रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ रामायणमीमांसा नवम “शक्येष्वेवाभवद्यात्रा तस्य शक्तिमतः सतः। समीरणसहायोऽपि नाम्भःप्रार्थी दवानलः॥” ( रघुवं० १७।५६ ) अतिथि यद्यपि शक्तिसम्पन्न थे तथापि अपने से हीन शक्तिवाले राजाओं के ऊपर ही उन्होंने आक्रमण किया। दवाग्नि वायु की सहायता पाकर भी जलाने के लिए तृण, काष्ठादि की ही अपेक्षा रखती है, जल की नहीं । “न धर्ममर्थकामाभ्यां बबाधे न च तेन तौ। नार्थं कामेन कामं वा सोऽर्थेन सदृशस्त्रिषु ॥” ( रघुवं० १७।५७ ) अतिथि ने अर्थ और काम परायण होकर धर्म को खतरे में नहीं डाला । न तो धर्मपरायण होकर अर्थ और काम को हो सङ्कट में डाला । काम से अर्थ और अर्थ से काम को उन्होंने पीड़ित नहीं किया । वह धर्म, अर्थ और काम तीनों में समवर्ती रहे । “हीनान्यनुपकर्तॄणि प्रवृद्धानि विकुर्वते । तेन मध्यमशक्तीनि मित्राणि स्थापितान्यतः॥” ( रघुवं० १७।५८ ) क्षीणशक्ति मित्र उपकार नहीं कर सकता और बढ़ा हुआ मित्र विकृत हो सकता है, इसलिए अतिथि ने मध्यमशक्ति मित्रों की स्थापना की । “परात्मनोः परिच्छिद्य शक्त्यादीनां बलाबलम् । ययावेवमबलिष्ठश्चेत् परस्मादास्त सोऽन्यथा ॥” ( रघुवं० १७।६० ) अतिथि अपने और शत्रु के देश, काल, शक्ति और परिस्थिति का बलाबल पहले निश्चित करते थे । बलवान् होने पर आक्रमण करते थे अन्यथा सन्धि आदि की वार्ता से शत्रुओं को सान्त्वना देते हुए अपने यहाँ रहते थे । “कोशेनाश्रयणीयत्वमिति तस्यार्थसङ्ग्रहः । अम्बुगर्भो हि जीमूतश्चातकैरभिनन्द्यते ॥” ( रघुवं० १७।५९ ) खजाने से ही दुनिया में आदर होता है, इसलिए अतिथि ने खजाने का संग्रह किया, क्योंकि जलपरिपूर्ण मेघ का ही चातक अभिनन्दन करता है । “परकर्मापहः सोऽभूदुद्यतः स्वेषु कर्मसु । आवृणोदात्मनो रन्ध्रं रन्ध्रेषु प्रहरन् रिपून् ॥ ( रघुवं० १७।६१ ) अतिथि सदा शत्रुओं के कार्यों में रोड़ा अटकाता हुआ अपने कर्म में सदा उद्यत रहता रहा । शत्रुओं के रन्ध्र में प्रहार करता हुआ वह अपना रन्ध्र सदा छिपाये रहता था । “सर्पस्येव शिरोरत्नं नास्य शक्तित्रयं परः । स चकषं परस्मात्तदयस्कान्त इवायसम् ॥ ( रघुवं० १७।६३ ) सर्प के सिर के रत्न को जैसे कोई खींच नहीं सकता वैसे ही अतिथि की तीनों शक्तियों ( प्रभुशक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति ) को किसी ने नहीं खींचा, किन्तु चुम्बक जैसे लोहे को खींच लेता है वैसे ही अतिथि ने शत्रुओं की तीनों शक्तियों को खींच लिया ।