रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ रामायणमीमांसा षष्ठ ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥ (वा० रा० ५।५१।१०४) क्या किसी मनुष्य में इतनी शक्ति है कि उसके सामने युद्ध में ब्रह्मा; इन्द्र तथा रुद्र भी खड़े नहीं रह सकते हों ? राम स्वयं कहते हैं कि यदि इच्छा करूँ तो अंगुली के अग्रभाग से ही पृथ्वी के सम्पूर्ण पिशाच, दानव तथा राक्षसों को मार सकता हूँ। क्या किसी जीव में ऐसी शक्ति हो सकती है ? “सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥ (वा० रा० ५।१८।३३ ) अर्थात् जो एक बार भी मेरी शरणागति स्वीकार करता है और मैं तुम्हारा हूँ ऐसी प्रार्थना करता है उसे मैं सभी भूतों से अभय प्रदान करता हूँ । क्या सर्वभूतों से अभय प्रदान करने की शक्ति ईश्वर से अतिरिक्त किसी जीव में भी सम्भव हो सकती है ? “विष्णुं मन्यामहे रामं मानुषं देहमास्थितम् ।” ( वा० रा० ६।३५।३६ ) उक्त वचन से स्पष्ट ही राम का विष्णु होना कहा जा सकता है । अहं सखा ते काकुत्स्थ प्रियः प्राणो बहिश्चरः ।” ( वा० रा० ६।५०।४६ ) राम से गरुड़ कहते हैं, मैं तुम्हारा प्राणतुल्य सखा हूँ। इससे भी राम विष्णु हैं यह सिद्ध होता है । “विष्णोरमीभांस्यभागमात्मानं प्रत्यनुस्मरन् ।” ( वा० रा० ६।५९।११० ) लक्ष्मण ने अपना विष्णु के अंशरूप से स्मरण किया । मन्दोदरी विलाप करती हुई अनेक श्लोकों से राम का अमानव तथा परमेश्वर होना कहती है । “यदैव वानरैर्घोरैर्बद्धः सेतुर्महार्णवे । तदैव हृदयेनाहं शङ्के रामो न मानुषः ॥” अर्थात् जब घोर वानरों ने महार्णव में सेतु बाँध लिया तभी मेरे दिल में शङ्का हो गयी थी कि राम मनुष्य नहीं हैं । वह यह भी कहती हैं कि राम सनातन परमात्मा हैं, अनादि, अनन्त, महान् से भी महान् हैं । तम से परे, शङ्ख-चक्रधारी, श्रीवत्सवक्षा शाश्वत विष्णु हैं— “व्यक्तमेष महायोगी परमात्मा सनातनः । अनादिमध्यनिधनो महतः परमो महान् ॥ तमसः परमो धाता शङ्खचक्रगदाधरः । श्रीवत्सवक्षा नित्यश्रीरजय्यः शाश्वतो ध्रुवः ॥ मानुषं रूपमास्थाय विष्णुः सत्यपराक्रमः । सर्वैः परिवृतो देवैर्वानरत्वमुपागतैः ॥ सर्वलोकेश्वरः श्रीमाँल्लोकानां हितकाम्यया ॥” ( वा० रा० ६।१११।११-१४ ) ऐसे अनेक उदाहरण रामायण के राम-प्रकरण में पाये जाते हैं । इतना ही नहीं, मन्दोदरी सीता को भी वसुधा की वसुधा और श्री की भी श्री कहती है ।