भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 361

तस्माद्भूतं भविष्यच्च वर्तमानमपि द्विजाः। वदन्ति सूक्ष्मं शास्त्राणि तेषु शङ्कां न कारयेत् ॥ (का० के० मा० १५।९-१०) काशीकेदारमाहात्म्य में कहा गया है कि वेद, आगम, पुराण, इतिहास आदि सभी युगों के अनुसार अनादि हैं, भगवान् के श्वासस्वरूप हैं। कभी वे मलिन कभी विशद होते हैं और वे भगवान् की प्रपञ्च-लीला का वर्णन करते हैं। उनमें भूत, भविष्य तथा वर्तमान का वर्णन होता है, अतः उनमें शङ्का नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार अन्य पुराणों और उपपुराणों में भी पुराणों तथा उपपुराणों के नाम एवं उनकी श्लोकसंख्या तथा कहीं कहीं अनुक्रमणिका भी निर्दिष्ट है। इससे पुराणों का प्रामाण्य सिद्ध होता है। यदि कोई पुराण किसी आधुनिक वञ्चक द्वारा रचित होता तो अन्य पुराणों में उसका उल्लेख कैसे होता ? सभी को वञ्चक कहना तो किसी वञ्चक के लिए ही सम्भव है। प्रमाणरूप से आदृत इन अनेक ग्रन्थों में विभक्त अष्टलक्षाधिक श्लोकों का निर्माण करनेवाले लोग निर्माता के रूप में नाम न देते यह सर्वथा असम्भव ही है। अतः पाश्चात्यों तथा उनके अनुयायी भारतीयों की पुराणसम्बन्धी कालकल्पना सर्वथा अप्रामाणिक ही है। योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण को बुल्के १७४ वें अनुच्छेद में साम्प्रदायिक रामायण कहते हैं। इनका भी रचनाकाल एम्. विंटरनित्स तथा एस. एन्. दास गुप्ता ८वीं शती मानते हैं। डाक्टर वी. राघवन् ११वीं शती इनका रचनाकाल मानते हैं। यह कम से कम योगवासिष्ठ के तो सर्वथा विरुद्ध ही हैं। जिस ग्रन्थ के काल का विचार किया जाय यदि उसके कथन की उपेक्षा कर मनमाने ढङ्ग से काल का निर्णय किया जाने लगे तो किसी भी ग्रन्थ का मनमाना काल निर्धारित किया जा सकता है। योगवासिष्ठ के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ही उक्त ग्रन्थ के रचयिता हैं। ऐसी स्थिति में जो काल उन महर्षि का है वही योगवासिष्ठ का भी काल है। विंटरनित्स के अनुसार योगवासिष्ठ शङ्कराचार्य के अनुयायियों की कृति है। भीखनलाल आत्रेय के अनुसार ७वीं से ८वीं शती में उसकी उत्पत्ति हुई है। भर्तृहरि के वाक्यपदीय के एवं योगवासिष्ठ के कुछ श्लोक परस्पर मिलते जुलते हैं। भर्तृहरि का काल ७वीं शती माना जाता है। इस दृष्टि से भी कम से कम ई० सन् ६०० योगवासिष्ठ का रचनाकाल है। परन्तु यह सब वस्तुतः पाश्चात्य प्रभाव हैं। पाश्चात्य लोग संसार भर के सभी ग्रन्थों को हजार पन्द्रह सौ वर्ष के भीतर लाने का प्रयास करते हैं। योगवासिष्ठ के टीकाकार आनन्दबोधेन्द्रसरस्वती तथा अन्वयारण्य आत्मसुख, गङ्गाधरेन्द्र सरस्वती आदि भी १६वीं शती के आसपास के हैं। मुकुन्द्यति के शिष्य रामवनस्वामी की व्याख्या योगवासिष्ठ पर है, वे १४वीं शती से पहले के हैं। उनकी रामार्चनचन्द्रिका का उल्लेख निर्णयसिन्धु आदि निबन्धग्रन्थों में किया गया है। मधुसूदनसरस्वती १६वीं शती के आचार्य हैं। उनके सिद्धान्तबिन्दु तथा संक्षेपशारीरकव्याख्या में तथा गीताव्याख्या में योगवासिष्ठ के श्लोकों का उद्धरण है। गीता के ६-३२ तथा ३६वें श्लोकों की व्याख्या में योगवा- सिष्ठ के बहुत श्लोकों का उल्लेख हुआ है। 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' की टीका में “वासिष्ठविष्णुपुराणादिषु रुसिष्ठ- पराशरादिभिर्बहुधा गीतम् ।” श्रीधरस्वामो ने गीता की सुबोधिनी टीका में योगवासिष्ठ के श्लोकों का उद्धरण किया है। काश्मीरी विद्वान् गौड़ अभिनन्दी ने, जो ९वीं शती के थे, योगवासिष्ठसार नाम का ग्रन्थ लिखा है। आद्य श्रीशङ्कराचार्य ने श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्य में लिखा है— “तथा च—वासिष्ठयोगशास्त्रे प्रश्नपूर्वकं दर्शितम् । तथात्मा निर्गुणः शुद्धः सदानन्दोऽजरोऽमरः ॥” इत्यादि चार श्लोक उन्होंने उद्धृत किये हैं। सनत्सुजातीयभाष्य में भी १।१५ से आद्यशङ्कराचार्य कहते हैं—“तथा चाह भगवान् वसिष्ठः—