रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 380, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता ३०३ तत्त्वसंग्रहरामायणादि की प्राचीनता बुल्के के अनुसार "तत्त्वसंग्रहरामायण की रचना १७वीं शती ई० की है। इसके रचयिता रामब्रह्मानन्द हैं। इनका रामायणतत्त्वदर्पण ग्रन्थ भी है। तत्त्वसंग्रहरामायण में राम के ब्रह्मत्व पर प्रकाश डाला गया है। इसमें राम को विष्णु के अतिरिक्त शिव-ब्रह्मा-हरिहर त्रिमूर्ति परब्रह्म का भी अवतार माना गया है। तदनन्तर रामायण के गायत्रीस्वरूप का भी स्पष्टीकरण किया है। इसके पश्चात् शिव-पार्वती-संवाद के रूप में समस्त रामकथा का वर्णन हुआ है। इसमें राम की दास्यभक्ति के अतिरिक्त अद्वैतरामोपासना का भी उल्लेख है। कई तीर्थों का महत्त्व सिद्ध करने के लिए उनका सम्बन्ध राम से जोड़ा गया है जैसे वाराणसी, गया, गोदावरी, धनुष्कोटि तथा रंगनाथ। इस रचना के निम्न लिखित प्रसङ्ग धर्म-खण्ड पर आधारित हैं। सीता-स्वयंवर में शिव की उपस्थिति, कैकेयी का पश्चात्ताप, सीता-हरण, हस्तरेखा दिखाने के लिए सीता का रखवाली के लिए लक्ष्मण द्वारा खींची हुई रेखा का उल्लङ्घन कर रावण के निकट जाना, अशोकवन में रावण-सीता-संवाद के समय हनुमान्जी का प्रकट होना, रावण पर प्रहार करना तथा मृत्यु द्वारा मायासीता का रूप धारण करना। निम्नोक्त विशेषताएँ तत्त्वसंग्रहरामायण की हैं- वाल्मीकि-कथा का परिवर्तित रूप, गङ्गा-तट पर उनकी तपस्या के फलस्वरूप सीता को अपने आश्रम में शरण देने की वरप्राप्ति ( २।२२-३०;७,६ ) । सुतीक्ष्ण के आश्रम से बिदा लेते समय सीता भूमिदेवी से रत्नजटित पादुकाओं का एक जोड़ा ग्रहण करती हैं। उन्हें पहनकर राम पादपीड़ा तथा भूख-प्यास से मुक्त होते हैं। मायासीता का वृत्तान्त, जिसके अनुसार वास्तविक सीताजी रामजी के वक्षःस्थल में अव्यक्तरूप से रहती हैं। रावण और जटायु का युद्ध। राम का सुग्रीव को अपना शिवरूप दिखाना। हनुमान् की जन्म-कथा, जिसके अनुसार पार्वती उनकी माता मानी जाती हैं ( ४।१३ ) । सीता द्वारा शतानन रावण का वध ( ७।१-२ ) । जनक के पूर्वजन्म की कथा। उक्त दोनों रामायण पुराणों, रामायणों तथा परम्पराप्राप्त कथाओं पर निर्भर हैं।" राम का परब्रह्म होना तो उपनिषदों एवं वाल्मीकि- रामायण, अध्यात्मरामायण आदि पर ही निर्भर है। राम की शिवरूपता भी उपनिषदों पर निर्भर है। ईश्वर होने से त्रिमूर्तिरूपता राम की सुतरां सिद्ध हो जाती है। राम की अद्वैतोपासना भी उपनिषदों में वर्णित है। लक्ष्मण की रेखा की कथा अति प्राचीन परम्पराप्राप्त है। भिक्षा देने के प्रसङ्ग से भी सीता का रेखा से बाहर जाने की कथा प्रसिद्ध है। अवश्य ही सीता को अपने आश्रम में शरण देने की वरप्राप्ति की बात महत्त्वपूर्ण है और वह बिना तपस्या के संभव नहीं थी। किसी कल्प में अशोकवनिका में हनुमान् का प्रकट होकर रावण पर प्रहार करना संभव है। जो वस्तु वेद, रामायण, पुराण, भारत आदि से विरुद्ध न हो और परम्परा से श्रुत हो वही वैदिक सनातनधर्म में प्रमाणरूप से ग्राह्य होती है। इसी लिए प्रत्यक्ष श्रुति में इसका संकेत किया है- इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे। ( ईशा० उ० १० ) इसी कोटि में भूमिदेवी से रत्नजटित पादकाओं की प्राप्ति भी आ सकती है। राम तथा सीता का अभेद और राम में सीता का निवास आदि परम्पराप्राप्त है। अतएव तुलसी के रामचरितमानस में भी उसका संकलन किया गया है- तुम पावक मँह करहु निवासा। जब लगि करहु निशाचर नासा ॥ ( रा० मा० ३।२३।२ ) हनुमान् का पार्वती-पुत्र होना तथा शङ्कर का पुत्र होना भी प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध हनुमान् चालीसा में- "शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महाजगवन्दन ॥" कहा गया है। शतानन रावण के वध का भी अद्भुतरामायण आदि में सङ्केत है।