भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

अध्याय रघुवंश के अनुसार रघुवंशियों की नीतिमत्ता ३०१ अश्वमेधयज्ञ करने के लिए अतिथि राजा ने विजय की कामना से शत्रुओं के साथ छलछद्मप्रधान कर्म किया तथापि छल-छद्म धर्मयुक्त ही रहा। "अनित्याः शत्रवो बाह्या विप्रकृष्टाश्च ते यतः। अतः सोऽभ्यन्तरान्नित्यान् षट् पूर्वमजयद्रिपून् ॥” ( रघुवं० १७।४५ ) बाहर के शत्रु कार्यवशात् कभी शत्रु बन सकते हैं और कभी मित्र भी बन सकते हैं, अतः वे अनित्य शत्रु हैं तथा वे दूर भी रहते हैं, इसलिए अतिथि राजा ने अपने हृदय में रहनेवाले काम, क्रोध आदि छः शत्रुओं के ऊपर पहले विजय प्राप्त की । “कातर्यं केवला नीतिः शौर्यं श्वापदचेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेताभ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ॥” (रघुवं० १७।४७ ) पराक्रमरहित केवल नीति कायरता है और नीतिरहित केवल पराक्रम हिंसकपना है, अतः अतिथि ने नीति और पराक्रम दोनों का सम्बन्ध करके सफलता प्राप्त करने का निश्चय किया । “न तस्य मण्डले राज्ञो न्यस्तप्रणिधिदीधितेः । अदृष्टमभवत्किञ्चिद् व्यभ्रस्येव विवस्वतः ॥” ( रघुवं० १७।४८ ) गुप्तचरों का जाल बिछाने के कारण उस राजा अतिथि को अपने राज्य में कुछ भी वैसे ही अज्ञात नहीं था जैसे मेघरहित सूर्य को कुछ भी अज्ञात नहीं रहता । "परेषु स्वेषु च क्षिप्तैरविज्ञातपरस्परैः । सोऽपसर्पैर्जजागार यथाकालं स्वपन्नपि ॥” ( रघुवं० १७।५१ ) राजा अतिथि समयानुसार सोते हुए भी परस्पर अविज्ञात गुप्तचरों को शत्रु-देश में और अपने अधिकारियों में नियुक्त कर उनके द्वारा सब कुछ जानते रहते थे । “दुर्गाणि दुर्ग्रहाण्यासंस्तस्य रोद्धुरपि द्विषाम् । नहि सिंहो गजास्कन्धी भयाद् गिरिगुहाशयः ॥” ( रघुवं० १७।५२ ) राजा अतिथि स्वयं ही दूसरे (शत्रु) लोगों के किलों का अवरोधक था; अतिथि के किले का दूसरे अवरोध नहीं कर सकते थे । ऐसा कहना ठीक न होगा कि ऐसी स्थिति में उसे किले की क्या आवश्यकता थी ? कारण स्वभाव से ही राजा के लिए किला अपेक्षित होता है ! हाथियों के झुण्डपर आक्रमण करनेवाला सिंह भय से गिरिगुहा में नहीं सोता, किन्तु स्वभाव से ही सोता है । “भव्यमुख्याः समारम्भाः प्रत्यवेक्ष्या निरत्ययाः । गर्भशालिसधर्माणस्तस्य गूढं विपेषिरे ॥” (रघुवं० १७।५३) राजा अतिथि के कार्य कल्याणप्रधान होते थे और वे आरम्भ करने के पहले उनपर भली भाँति विचार भी कर लेते थे, इसलिए उनमें किसी प्रकार की बाधा उपस्थित नहीं होती थी । जैसे धान के दाने भीतर ही भीतर परिपाक (फल) को प्राप्त होते हैं वैसे ही उनके काम भी गुप्तरूप से आरम्भ होकर पूर्ण हो जाते थे । “अपथेन प्रवृवृते न जातुपचितोऽपि सः । वृद्धो नदीमुखेनेव प्रस्थानं लवणाम्भसः ॥” ( रघुवं० १७।५४) अतिथि समृद्ध होने पर भी अपथ से नहीं चले अर्थात् मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं किया । ज्वार आने पर समुद्र नदी-प्रवेश के मार्ग से ही बढ़ता है, दूसरे मार्ग से नहीं ।