रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २१९ इस तरह वामनरूप से भगवान् विष्णु इन्द्र के अनुज हुए और उपेन्द्र कहलाये । उपेन्द्र आख्यात होने पर भी वस्तुतः इन्द्र की अपेक्षा उपेन्द्र का ही सर्वाधिक महत्त्व एवं पूज्यता है—ठीक उसी तरह जैसे श्रीमद्भागवत और महाभारत के अनुसार श्रीकृष्ण बलराम के छोटे भाई हैं । अतः व्यवहारतः श्रीकृष्ण उनको प्रणाम करते हैं, उनकी आज्ञा भी मानते हैं तथापि श्रीकृष्ण ही पूर्ण परब्रह्म होने के कारण सर्वोत्कृष्ट एवं पूज्य हैं, बलराम श्रीकृष्ण के ही अंश और उपासक हैं । लोकदृष्ट्या श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से छोटे थे, भीष्म की दृष्टि से बहुत ही छोटे थे तो भी भीष्म, युधिष्ठिर आदि सभी कृष्ण के उपासक थे और उनको परब्रह्म और परम पूज्य मानते थे । अस्तु, उपेन्द्र इन्द्र के छोटे भाई होते हुए भी इन्द्र के लिए वैसे ही आदरणीय एवं पूज्य हैं जैसे बलराम के लिए श्रीकृष्ण । उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि विष्णु की अपेक्षा इन्द्र का श्रेष्ठत्व कहना निराधार है । वेदों में विष्णु को परब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु इन्द्र देवताओं के राजा देवश्रेष्ठमात्र हैं । विष्णु का स्वरूपभूत प्राप्य पद परम उत्कृष्ट है जिसे व्यवहारविरत विद्वान् सूरि ही देख पाते हैं। “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय ” ( ऋ० सं० १।२२।२१ ) “तद्विप्रासो विपन्यवः” ( ऋ० मं १।२२।२१) । मन्त्रों में कहा गया है कि पुराकाल में चतुर्मुख ने जिस परम पुरुष की स्तुति की है और प्रविद्वान् शक्र, इन्द्र ने भी जिसकी स्तुति की है उस परब्रह्म विष्णु को जानकर ही अमृतत्व मिलता है । जहाँ “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” (ऋ० सं० ६।४७।१८) आदि स्थलों में इन्द्र शब्द का परमेश्वर ही अर्थ है । वहाँ तो इन्द्र और विष्णु, दोनों एक ही तत्त्व हैं । अतः वहाँ एक के उत्कर्ष और दूसरे के अपकर्ष का प्रश्न ही असम्भव हो जाता है । बुल्के कहते हैं, “राम की विजय इन्द्र की सहायता से होती है । यह भी इन्द्र की श्रेष्ठता को सूचित करता है ।” किन्तु वस्तुस्थिति की सर्वथा उपेक्षा कर ही वे ऐसा कह पाते हैं । उपेन्द्र की सहायता से इन्द्र इन्द्रासन पर रह पाते हैं। इस दृष्टि से उपेन्द्र ही इन्द्र की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं, अतः इन्द्र उपेन्द्र से श्रेष्ठ हैं, ऐसा बुल्के का उपर्युक्त कथन सुतरां बाधित हो जाता है। यथार्थतः इन्द्रादि देवताओं के हितार्थ ही राम ने रावण का वध किया; अतः राम की सहायता करना इन्द्र का कर्तव्य ही था । यह सहायता भी वैसी ही थी जैसी की वानर और भालुओं द्वारा की गयी सहायता । क्या इससे यह तात्पर्य लिया जाय कि वानर और भालू राम से श्रेष्ठ थे ? बुल्के लिखते हैं,१ “इन्द्र शरभङ्ग से बातचीत करते हुए और राम को आते देखकर साथ के देवताओं से कहते हैं—राम इधर आ रहे हैं । उनके यहाँ आने के पूर्व ही हम लोग यहाँ से चले जायें, क्योंकि राम मुझको देखने योग्य नहीं हैं । जब राम रावण पर विजय प्राप्त करेंगे तब उनकी मुझसे भेंट होगी ( वा० रा० ३।५।२२ ) । इस वृत्तान्त से जो ध्वनि निकलती है वह विष्णु नारायण अक्षर ब्रह्म के अवतार राम ( वा० रा० ३।११।७) से कितनी दूर हैं ।” किन्तु इन्द्र के वाक्यों का यथार्थ अर्थ न समझ कर ही बुल्के वैसा कहते हैं गौ० पाठ के अनुसार— “यास्याम्यहमयं रामो यावन्मां नाभिभाषते । कृतार्थमेनमचिराद् द्रष्टास्म्यहमरिन्दम् ॥” हम लोग राम के भाषण से पहले चले जायें, शीघ्र कृतार्थ होनेपर राम को देखेंगे । दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार— “यतः समभिगच्छन्तं प्रेक्ष्य रामं शचीपतिः । शरभङ्गमनुज्ञाप्य विबुधानिदमब्रवीत् ॥ १. रामकथा, पृ० १३७ ।