रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन १९९ द्वारा आश्वासन दिया गया होता तो निश्चय ही पुत्रेष्टियज्ञ की अपेक्षा न होती। पर बुल्के की तो केवल बातों को तोड़मरोड़कर धोखा देना ही आता है। राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे, इसके विरोधी वादों का खण्डन “अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम् । न चेयं मम काकुत्स्थ व्रीडा भवितुमर्हति ॥ त्वया त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृतः ॥” (वा० रा० १।७६।१७,१९) श्रीराम से परशुराम ने कहा : “आप आदि और अन्त रहित अविनाशी मधुहन्ता (मधुसूदन) हैं, सुरेश्वर हैं, ऐसा मैं जानता हूँ। आप से पराजित होना मेरे लिए कोई लज्जा की बात नहीं है।” उक्त श्लोक यद्यपि तीनों ही पाठों में प्राप्त हैं तथापि बुल्के इन्हें प्रक्षिप्त ही मानते हैं। और कहते हैं कि बालकाण्ड के रचना-काल में राम अवतार नहीं माने जाते थे इसका बालकाण्ड में ही स्पष्ट प्रमाण है। इतने पर भी कोई प्रमाण उपस्थित करने में समर्थ नहीं हुए। उनके द्वारा उपस्थापित प्रमाण भी प्रमाणाभास ही हैं, जैसा कि पीछे स्पष्ट किया गया है। बुल्के लिखते हैं, राम का उत्कर्ष प्रथम सर्ग का वर्ण्य विषय है। फिर भी उसमें उनके अवतार होने का उल्लेख नहीं है; केवल विष्णु से उनकी तुलना की जाती है। (विष्णुना सदृशो वीर्ये’ श्लोक १८) और अन्त में कहा जाता है कि राम अपना राज्य भोगकर ब्रह्मलोक जायेंगे— “रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।” (वा० रा० १।१।९७) यदि कवि राम को विष्णु का अवतार मानता होता तो उनकी इहलीला समाप्त होने पर उनके ब्रह्मलोक जाने का उल्लेख नहीं करता। इस तर्क की सङ्गति इससे स्पष्ट है कि उदीच्य पाठ में ब्रह्मलोक के स्थान में ‘विष्णु- लोक’ रखा गया है।”१ बुल्के का यह तर्क भी उनका भारतीय-शास्त्रों के अज्ञान के ही कारण है। श्रीराम रावणवध के लिए नररूप में अवतीर्ण हुए, क्योंकि स्पष्ट विष्णुरूप से प्रकट होने पर ब्रह्मा के वरदान के अनुसार रावण को मार नहीं सकते थे, अतः श्रीराम विष्णु होते हुए भी व्यवहारतः विष्णु से भिन्न रूप में थे। इसलिए उन्हें विष्णु के तुल्य कहा गया है। बुल्के की ब्रह्मलोकसम्बन्धी शङ्का भी निर्मूल है; क्योंकि वहाँ ‘ब्रह्म’ शब्द से चतुर्मुखी ब्रह्मा न होकर सगुण ‘ब्रह्म’ ही अर्थ है। सम्पूर्ण उपनिषदों में तथा ब्रह्मसूत्र में ब्रह्मलोक शब्द का वही अर्थ ग्राह्य है। यथातो ब्रह्मजिज्ञासा (ब्र० सू० १।१।२); ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः (ब्र० सू० ४।४।५); अतएव टीकाकार नागेश ने भी ब्रह्मलोकं मायिकवैकुण्ठादिलोकम् अर्थ किया है। बुल्के पुनः लिखते हैं विश्वामित्र ताड़का के वध करने का अनुरोध कर विष्णु द्वारा भृगु-पत्नी के वध का उदाहरण देते हैं— “विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी पतिव्रता । अनिन्द्रं लोकमिच्छन्ती काव्यमाता निषूदिता ॥” (वा० रा० १।२५।२१ तथा सिद्धाश्रम के विषय में कहते हैं कि विष्णु ने वहाँ तप किया— १. रामकथा, पृ० १३० ।