रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ रामायणमीमांसा षष्ठ अनन्तर पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन प्रारम्भ होता है। यह होते हुए भी १८ वें सर्ग के प्रारम्भ में अश्वमेध ही की समाप्ति पर— “निवृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे ।” देवताओं तथा राजाओं के प्रस्थान का उल्लेख किया गया है। जिसमें स्पष्ट है कि पहले १४ वें सर्ग के पश्चात् १८ वाँ सर्ग ही आता था ।१” वस्तुतः बुल्के का उपर्युक्त कथन या तो श्लोकों के अर्थ के अज्ञानमूलक है अथवा दुरभिसन्धिमूलक, क्योंकि यहाँ जानबूझकर प्रसङ्ग को छिपाने का प्रयास किया है, ऋष्यशृङ्ग ने ब्राह्मणों को दक्षिणा दिये जाने के बाद ही चार पुत्रों के होने का आश्वासन नहीं दिया, किन्तु दक्षिणा देने के अनन्तर राजा दशरथ ने ऋष्यशृङ्ग से पुनः प्रार्थना की कि कुलवर्धन (सन्तानोत्पत्ति) का जो उपायभूत कर्म है उसे कीजिये । तब ऋष्यशृङ्ग ने 'तथास्तु' कहते हुए कुल- वर्धन चार पुत्र होने का आश्वासन दिया। “ततोऽब्रवीदृष्यशृङ्गं राजा दशरथस्तदा । कुलस्य वर्धनं तत्तु कर्तुमर्हसि सुव्रत ॥ तथेति च स राजानमुवाच द्विजसत्तमः । भविष्यन्ति सुता राजंश्चत्वारस्ते कुलोद्वहाः ॥” (वा० रा० १।१४।५८,६०) वहीं टीकाकार नागेशभट्ट कहते हैं, “यद्यपि पुत्रकामेष्ट्यैव पुत्रप्राप्तिः सम्भवति तथापि तपोरतस्य वैश्यस्य श्रवणस्य वधेन तद्वियोगातुरतपोरततन्मातृपितृमरणेन च ब्रह्मवधसमपापोत्पत्त्या तत्प्रायश्चित्तत्वेनाश्वमेधा- नुष्ठानं बोध्यम्” अर्थात् यद्यपि पुत्रप्राप्ति तो पुत्रेष्टि से ही संभव थी तथापि तपोनिष्ठ वैश्यजातीय श्रवण का वध होने पर उसके वियोग से सन्तप्त तपोनिष्ठ उसके माता-पिता के मरने से ब्रह्मवध के समान पाप उत्पन्न हो गया था उसके प्रायश्चित्तरूप से पहले अश्वमेध का अनुष्ठान किया गया । अतः यहाँ अश्वमेध परम्परा से हो पत्रोत्पत्ति का कारण बना पुत्रोत्पत्ति का वेदोक्त उपाय पुत्रेष्टि ही है। कुल-वर्धन कर्म करने की प्रार्थना को 'तथेति' (तथास्तु) शब्द से स्वीकार करके ऋष्यशृङ्ग ने उसके द्वारा ही चार पुत्र होने का आश्वासन दिया था। १५ और १६ वें सर्ग में पुत्रेष्टियज्ञ और विष्णु के अवतार ग्रहण का आश्वासन वर्णित है । १७वें सर्ग में विष्णु के सहायतार्थ देवताओं के भी अवतार की कथा कही गयी है और १८वें सर्ग में प्रधानावतार रामावतार की कथा कही है। “निवृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे महात्मनः । प्रतिगृह्यामरा भागान् प्रतिजग्मुर्यथागतम् ,।” (वा० रा० १।१८।१) नागेश के अनुसार पुत्रेष्टियुते हयमेधे निर्वृत्ते इति शेषः अर्थात् पुत्रेष्टियुक्त हयमेध के समाप्त होने पर देवता लोग अपना भाग लेकर जैसे आये थे वैसे ही चले गये । इस तरह १८वें सर्ग की पूर्ण सङ्गति लग जाती है। वेदों में ही ब्रह्मवधादि के प्रायश्चित्त के लिए अश्वमेध विहित है, अतः पुत्र-प्राप्ति में प्रतिबन्धक पाप की निवृत्ति के लिए अश्वमेध किया गया । पुत्र-प्राप्ति के लिए वेदों में पुत्रेष्टि का अनुष्ठान विहित है, अतः दशरथ ने ऋष्यशृङ्ग से कुल-वर्धन कर्म करने की प्रार्थना की । यहाँ कुल-वर्धन कर्म का तात्पर्य पुत्रेष्टियज्ञ में ही है। मुनि ने 'तथेति' (तथास्तु) कहते हुए स्वीकार किया और चार पुत्र होने का आश्वासन दिया । यदि दशरथ द्वारा की गयी प्रार्थना के पूर्व ही ऋष्यशृङ्ग
१. रामकथा, पृ० २८९-२९०, अनु० ३३३ ।