रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९५ अन्य विषय का उल्लेख न होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तरकाण्ड उस समय अपना वर्तमान रूप और विस्तार नहीं प्राप्त कर पाया था। इस तर्क की पुष्टि इससे भी होती है कि बाद में वाल्मीकिरामायण के उदीच्य पाठ में एक तीसरी अनुक्रमणिका जोड़ी गयी है, जिसमें सातों काण्डों की सामग्री का ध्यान रखा जाता है।" यह कथन सर्वथा असङ्गत है। किसी भी ग्रन्थ का रचनाकाल उसकी भूमिका के रचनाकाल से भिन्न नहीं होता। अस्तु उत्तरकाण्ड का और सीतात्याग से अन्य विषयों का उल्लेख भी प्रक्षिप्त नहीं है। महाभारत, रामायण, पुराण इन सभी ग्रन्थों में प्रसक्तानुप्रसक्त वर्णन की शैली ही होती है। वेदों के मन्त्र और ब्राह्मण भी इसके अपवाद नहीं हैं। उनमें भी याग का वर्णन उसकी एक-एक विधियों की प्रशंसा में अर्थवाद के रूप में कई आख्यान उपस्थित किये जाते हैं। उदीच्य-पाठ में तीसरी अनुक्रमणिका का होना 'उत्तरकाण्ड' के क्षेपक होने में प्रमाण नहीं, किन्तु उसकी प्रामाणिकता और अप्रक्षिप्तता ही सिद्ध करता है। परम्परा प्राप्त उदीच्य-पाठ भी प्रामाणिक है। पुनः बुल्के कहते हैं, "उत्तरकाण्ड की रचना-शैली अन्य प्रामाणिक काण्डों की शैली से भिन्न है। प्रारम्भिक ३३ सर्गों में रावण तथा हनुमान् की कथाओं के बाद ही रामचरित का वर्णन आगे बढ़ा दिया गया है और तब भी असङ्गत अन्तरकथाओं के कारण कथानक में कोई प्रवाह नहीं है। (दे० नृग, निमि, ययाति, श्वेत, इन्द्र, इल आदि के वृत्तान्त)। शेष सामग्री जो आधे से भी कम है रामचरित से सम्बन्ध तो रखती है लेकिन इसमें भी एकता का अभाव खटकता है। सीता-त्याग, शत्रुघ्न-चरित, शम्बूक-वध, राम का अश्वमेध, सीता का तिरोधान आदि में कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त उत्तरकाण्ड में अवतारवाद की व्यापकता भी काण्ड को बाद की रचना सिद्ध करती है।" बुल्के के उपर्युक्त कथन में तर्कसङ्गति का अभाव है। वस्तुतः शैली-भेद भी प्रक्षिप्तता का प्रयोजक नहीं हैं। एक ही लेखक के ग्रन्थ में अथवा वक्ता के प्रवचन में भी विषय-भेद से रचना, शैली एवं भाषा में भेद हो जाना स्वाभाविक ही है। सुन्दरकाण्ड के श्लोकों की शैली भी अन्य काण्डों की शैली से भिन्न है—क्या इस आधार पर उसको भी क्षेपक कहा जा सकता है ? ऋग्वेद से यजुर्वेद की शैली भिन्न है—क्या इस आधार पर यजुर्वेद को वेद ही न माना जाय ? अतः उत्तरकाण्ड में नृग, निमि, ययाति, श्वेत, इन्द्र, इल, शत्रुघ्नचरित्र, शम्बूक-वध, अश्वमेध, सीता-त्याग सभी सम्बद्ध एवं अप्रक्षिप्त हैं। केवल असङ्गत कह देने मात्र से कोई ग्रन्थ असङ्गत नहीं हो जाता। वस्तुतः ग्रन्थ के अनुसार ही ग्रन्थ के सम्बन्ध में धारणा बनाना उचित है। पहले से ही एक धारणा बना कर उसके आधार पर ग्रन्थ का परीक्षण और विश्लेषण करना असङ्गत है। एक धारणा बनाकर ही पाश्चात्य भारतीय ग्रन्थों की आलोचना करते हैं। बुल्के साहब सङ्गति क्या है और कितने प्रकार की सङ्गति होती है, यह नहीं समझते हैं। स्मृति का विषय हो और उपेक्षा का अनर्ह हो यही सङ्गति का लक्षण है। 'स्मृतिविषयत्वे सत्युपेक्षानर्हत्वम् ।" यह सङ्गति भी ६ प्रकार की होती है— "सप्रसङ्ग उपोद्घातो हेतुताऽवसरस्तथा । निर्वाहकैक्यकार्यैक्ये षोढ़ा सङ्गतिरुच्यते ॥" प्रसङ्ग, उपोद्घात, हेतुता, अवसर, निर्वाहकैक्य और कार्यैक्य, यह छः प्रकार की सङ्गति है। जहाँ घटना का वर्णन है, वहाँ तो घटना के अनुसार वर्णन करना पड़ता है। राम का दर्शन करने अनेक ऋषिगण आये, उनसे वार्तालाप के विभिन्न प्रसङ्गों में वानरों एवं राक्षसों की चर्चा छिड़ गयी। राम प्रश्न करते हैं, ऋषिगण उत्तर देते हैं—वाल्मीकि ने उसको अक्षरशः उद्धृत कर दिया। इसमें असङ्गति की कल्पना ही असङ्गत है। ईशावास्य उप-