भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 386

अध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०९ तथा इनके साथ रास करने के लिए राम कृष्ण की भाँति उतने ही रूप धारण करते हैं। इसका विस्तार २६० श्लोकों का है।" बुल्के के अनुसार "रामकथा पर यह प्रभाव अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। फिर भी सं० १७१५ की हस्तलिपि से पता चलता है गोस्वामी तुलसीदासजी के जीवनकाल में उसका सूत्रपात अवश्य हो चुका होगा।" पर बुल्के की यह कल्पना निराधार है। यह कई बार कहा जा चुका है कि कृष्ण-लीलाओं के अनुसार भी वृन्दावन की रासलीला नित्य रासलीला का एक अंश ही है। गोलोकधाम में रासलीला नित्य प्रचलित है। वृन्दावन की रासलीला में भी मुख्य सिद्धान्त यही है कि श्रीराधा की कायव्यूहरूपा गोपाङ्गनाएँ ही नित्य रासलीला की परिकर हैं। भक्त अपने आप को भगवान् की लीलाओं का अङ्गोपाङ्ग बनाना चाहता है। वह चाहता है मैं कोटि-कोटि कानों से भगवान् का चरित्र सुनूँ, कोटि-कोटि नेत्रों से भगवान् का मङ्गलमय रूप देखूं, कोटि-कोटि हाथों से तथा कोटि-कोटि शरीरों से भगवान् की सेवा करूँ। इसी दृष्टि से सीता कोटि-कोटि देहों से भगवान् राम की लीलाओं को प्रोत्साहन देती हैं। ऐसी स्थिति में हनुमत्संहिता की कथावस्तु शुद्ध वैदिक सिद्धान्तों पर ही आधारित है। बृहत्कोसलखण्ड १९१वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "राजेन्द्रलाल मित्र के कैटलाग में उसकी एक हस्तलिपि सं० १९१४ का विवरण दिया गया है (भाग ९ पृ० ५२)। उन्होंने उसे बेतिया (चम्पारन) में देखा है। उसका विस्तार ३०७२ श्लोकों का बताया गया है। संवत् २००१ में लाहोर के श्रीरोशनलाल अग्रवाल ने हिन्दी टीकासहित इसकी १३० प्रतियाँ छपवायी थी। यह हिन्दी रसवर्धिनी टीका श्रीरामवल्लभीशरणजी महाराज की लिखी हुई है। वेदव्यासकृत बृहत्कोसलखण्ड ब्रह्मरामायण का अंश माना जाता है। इसके १५ अध्यायों का कथानक तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। १—विवाह के पूर्व राम की लीला (अ० १-५)। प्रारम्भ में यज्ञोपवीत संस्कार तथा विद्याभ्यास के पश्चात् सखा-रास का वर्णन किया गया है। राम के सखा, जिनमें रुद्र भी शामिल हैं, स्त्री का रूप धारण कर राम के साथ रास का आयोजन करते हैं (अध्याय १)। अनन्तर गोपिकाओं, देवकन्याओं और राजकन्याओं के साथ राम के रास का वर्णन किया गया है। किसी अवसर पर राम को देखकर गोपियों का मन आकर्षित हुआ और वे उनको पतिरूप में प्राप्त करने के उद्देश्य से तप तथा पार्वती की पूजा करने लगीं। पिता की आज्ञा लेकर राम शिकार करने के बहाने यमुना तट पर पहुँचते हैं। शिव की आज्ञा से निकुम्भ आँधी उत्पन्न करता है, जिसमें गोधन भाग जाता है तथा गोप उसका पीछा करते-करते चले जाते हैं। इतने में राम गोपियों के पास चले जाते हैं। उनके साथ वसन्तोत्सव मानते हैं तथा रासलीला भी करते हैं। इसमें लक्ष्मी, सरस्वती, उमा आदि मालिन का रूप धारण कर भाग लेती हैं। अन्त में गोपियों को बिदा कर राम अपने सखाओं को योगनिद्रा से जगाकर अयोध्या लौटते हैं (अध्याय २)। अगले अध्याय में दशरथ राम को दही का कर वसूल करने के लिए गोपों के यहाँ भेज देते हैं। वे राम को अपनी पुत्रियाँ समर्पित कर देते हैं। राम सबसे विवाह कर अयोध्या लौट आते हैं। अनन्तर सान्तानिक वन की लताओं से देवकन्याएँ प्रकट होकर राम के साथ विविध विलास करती हैं। अन्त में उनकी रासलीला का भी विधान होता है (अध्याय ३)। अब देवता अयोध्या पहुँचकर राम से निवेदन करते हैं कि वे उनकी कन्याओं को भी ग्रहण करें। इसके बाद दशरथ राम को शम्बरासुर का वध करने के लिए भेज देते हैं। राम उसका वैजयन्त नामक पुर घेरकर उसके पुत्र का वध करते हैं तथा शम्बरासुर द्वारा हरण की गयी राजा, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष आदि की कन्याओं को लेकर अयोध्या आते हैं। उनके साथ भी रासक्रीड़ा करते हैं (अध्याय ४,५)। २—राम और सीता का विवाह (अध्याय ६,७)। एक तपस्विनी से राम के कार्यों का वर्णन सुनकर अष्टवर्षीया सीता विरह से व्याकुल होने लगती हैं। महेश्वर जनक को स्वप्न में दिखायी पड़ते हैं और परामर्श देते