भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय अवतार-सामग्री २७७ (अध्याय ५७) में सागर को पार करने के लिए राम द्वारा सहायता के लिए शिव की प्रार्थना की गयी है। शिवपुराणोक्त रामसम्बन्धी आख्यान भी राम के परमेश्वरत्व और मर्यादापुरुषोत्तमत्व का ही पोषक है। १६८ अनु० में बुल्के कहते हैं, "श्रीमद्देवीभागवतपुराण के नवरात्रमाहात्म्य में वर्णित रामकथा के अनुसार राम ने शूर्पणखा को विरूप किया। शेष कथा रामायणीय कथा से मिलती जुलती है। इसमें सीताहरण के बाद नारद के उपदेश से राम रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए नवरात्रोपवास करते हैं। इसके अन्त में सिंहासनारूढा देवी भगवती राम को दर्शन देकर रावण पर विजय का आश्वासन देती हैं। अनन्तर राम विजया-पूजा कर वानरसेना के साथ समुद्र की ओर प्रस्थान करते हैं (देवीभा० ३।२८-३०)। नवें स्कन्ध में वेदवती-वृत्तान्त तथा छायासीता की कथा भी मिलती है।" बुल्के इन प्रामाणिक आदरणीय सभी धर्मग्रन्थों को अपनी कल्पना के आधार पर मिथ्या सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। पर सभी प्रामाणिक ऋषि एवं उनके ग्रन्थ एक स्वर से राम को ब्रह्म और मर्यादापुरुषोत्तम ही प्रमाणित करते हैं। गुणोपसंहारन्याय से वाल्मीकिरामायण या अन्य ग्रन्थों में अनुक्त होने पर प्रामाणिक ग्रन्थों की कथाओं को मिलाकर ही रामकथा की पूर्णता का निर्णय किया जाता है। इस तरह मर्यादापुरुषोत्तम राम के द्वारा शिवपूजा और देवीपूजा, सूर्यपूजा आदि सभी सम्भव हैं, क्योंकि अपने आचरण से मनुष्यों को धर्म, कर्म, व्यवहार आदि की शिक्षा देना ही राम के अवतार का मुख्य उद्देश्य है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम् ।” (भा० पु० ५।१९।५ ) १६९ अनु० में बुल्के कहते हैं, "हाजरा के अनुसार महाभागवतपुराण गुजराती प्रिंटिंग प्रेस बम्बई सन् १९१३ के संस्करण का निर्माण ११वीं शती ई० के लगभग पूर्व बङ्गाल में अथवा कामरूप में हुआ था। इसमें एक रामोपाख्यान मिलता है, जिसकी कथावस्तु रामायण से बहुत भिन्न है। इसके अनुसार देवता रावण का वध करने के लिए विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना करते हैं। विष्णु उनसे कहते हैं जब तक देवी लङ्का में निवास करती हैं, मैं रावण को पराजित नहीं कर सकता। अनन्तर सब मिलकर कैलाश पर्वत पर देवी के पास जाते हैं। देवी सीताहरण के कारण लङ्का छोड़ देने की प्रतिज्ञा करती हैं तथा शिव हनुमान् का रूप धारण कर राम की सहायता करने का वचन देते हैं। अन्त में राम देवी से अमोघ अस्त्र ग्रहण कर रावण को मारने में समर्थ होते हैं (अ० ४७, ६६)। ब्रह्मा भी राम की विजय के लिए देवी की मृण्मयी मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करते हैं। इस वृत्तान्त में सीता मन्दोदरी के गर्भ से उत्पन्न मानी गयी हैं (अ० ४२।६४)। इस पुराण में अन्यत्र माया सीता का हरण तथा नारदशाप दोनों का उल्लेख है (अध्याय ११।१०७-११२) ।” हाजरा महाभागवतपुराण की कथावस्तु वर्णन के आधार पर ही ११वीं शती का अनुमान करते हैं। उनके पास और कोई ठोस प्रमाण नहीं है। यह भी देवीभागवत का ही परिवर्तित रूप है। लोकोत्तर माहात्म्य तो प्रसिद्ध ही है। देवी की कृपा से राम रावण को मारने में समर्थ हैं, यह उनके मर्यादापुरुषोत्तम रूप के अनुरूप ही है। राम की ब्रह्मरूपता इस पुराण से भी सिद्ध ही है। १७० वें अनु० में बुल्के के अनुसार "बृहद्धर्मपुराण १३वीं शती ई० के महाभागवतपुराण की कथा से बहुत भिन्न नहीं है। उसमें सीताहरण का वृत्तान्त नृसिंहपुराण की कथा से मिलता-जुलता है। तथा हनुमान् विडालका का रूप धारण कर लङ्का में प्रवेश करते हैं (दे० पूर्वखण्ड अ० १८-२२)। रामकथा के वर्णन के बाद रामायणोत्पत्ति का वृत्तान्त दिया गया है, जिसमें श्लोकोत्पत्ति आदि के बाद रामायण के उत्कर्ष-वर्णन के प्रसङ्ग में रामायण के महाभारत तथा पुराणों का बीज होने का उल्लेख है (पू० ख० अध्याय २५-३०) ।" यह भी १३ वीं शती की रचना है। यह कल्पना पूर्ववत् निराधार ही है। आर्ष सभी पुराण ऋषिकाल के ही हैं। रामायण आदिकाव्य है। अन्य