रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ रामायणमीमांसा षष्ठ सुमित्रा भी कहती है—( अयोध्याकाण्ड में ही, जिसे बुल्के क्षेपक नहीं मानते । ) "सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभो प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्र्या कीर्त्याः कीर्तिः क्षमा-क्षमा ॥ देवतं देवतानां च भूतानां भूतसत्तमः । तस्य के ह्यगुणा देवि वने वाप्यथवा पुरे ॥ (वा० रा० २।४४।१५,१६) अर्थात् राम सूर्य के भी सूर्य, अग्नि के भी अग्नि, श्री के भी श्री, कीर्ति के कीर्ति; क्षमा के क्षमा और देवताओं के देवता हैं । सभी भूतों में जो अबाधित सर्वोत्कृष्ट सत्ता है वही राम हैं । अस्तु, अयोध्याकाण्ड के ये श्लोक भी श्रीराम की परब्रह्मता के ही बोधक हैं। इनको क्षेपक कहने का साहस बुल्के भी न कर सके, अतः या तो उन्होंने जानबूझकर इनसे आँखें चुरा लीं, अथवा उनके तात्पर्य से अपरिचित रहे या इनपर उनका ध्यान गया ही नहीं । श्रीबुल्के लिखते हैं, "मन्दोदरी-विलाप तीनों पाठों में मिलता है। दाक्षिणात्य पाठ में इसका विस्तार १२५ श्लोकों में है, गौडीय पाठ में ८२ श्लोकों में तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ में केवल ६३ श्लोकों में है। तीनों में राम को विष्णु का अवतार कहा गया है । लेकिन दाक्षिणात्य पाठ के जिन श्लोकों में इसका उल्लेख हुआ है वे अन्य पाठों के अवतार-सम्बन्धी श्लोक दाक्षिणात्य पाठों में नहीं पाये जाते । उदाहरणार्थ— गौडीय पाठ "अथवा रामरूपेण विष्णुश्च स्वयमागतः । तव नाशाय मायाभिः प्रविश्यानुपलक्षितः ।" ( वा० रा० ६।१११।९ ) दाक्षिणात्य पाठ "अथवा रामरूपेण कृतान्तः स्वयमागतः । मायां तव विनाशाय विधायाप्रतर्किताम् ॥" ( वा० रा० ६।१११।९ ) इससे यह ध्वनि निकलती है कि स्वतन्त्र रूप से तीनों पाठों में अवतारवादी सामग्री बाद में आ गयी है ।" उपर्युक्त वचनों के क्षेपक होने में कोई हेतु नहीं दिया गया है। जब मन्दोदरी-विलाप को क्षेपक नहीं कहने का कारण उनका तीनों पाठों में प्राप्त होना है तब तीनों पाठों में प्राप्त अवतार-सामग्री ही बाद में स्वतन्तरूप से आ गयी यह कैसे कहा जा सकता है ? अतः बुल्के का यह कथन भी निराधार ही है। बुल्के लिखते हैं, अग्निपरीक्षा के समय देवता आकर राम की विष्णुरूप में स्तुति करते हैं । इस सर्ग के प्रक्षेप होने में कोई सन्देह नहीं है इसमें सीता और लक्ष्मी की अभिन्नता का भी उल्लेख है । दाक्षिणात्य पाठ में दशरथ राम से कहते हैं कि वह पुरुषोत्तम ही हैं— "इदानीं च विजानामि यथा सौम्य सुरेश्वरैः । वधार्थं रावणस्येह पिहितं पुरुषोत्तमम् ॥ ( वा० रा० ६।११९।१७ गौडीय पाठ में इस श्लोक में अवतार का उल्लेख नहीं है । "इदानीं च विजानामि यथा सौम्य सुरेश्वरैः । वधाय रावणस्येह वनवासाय दीक्षितः । वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ॥” ( वा० रा० ६।११७।२८)