भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 363

२८६ रामायणमीमांसा अष्टम क्योंकि ऐश्वर्यप्रधान स्वरूप में तादृक् स्नेहसम्बन्ध नहीं बन सकता था । अतः वाल्मीकिरामायण में लौकिक स्वरूप का आधिक्येन वर्णन है, ऐश्वर्य का अल्प वर्णन है । किन्तु अध्यात्मरामायण में ऐश्वर्यप्रधान मार्गीय भक्ति का ही वर्णन है । माधुर्य में ही ऐश्वर्य के वर्णन के बिना कोई लौकिकता का भान होने से प्राकृत साधारणता आ सकती है । अतः वाल्मीकिरामायण में भी तत्र-तत्र स्थलों में ईश्वरता का वर्णन है । सनातन सिद्धान्त के अनुसार गुणोपसंहार- न्याय से साङ्गोपाङ्ग रामचरित जानने के लिए सभी रामायणों, महाभारत, पुराणों, उपनिषदों संहिताओं तथा आगमों का समन्वय ही मान्य है । अद्भुतरामायण के सम्बन्ध में अनु० १७६ में बुल्के का कहना है कि “ऐसा प्रतीत होता है कि अद्भुत- रामायण या अद्भुतोत्तरकाण्ड की रचना अध्यात्मरामायण के कुछ काल बाद हुई ।” इस तरह उनकी दृष्टि में वह अत्यन्त अर्वाचीन है, परन्तु यह ठीक नहीं है । उलटे यही कहा जा सकता है कि अद्भुतरामायण में अध्यात्मरामायण के अंशों का उल्लेख होने से शिवपार्वतीसंवादरूप अध्यात्मरामायण अति प्राचीन है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण के ही दोनों अंश हैं। अन्यथा ऋषिव्यतिरिक्त कोई लेखक वाल्मीकि और भरद्वाज के संवाद को कैसे जान सकता है ? सर्ग १ में नारद एवं पर्वत के द्वारा विष्णु को दिये जानेवाले शाप के कारण रामरूप में विष्णु के अवतार का ज्ञान भी अर्वाचीन समाधिशून्य को कैसे हो सकता था । अम्बरीष की पुत्री श्रीमती का शापवशात् जानकी बनकर रावण द्वारा अपहृत होना (सर्ग २-४), नारद के शाप से लक्ष्मी का सीतारूप में मन्दोदरी की पुत्री बनना आदि सबको काल्पनिक एवं मिथ्या ही मानना पड़ेगा क्या ? किन्तु कोई भी भारतीय सभ्य विद्वान् निराधार निरर्थक मिथ्या प्रलाप करना उचित नहीं समझता; अतः अद्भुतरामायण भी महर्षि वाल्मीकि के आर्षविज्ञान के आधार पर ही निर्मित है । सहस्रमुख रावण का वध (सर्ग १७-२७) देवीमाहात्म्य का अनुकरण नहीं है, किन्तु घटनामूलक है। सत्य घटना में तो उक्त रामायण ही प्रमाण है । परन्तु उक्त घटना के अभाव में बुल्के के पास कुछ भी प्रमाण नहीं है। क्योंकि अतीत विषय में प्रत्यक्ष प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं होती । अतीत से सम्बन्धित कोई लिङ्ग गृहीत नहीं है, अतः अनुमान की प्रवृत्ति भी नहीं हो सकती । १७७वें अनु० में आनन्दरामायण के सम्बन्ध में भी बुल्के का यह कहना कि इसकी रचना १५वीं शती ई० की है, सङ्गत नहीं है। आनन्दरामायण के विषय वाल्मीकिरामायण से कुछ भिन्न हों यह उसकी मौलिकता का ही साधक है । दशरथ और कौशल्या का विवाह तथा रावण द्वारा कौशल्या का हरण, देवदानव-युद्ध में कैकेयी की वरप्राप्ति, श्रवणकुमार का वध, दशरथयज्ञ तथा कैकेयी के पायस का काक द्वारा अपहरण और उसका अञ्जनी के पर्वत पर फेंका जाना ( सर्ग १ ) । आनन्दरामायण की विशिष्ट कथाएँ—बाललीला वर्णन ( सर्ग २ ), अहिल्योद्धार तथा तदनन्तर नाविकवृत्तान्त ( सर्ग ३।२४-२८ ) ये दोनों वृत्तान्त अध्यात्मरामायण के तुल्य हों यह ठीक है, परन्तु ये उसी के अंश के उद्धरण हैं, यह नहीं कहा जा सकता है। सीतास्वयंवर में रावण की उपस्थिति ( सर्ग ३ ), अग्निजा सीता की जन्मकथा ( ३।१८८ आदि ), वृन्दा का शाप, कलहा और धर्मदत्त का कैकेयी तथा दशरथ के रूप में जन्म लेना ( सर्ग ४ ), सीताहरण के बाद सीता का रूप धारण कर उमा का रामपरीक्षा करना ( सर्ग ७ ), रावण का शिव से आत्मलिङ्ग तथा पार्वती को प्राप्त करने तथा दोनों को खो बैठने की कथा ( सर्ग ९ ), मैरावण का राम और लक्ष्मण को पाताल ले जाना, हनुमान् द्वारा राम और लक्ष्मण को वापस लाना ( सर्ग ११ ), सुलोचना की कथा ( सर्ग १।१२०५ आदि ) एवं आत्ममुक्ति के उद्देश्य से रावण द्वारा सीताहरण करने का उल्लेख ( सर्ग १३। ११९ आदि ) । यात्राकाण्ड में वाल्मीकिरामायण की उत्पत्ति ( सर्ग १।२-१२ ) तथा वाल्मीकि द्वारा शतकोटि- प्रविस्तर रामायण की रचना का उल्लेख ( सर्ग १, २) । इसके बाद चारों दिशाओं में राम की तीर्थयात्रा का वर्णन मिलता है । पूर्वोक्त सभी विषय रामचरित्र के ही अनिवार्य अङ्ग हैं। यागकाण्ड में राम के अश्वमेध का वर्णन है । विलासकाण्ड में शङ्करकृत रघुवीर-स्तव ( सर्ग १ ), सीता का नख-शिखवर्णन, सीतालङ्कार, जलक्रीड़ा तथा सीता-