भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय अवतार-सामग्री २८५ चतुर्वेदोऽपि यो विप्रः सूक्ष्मं ब्रह्म न विन्दति । वेदभारभराक्रान्तः स वै ब्राह्मणगर्दभः ॥” ३१ वें श्लोक में “तथा चाह भगवान् वासिष्ठः— यन्न सन्तं न चासन्तम् ॥” श्वेताश्वतर उपनिषद् शङ्कराचार्य का प्रधान ग्रन्थ है। शङ्करदिग्विजय में माधवाचार्य ने कहा है— “सन्तत्सुजातीयमसत्सु दूरं ततो नृसिंहस्य च तापनीयम् ॥” विवेकचूडामणि, लघुवाक्यादि में भी योगवासिष्ठ के भाव हैं । भारतीय परम्परा के अनुसार आद्यशङ्करा- चार्य का काल विक्रम से कई शती पूर्व है । फिर योगवासिष्ठ उनसे भी पहले का है ही । इसके अनुसार वसिष्ठ रामचन्द्र को मोक्षप्राप्ति पर विस्तृत उपदेश करते हैं । इस संवाद को वाल्मीकि अरिष्टनेमि को सुनाते हैं । अगस्त्य ने उसी का उपदेश सुतीक्ष्ण के लिए दिया है । योगवासिष्ठ में भी राम विष्णु के अवतार बताये गये हैं । वस्तुतः रामायण में वेद के पूर्वकाण्ड का ही उपबृंहण हं । वेद के उत्तरकाण्ड वेदशीर्ष वेदान्त का उपबृंहण योगवासिष्ठ या महारामायण में किया गया है। मर्यादापुरुषोत्तम राम ने जैसे वेद के पूर्वकाण्ड का स्वयं आचरण कर आदर्श उपस्थित करके लोकशिक्षा दी उसी तरह तीर्थयात्रा, परमवैराग्य एवं उत्तम मुमुक्षा से युक्त होकर उत्तम जिज्ञासु हो गुरुपसदनपूर्वक वेदान्तों के श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा तत्त्वसाक्षात्कार के सम्पादन का भी आदर्श उपस्थित कर लोकशिक्षा दी थी । इसी प्रकार अध्यात्मरामायण को भी साम्प्रदायिक एवं आधुनिक कहना वास्तविकता का अपलाप है, यह पीछे कहा जा चुका है। अध्यात्मरामायण और श्रीमद्भागवत ये दोनों ग्रन्थ रामचरितमानस के प्रमुख आधार हैं। अध्यात्मरामायण में राम को परब्रह्म, सीता को लक्ष्मी तथा लक्ष्मण को शेष कहा गया है। उसमें राम को विष्णु का अवतार भागवत का अनुकरण कर नहीं कहा गया है, किन्तु जन्म-समय में राम ने कौशल्या को विष्णुरूप में जो दर्शन दिया था उस वस्तुस्थिति के अनुसार ही कहा गया है। अहिल्योद्धार के अनन्तर केवट का वृत्तान्त दिया गया है। यौवराज्य अभिषेक के पूर्व राम-नारद-संवाद तथा मन्थरा में सरस्वती का प्रवेश बताया गया है। रामनाम- महिमा के वर्णन प्रसङ्ग में वाल्मीकि की आत्मकथा, मायामयी सीता के हरण का वृत्तान्त, लक्ष्मण का द्वादशवर्ष तक उपवास, सेतुबन्ध रामेश्वर की स्थापना, कालनेमि का वृत्तान्त, रावण का शुक्र के परामर्श से यज्ञानुष्ठान करना और अङ्गद के द्वारा उसका भङ्ग किया जाना, रावण की नाभि में अमृत का होना, भगवत्पदप्राप्ति के उद्देश्य से रावण के द्वारा सीताहरण आदि इसकी विशेष कथाएँ हैं। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण में राम के माधुर्यप्रधान स्वरूप का वर्णन है। अध्यात्मरामायण में ऐश्वर्यप्रधान स्वरूप का वर्णन है। भक्ति-सिद्धान्त में माधुर्य- प्रधान रूप का बड़ा महत्त्व है। उसमें लौकिक रूप का ही अधिकांश प्राकट्य होता है। रागानुगा स्वारसिकी प्रीति होती है । ऐश्वर्यप्रधान रूप में वह भक्ति नहीं हो पाती । एक माता अपने बालक में स्वाभाविक जितना स्नेह या प्यार कर सकती है उतना ईश्वर में नहीं कर सकती है, क्योंकि ऐश्वर्य में भय, संकोच आदि के कारण उद्दाम ममता और स्नेह नहीं बन पाता । यदि यशोदा कृष्ण को ब्रह्म या परमेश्वर समझती तो मृत्तिका-भक्षण के प्रसङ्ग से कृष्ण को उलूखल में बाँधने की हिम्मत कदापि नहीं कर सकती । इसी लिए मृद्भक्षण के प्रसङ्ग में मैंने मिट्टी नहीं खायी । ग्वालबाल सब मिथ्या बोलते हैं। तुझे विश्वास नहीं है तो मेरा मुंह देख ले, कृष्ण के यह कहने पर जब यशोदा ने मुख खोलने को कहा, तब श्रीकृष्ण ने माँ के भय से मुँह खोल दिया । उसके भीतर सूर्य, चन्द्र, भूधर, सागर आदि सारे विश्व को देखकर उसने निश्चय कर लिया कि यह तो साक्षात् परब्रह्म है। यह मेरा पुत्र है, मैं माँ हूँ यह कल्पना मोहमूलक है। भगवान् ने फिर से अपनी मोहनी वैष्णवी माया फैलाकर माता यशोदा के ज्ञान को आवृत कर दिया,