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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 274

अध्याय उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९७ उपर्युक्त कथन भी निःसार है । अधिकांशतः मङ्गलान्त या सुखान्त काव्यों को ही लोग अधिक पसन्द करते हैं । विशेषतः नाटकों में उसका बहुत ध्यान रखा जाता है। यही कारण है कि रामाभिषेक अथवा राम-राज्य- स्तुति जैसे महान् माङ्गलिक स्थलों पर ग्रन्थ की समाप्ति की गयी है । परन्तु महर्षि वाल्मीकि को तो अपने काव्य के नायक का साङ्गोपाङ्ग सम्पूर्ण जीवनचरित्र देना वाञ्छित था; उनका ग्रन्थ रामकथा का आदिकाव्य, मूल ग्रन्थ है । मूल ग्रन्थ में साङ्गोपाङ्ग सम्पूर्ण चरित्र का उल्लेख अनिवार्य है। अन्य ग्रन्थों में इसके आधार पर यथेष्ट सामग्री लेकर उसका उपयोग किया गया है। निश्चय ही बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड दोनों में से किसी एक के बिना सीता और राम का चरित्र-चित्रण अधूरा ही रह जाता । बुल्के के मतानुसार ये दोनों ही काण्ड अस्वाभाविक हैं। उनकी यह मान्यता केवल भ्रम ही है। वैसे, एक तरह से वह भी पूर्वकाण्ड की समाप्ति युद्धकाण्ड में ही करते हैं, परन्तु, चरित्र-पूर्ति के लिये उत्तरकाण्ड का निर्माण करना अनिवार्य ही था; इतर लोगों ने उनके पूर्वकाण्ड का ही अनुकरण किया था और दुःखान्त होने के कारण उत्तर- काण्ड की उपेक्षा की । प्रक्षिप्त सामग्री का उल्लेख करते हुए बुल्के लिखते हैं, "पुत्रेष्टियज्ञ (सर्ग १५-१८); इसमें विष्णु का अवतार लेना विस्तार से वर्णित है। ये सर्ग बालकाण्ड में प्रक्षिप्त माने जाने चाहिये ।'”१ "आठवें अध्याय में समस्त बालकाण्ड के प्रक्षिप्त माने जाने के कारण दिये गये हैं; अतः बहुत सम्भव है कि वाल्मीकिकृत रचना में अयोध्या, दशरथ तथा उनके पुत्रों के परिचय के बाद अयोध्याकाण्ड की कथावस्तु का वर्णन प्रारम्भ हुआ हो ।" २ परन्तु बुल्के को यह भी बताना चाहिये कि जब अयोध्याकाण्ड में अयोध्या तथा दशरथ और उनके पुत्रों के परिचय का उल्लेख नहीं है और जिस बालकाण्ड में उन विषयों का उल्लेख है उस समस्त बालकाण्ड को वे प्रक्षिप्त कहते हैं तब क्या अकस्मात् 'गच्छता मातुलकुलम्' अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग से रामायण का आरम्भ होना सङ्गत है ? क्या यह बुल्के की दृष्टि से ही उनके द्वारा समस्त बालकाण्ड को प्रक्षिप्त मान लेने को गलत सिद्ध नहीं करता ? बुल्के कहते हैं कि "महाभारत के द्रोणपर्व, हरिवंश, विष्णुपुराण आदि के प्राचीन वृत्तान्तों में भी वनवास से ही लेकर रावण-वध तक की रामकथा का वर्णन किया गया है, "३ परन्तु महाभारत के द्रोणपर्व, हरिवंश, विष्णुपुराण आदि में भी कुछ न कुछ भूमिका के साथ ही वनवास का वर्णन है। और महाभारत के रामोपाख्यान में तो वाल्मीकि रामायण का अनुसरण है ही । आगे बुल्के पुनः लिखते हैं, "दो स्थलों को छोड़कर बालकाण्ड में और कहीं भी अवतारवाद की ओर निर्देश नहीं किया गया है। यही नहीं, वरन् उसकी शेष सामग्री से भी स्पष्ट है कि मूल बालकाण्ड के रचना-काल में राम विष्णु के अवतार नहीं माने जाते थे । अतः ये दोनों स्थल (अर्थात् दशरथ के पुत्रेष्टियज्ञ तथा राम, परशुराम भेंट का वर्णन) बालकाण्ड के अन्तिम विकास के समय जोड़ दिये गये होंगे । पुत्रेष्टियज्ञ के प्रक्षिप्त होने के स्पष्ट प्रमाण बालकाण्ड में मिलते हैं। सर्ग ८ में दशरथ सुतार्थ अश्वमेघ यज्ञ करवाने का सङ्कल्प करते हैं। सर्ग १३ और १४ में अश्वमेघ यज्ञ का वर्णन किया गया है। १४ वें सर्ग में ब्राह्मणों को दक्षिणा दिये जाने के उल्लेख के बाद ऋष्यशृङ्ग दशरथ को आश्वासन देते हैं कि उनके चार पुत्र उत्पन्न होंगे । “भविष्यन्ति सुता राजंश्चत्वारस्ते कुलोद्वहाः ॥ ५९ ॥” ऋष्यशृङ्ग के इस आश्वासन के पश्चात् पुत्रेष्टि की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती है। फिर भी इसके १. रामकथा, पृ० १२९, अनु० ११८ । २. वही, पृ० २८९; अनु० ३३३ । ३. वही, अनु० ३३३ ।

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