रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९६ रामायणमीमांसा षष्ठ निषद्, शुक्लयजुःसंहिता का ४०वाँ अध्याय है। उसमें पहले मन्त्र में तत्त्व-ज्ञान की बात उठायी गयी है। दूसरे में कर्मकाण्ड की बात आ गयी । पुनः तत्त्व-ज्ञान की बात आ गयी । अकस्मात् विद्या-अविद्या के समुच्चय की और सम्भूति-असम्भूति से समुच्चय की चर्चा है। क्या पाश्चात्यों की धारणा के अनुसार कर्म-काण्ड के मन्त्रों को क्षेपक मान लिया जाय ? प्रामाण्यवादी तो ग्रन्थ के अनुसार उनका तात्पर्य समझ कर सङ्गति लगाते हैं। क्षेपक या असङ्गत समझ कर वेद पर पर्य्यनुयोग नहीं किया जा सकता । “अर्थमवबोद्धुं प्रभवामः न तु पर्य्यनुयोक्तुं शक्यामः ॥” पुनः बुल्के कहते हैं१ “उत्तरकाण्ड तथा अन्य काण्डों में पारस्परिक विरोधी बातें भी मिलती हैं। उदाहरणार्थ युद्धकाण्ड के अन्तिम सर्ग में सुग्रीव, विभीषण आदि के चले जाने का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। फिर भी उत्तरकाण्ड में पुनः इनके प्रस्थान का वर्णन किया जाता है।” उपर्युक्त कथन भी अकिञ्चित्कर है, क्योंकि युद्धकाण्ड में किये गये संक्षिप्त वर्णन का ही उत्तरकाण्ड में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसमें पारस्परिक विरोध की गुञ्जाइश ही नहीं। भाष्यों में तो बहुधा सूत्रानुकारी वाक्यों के द्वारा प्रथम अपने मन्तव्य को संक्षिप्त रूप में कहकर बाद में उसका विस्तार किया जाता है। महाभारत में सञ्जय युद्ध की घटनाओं को पहले संक्षेप में धृतराष्ट्र को सुना देते हैं और तदनन्तर उसका विस्तार से वर्णन करते हैं। इसी तरह यह कहना भी निस्सार है कि उत्तरकाण्ड में प्राप्त वेदवती २ का वृत्तान्त यदि प्रक्षिप्त न होता तो इसका उल्लेख रामायण के अन्य काण्डों में जहाँ सीता के जन्म-प्रसङ्ग का वर्णन हुआ है वहाँ अवश्य किया जाता, क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि जो वर्णन किसी एक काण्ड में हो वह अन्य काण्डों में भी अवश्यम्भावी है। उदाहरणार्थ, वेदों में सम्भूति एवं असम्भूति का वर्णन केवल शुक्लयजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के अन्त में ही है अन्यत्र नहीं। क्या इस आधार पर वह क्षेपक माना जा सकता है ? वेद की एक शाखा में पञ्चाग्नि विद्या में ६ अग्नियों का उल्लेख है पर अन्य शाखा में ५ ही अग्नियों का उल्लेख है, अतः यह कहा जा सकता है कि यदि यह अंश प्रक्षिप्त न होता तो अन्य शाखा में जहाँ पञ्चाग्नि विद्या का वर्णन है वहाँ भी ६ अग्नियों का ही उल्लेख होना चाहिये था ? यह सब असङ्गत कथन है। ब्रह्मसूत्रों में ऐसी सब शाखाओं के पाठों का समन्वय कर ही उपासना के स्वरूप का निर्धारण किया गया है। इसी हेतु गुणोपसंहारानुपसंहार का विचार किया जाता है। यदि निश्चित हो जाय कि दोनों शाखाओं के कर्म या उपासना एक ही हैं तो एक शाखा में अनुक्त गुण का भी दूसरी शाखा में उक्त होने से, सङ्ग्रह कर लिया जाता है। भारत- प्रसिद्ध हेमाद्रि, पराशरमाधव, मिताक्षरा, व्यवहारमयूख आदि सभी निबन्ध ग्रन्थों में यत्र-तत्र स्थित वचनों का भी मीमांसा-दृष्टि से समन्वय कर ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है। पुनः बुल्के कहते हैं- "वाल्मीकिकृत रामायण के इन अन्तरङ्ग प्रमाणों के अतिरिक्त एक बात और ध्यान देने योग्य है। महाभारत का रामोपाख्यान रामायण के किसी प्राचीन रूप पर निर्भर है। इसके प्रारम्भ में रावण- चरित की कुछ सामग्री अवश्य मिलती है, किन्तु वह आदिरामायण की तरह रामाभिषेक तथा रामराज्य की स्तुति पर समाप्त होता है। आदिरामायण तथा रामोपाख्यान के कारण एक परम्परा चल पड़ी और शताब्दियों तक चलती रही, जिसके अनुसार रामचरित का वर्णन उनके अभिषेक पर समाप्त किया जाता है। उदाहरणार्थ-रावणवह, भट्टिकाव्य, कुमारदास-कृत जानकीहरण, अभिनन्दन-कृत रामचरित, भासकृत अभिषेकनाटक, मुरारि का अनर्घ-राघव, राजशेखर का बालरामायण, कम्बन्कृत प्राचीनतम तमिलरामायण, तेलगु द्विपदरामायण तथा जावा का रामायण ककविन । ३" १. रामकथा, पृष्ठ १२७ । २. वही पृष्ठ १२७ । ३. वही, पृ० १२८, अनु० (६) ।