भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 277

“इह राम महाबाहो विष्णुर्देवनमस्कृतः । वर्षाणि सुबहूनीह तथा युगशतानि च ॥ तपश्चरणयोगार्थमुवास सुमहत्तपाः ॥” (वा० रा० १।२९।२, ३) इससे स्पष्ट है कि विश्वामित्र राम के अवतार होने से अनभिज्ञ हैं। १ उक्त कथन भी असङ्गत है। व्यावहारिक भिन्नता ही विश्वामित्र के कथन का आधार है। जैसे नाटक में नट जब जिस रूप को धारण करता है तब उसी रूप से वह व्यवहार करता है। उसके वास्तविक रूप से व्यवहार प्रायेण नहीं होता। इसी तरह उस समय श्रीराम विश्वामित्र के शिष्यरूप से ही उनके साथ थे, विष्णुरूप से नहीं, अतः शिष्यवत् व्यवहार ही उचित था। गूढ़रूप से विश्वामित्र ने उसी प्रसङ्ग में श्रीराम को विष्णु सूचित किया ही है— “अद्य गच्छामहे राम सिद्धाश्रममनुत्तमम् । तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम ॥” (वा० रा० १।२९।२४) हे राम ! हम लोग सिद्धाश्रम में जा रहे हैं; वह आश्रम जैसा मेरा है वैसा ही आप का भी है। क्योंकि आप विष्णुरूप हैं। “अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् । वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः ॥” (वा० रा० १।१९।१४, १५) विश्वामित्र कहते हैं सत्यपराक्रम राम को मैं जानता हूँ; महातेजा वसिष्ठ तथा अन्य भी तपोनिष्ठ राम को जानते हैं। तात्पर्य यह कि राम साक्षात् परब्रह्म हैं। उन्हें वसिष्ठ और तपोनिष्ठ लोग जानते हैं। सर्व- साधारण नहीं। अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग के ७ वें श्लोक को भी बुल्के प्रक्षिप्त मानते हैं— “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥” (वा० रा० २।१।७) दृप्त रावण के वधार्थी देवताओं की प्रार्थना से सनातन विष्णु राम के रूप में अवतीर्ण हुए। यद्यपि यह श्लोक भी तीनों ही पाठों में मिलता है। बुल्के के ऐसे कथन का कारण स्पष्ट है। वे लोग रामायण के आधार पर रामायणीय तत्त्वों का विचार नहीं करते। उन्होंने अपनी यह धारणा बना ली है कि राम परब्रह्म नहीं हैं, क्योंकि रामायण में ऐसा उल्लेख नहीं है। अतः रामायण में राम के अवतार होने के जो प्रमाण मिलते हैं उनको वे प्रक्षेप कहने लगते हैं। परन्तु यह तर्कविरुद्ध है। इस तरह से तो किसी भी ग्रन्थ की मुख्य से मुख्य बातों को भी प्रक्षेप कह कर झुठलाया जा सकता है। बुल्के आदि का कहना है कि “अयोध्याकाण्ड में अन्यत्र भी कहीं राम के अवतार होने का निर्देशमात्र भी नहीं है, अतः उपर्युक्त श्लोक प्रक्षिप्त है।” यहाँ प्रश्न होता है कि यदि अन्यत्र भी कहीं इस आशय के निर्देश मिलते तो क्या बुल्के उनको भी प्रक्षेप नहीं कह देते ? अरण्यकाण्ड में राम के पराक्रम का वर्णन करते हुए अकम्पन कहते हैं कि राम समस्त लोकों का नाश करके सबकी पुनः सृष्टि करने में समर्थ हैं— “संहृत्य वा पुनर्लोकान्विक्रमेण महायशाः । शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः ॥” (वा० रा० ३।३१।२६) १. रामकथा, पृष्ठ १३० ।