भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

अध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन २०१ बुल्के इस श्लोक को भी प्रक्षिप्त कहते हैं, परन्तु कोई स्पष्ट कारण नहीं दे पाते । सिर्फ पाठभेद की ही चर्चा करते हैं। इसी तरह निम्नाङ्कित श्लोकों को भी वे प्रक्षिप्त ही मानते हैं । “दिव्यं च मानुषं चैवमात्मनश्च पराक्रमम् ।” ( वा० रा० ३।६६।१९ ) “दिव्यं त्वं मानुषं चास्त्रमात्मनश्च पराक्रमम् ।” ( गौ० रा० २।७१।१६ ) निम्नाङ्कित श्लोक गौडीय पाठ में नहीं मिलता अतः उसको भी प्रक्षेप मानते हैं। वस्तुतः इन श्लोकों से भी राम का अवतार होना सिद्ध होता है । “नमोऽस्तु रामाय सलक्ष्मणाय देव्यै च तस्यै जनकात्मजायै । नमोऽस्तु रुद्रेन्द्रयमानिलेभ्यो नमोऽस्तु चन्द्राग्निमरुद्गणेभ्यः ॥” ( वा० रा० ५।१३।५७ ) बुल्के द्वारा प्रस्तुत तर्क स्वयं ही अपना खण्डन करते हैं। कोई श्लोक गौडीय पश्चिमोत्तरीय पाठ में न होने के कारण क्षेपक है, परन्तु अन्य कुछ श्लोक जो अवतारबोधक हैं और तीनों पाठों में मिलते हैं, वे भी क्या क्षेपक ही हो सकते हैं । स्पष्ट ही उनके लिए किसी श्लोक का किसी पाठ में होने न होने का प्रश्न अकिञ्चित्कर ही है । इसी तरह उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप मानने का उन्होंने यह हेतु दिया है कि उसकी कथाओं का उल्लेख अन्य प्रामाणिक काण्डों में नहीं मिलता । तदनन्तर बालकाण्ड को प्रक्षिप्त कह कर पांच काण्डों को प्रामाणिक कहा, फिर उन काण्डों के श्लोकों को भी बिना किसी प्रमाण प्रक्षेप कहने लगे । “लङ्घनं च समुद्रस्य दर्शनं च हनूमतः । वधं च रक्षसां युद्धे कः कुर्यान्मानुषो युधि ॥” ( वा० रा० ६।३४।२२ ) “गरुडाधिष्ठितावेतावुभौ राघवक्ष्मणौ ॥” ( वा० रा० ६।५०।२२ ) वस्तुतः अयोध्याकाण्ड में भी बहुत से श्लोक ऐसे हैं जो राम को परब्रह्म ईश्वर सिद्ध करते हैं जैसे— “यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति । निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥” ( वा० रा० २।१७।१४ ) जो राम को नहीं देख पाता और राम जिसको नहीं देखते वह सब लोकों में निन्दित है । उसका आत्मा ( अन्तःकरण ) भी उसकी निन्दा करता है । यह श्लोक भी अवतार का सूचक है। ईश्वर ही के न जानने से प्राणी की अकृतार्थता और निन्द्यता सिद्ध होती है । “लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः । ( वा० रा० २।३७।३२ ) लोक में ऐसा कोई नहीं जो राम का अनुव्रत न हो, क्योंकि राम ही प्राण के प्राण और जीव के जीवन हैं, अतः प्राणिमात्र के परम प्रेमास्पद हैं । जाने बिना जाने राम के आस्तिक-नास्तिक सभी भक्त हैं । जब प्रत्येक प्राणी प्राण, सुख और जीवन का आदर करता है तो जो प्राण का प्राण, सुख का सुख तथा जीव का जीवन हैं उसमें अनुरक्ति होनी ही चाहिए । जैसे नित्य दाहकत्ववाले अग्नि के संसर्ग से ही लौह आदि में भी अनित्य दाहकत्व आदि होता है वैसे ही शब्दादि के नित्य प्रकाश सामर्थ्यवाले ब्रह्म के सम्बन्ध से ही प्राण, श्रोत्र, नेत्र, आदि में अपने-अपने विषय को प्रकाशित करने की क्षमता आती है। इसी दृष्टि से कहा गया है— “लोके नहि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ।”