भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 280

अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०३ । इन सब के प्रक्षेप होने का कारण बतलाया गया है कि गौडीय पाठ में अवतार का उल्लेख नहीं है। उसमें ‘वनवासाय दीक्षितः’ शब्द है। परन्तु विचारणीय यह है कि कहीं गौडीय पाठ विरुद्ध होने से दाक्षिणात्य पाठ को ही अप्रामाणिक और कहीं दाक्षिणात्य पाठ विरुद्ध होने से गौडीय पाठ को ही अप्रामाणिक कहा जा रहा है तथापि उसका कोई स्पष्ट हेतु नहीं दिया जाता। इसके अतिरिक्त क्या बुल्के को यह मान्य है कि— (१) मरने के पश्चात् भी दशरथ राम से मिलने लङ्का आये ? (२) क्या दशरथ का यह कथन कि देवताओं के कारण ही राम को वनवास हुआ मान्य है ? (३) क्या ये सब बातें अस्वाभाविक नहीं हैं ? फिर जिस गौडीय पाठ में वे अवतार का उल्लेख नहीं है, ऐसा मानते हैं उसमें भी तो ‘प्रविष्टो मानुषीं तनुम्’ यह स्पष्ट अवतार वाद सिद्ध हो ही रहा है। वे पुनः लिखते हैं “इसके बाद दशरथ लक्ष्मण को भी सम्बोधित करके राम को पुरुषोत्तम, अक्षर ब्रह्म आदि मानते हैं यह अंश तीनों पाठों में मिलता है, लेकिन वह राम-दशरथसंवाद का अनुकरण प्रतीत होता है ।” बाह रे बुल्के, जब खण्डन का वश न चला तो अनुकरण मात्र कह चले । बुल्के के कथनानुसार उपर्युक्त अंश तीनों पाठों में मिलता है तथापि उसको भी ‘अनुकरणमात्र’ कहते हुए क्षेपकमात्र कह दिया गया है। स्पष्ट हैं कि उनके द्वारा उठायी गयी पाठ-विशेष की चर्चा व्यर्थ है, क्योंकि वे स्वयं किसी एक सिद्धान्त को आधार बना कर उसपर स्थिर नहीं रह पाये हैं । आधारभूत तर्कों द्वारा नहीं, अपितु येन केन प्रकारेण अवतारबोधक वचनों को प्रक्षिप्त सिद्ध करने का प्रयास किया गया है । अग्नि-परीक्षा के समय ब्रह्मा आदि देवता आकर राम की विष्णुरूप से स्तुति करते हैं। अन्य भी अनेक श्लोक अवतारवाद के बोधक हैं, जिनका बुल्के ने स्पर्श भी नहीं किया है । रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः । राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाभिव वासवः ॥” ( वा० रा० ३।३७।१३ ) “अप्रमेयं हि तत्तोजो यस्य सा जनकात्मजा । न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने ॥” ( वा० रा० ३।३७।१८ ) “कर्तारमपि लोकानां शूरं करुणवेदिनम् । अज्ञानादवमन्येरन् सर्वभूतानि लक्ष्मण ॥” ( वा० रा० ३।६४।५४ ) “त्रैलोक्यं तु करिष्यामि संयुक्तं कालकर्मणा ॥” ( वा० रा० ३।६४।६४ ) “नाशयामि जगत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । यावद् दर्शनमस्या वै तापयामि च सायकैः ॥” ( वा० रा० ३।६४।७१ ) “त्वमप्रमेयश्च दुरासदश्च जितेन्द्रियश्चोत्तमधर्मकश्च । अक्षीणकीर्तिश्च विचक्षणश्च क्षितिक्षमावान् क्षतजोपमाक्षः ॥” ( वा० रा० ४।२४।३१ ) राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः । रामो दाशरथिः श्रीमान् प्रविष्टो दण्डकावनम् ॥” ( वा० रा० ४।५२।४ ) इत्यादि वचन भी राम की ईश्वरता का बोधन करते हैं । किष्किन्धाकाण्ड में भी उपर्युक्त श्लोकों द्वारा राम की अप्रमेयता और सर्वलोक-शासकत्वरूप ईश्वरत्व कहा गया है ।