह्वान नहीं किया गया। इन्द्र ने यज्ञ का विघात कर बलात् सोमपान कर लिया। त्वष्टा ने अवशिष्ट सोम से इन्द्र-वध के लिए आहवनीय अग्नि में होम किया। उस होम में "इन्द्रशत्रो विवर्धस्व" मन्त्र का उच्चारण किया गया। इस मन्त्र का अर्थ है इन्द्र का शातयिता (घातक) पुरुष उत्पन्न होकर वृद्धि को प्राप्त हो । परन्तु मन्त्र में स्वर की त्रुटि हो गयी । तत्पुरुषसमास के अनुसार घातक पुरुष की उत्पत्ति हो सकती थी और उसका द्योतक अन्तोदात्त स्वर होता है। त्वष्टा ने मन्त्र में अन्तोदात्त स्वर का प्रयोग न कर भूल से आद्युदात्त स्वर का प्रयोग किया जो बहुव्रीहिसमास का द्योतक हो गया। इस स्वरदोष के कारण मन्त्र का "इन्द्र जिसका शातयिता (घातक) है, वह इन्द्रशत्रु वृद्धि को प्राप्त हो" ऐसा अर्थ हो गया, फलतः होम से वृत्रासुर उत्पन्न हुआ और वृद्धि को भी प्राप्त हुआ, परन्तु वह इन्द्र का घातक न हो सका। इन्द्र ही उसके घातक हुए। वह वृत्र, धनुष द्वारा प्रक्षिप्त बाण जितनी दूर जाता है उतने परिमाण में, प्रतिदिन बढ़ने लगा। इस वृद्धि के द्वारा उसने सब लोकों को आवृत्त कर लिया । उसका नाम वृत्र हुआ। उसकी इस वृद्धि से ही इन्द्र को ही भाँति स्वयं त्वष्टा भी चिन्तित हुए, अतः वृत्र को मारने के लिए इन दोनों ने मैत्री कर ली। त्वष्टा ने मन्त्र से अभिमन्त्रित जल से वज्र को सिक्त किया । वह वज्र अभिमन्त्रित होने से तपोरूप हो गया। इन्द्र उसे उठाने में समर्थ नहीं हुए। तब इन्द्र ने विष्णु से सहायता के लिए प्रार्थना की । वृत्रासुर के वीर्य का स्मरण कर इन्द्र भयभीत हुए। इन्द्र ने विष्णु से कहा कि हम दोनों वृत्र के वीर्य का हरण करे। विष्णु ने अपनी तीन मूर्तियाँ बनाकर उन्हें लोकरक्षा के लिए स्थापित किया। पृथिवी में स्थापित तीसरे विष्णु-शरीर को आगे कर इन्द्र ने विष्णु के पीछे स्थित होकर वज्र उठाया। वृत्र भयभीत हुआ। उसने कहा मेरे शरीर को मत मारो। मेरे शरीर के वीर्य (शक्ति) में पृथ्वी भर में व्याप्त हो जाने की क्षमता है। वह सब मैं तुम्हें देता हूँ। इन्द्र ने उसको स्वीकार कर विष्णु से कहा आप मुझको धारण करें, यह कहते हुए उस वीर्य को विष्णु के लिए सादर प्रदान कर दिया । विष्णु ने भी इन्द्र के हितार्थ ही उस वीर्य को ग्रहण किया । पुनश्च विष्णु का जो दूसरा रूप अन्तरिक्ष में था उससे युक्त होकर इन्द्र ने वज्र उठाया; फिर, वृत्र ने कहा, "मुझ पर प्रहार मत करो, मुझमें जो वीर्य है उसे मैं तुम्हें देता हूँ" और उसने प्रदान किया; इन्द्र ने ग्रहण किया और पुनः विष्णु से कहा कि पहले के समान दूसरी बार भी मुझको धारण करो (सँभालो) और विष्णु को वह वीर्य दे दिया। विष्णु ने इन्द्र के हितार्थ ही पुनः उस वीर्य को भी स्वीकार किया । पुनश्च द्युलोक में जो विष्णु का तीसरा रूप था उससे युक्त होकर इन्द्र ने वज्र उठाया; पुनः वृत्र ने भयभीत होकर अपना वीर्य प्रदान करने को कहा। इन्द्र ने अङ्गीकार किया । इस बार वृत्र ने कहा, "हम दोनों सन्धि कर लें। इन्द्र, मैं तुममें प्रवेश करूँगा ।" इन्द्र ने कहा मुझमें प्रवेश कर तुम मुझको ही खा जाओगे । वृत्र ने