भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 355

महाभारत, पुराण आदि का वही बीज है, यह सिद्धान्त ठीक ही है। भारतीय अन्य साहित्यों से भी यही सिद्ध है। कालिदास, हर्षवर्धन आदि भी यही मानते हैं। बौद्ध अश्वघोष भी वाल्मीकि की कृति को अपूर्व मानते हैं। १७१ वें अनु० में सौरपुराण का रचना-काल सन् ९५०-१०५० ई० बताया गया है। प्रायः काल-निर्णय सबका अशुद्ध है। इसमें सूर्य-वंश वर्णन के प्रसङ्ग से जो रामकथा है उसमें राम को महादेवपरायण कहा गया है। शङ्कर के प्रसादस्वरूप राम अपने पद को प्राप्त करते हैं। जनक ने गौरी को सन्तुष्ट करके सीता को प्राप्त किया था (अध्याय ३०)। सौरपुराण भी सनातनधर्ममान्य उपपुराण है। इसका वृत्त-वर्णन भी युक्त ही है। १७२ वें अनु० में कालिकापुराण को भी ११ वीं शती का कहा गया है; जो सर्वथा अशुद्ध है। इसमें ब्रह्मा द्वारा राम की विजय के लिए दुर्गा की पूजा का उल्लेख (अध्याय ६२।२०-३८) एवं ३८ वें अध्याय में जनक के हल जोतते समय सीता को तथा अन्य पुत्रों को प्राप्त करने की कथा वर्णित है। इनकी कथाओं से भी रामायण की कथा का समर्थन होता है। १७३ अनु० में बुल्के कहते हैं दो अर्वाचीन पुराणों में रामकथा की सामग्री मिलती है। वस्तुतः बुल्के की दृष्टि में सभी पुराण अर्वाचीन ही हैं। वैदिक सनातनसिद्धान्तनिष्ठों के अनुसार तथावर्णित सभी ग्रन्थों की दृष्टि से बुल्के और उनके मान्य हाजरा का मत सर्वथा अमान्य है। हाँ, आदिपुराण में वसुदेव-विवाह से यमलार्जुन कथातक कृष्ण-चरित वर्णित है। नन्ददृष्ट स्वप्न वर्णन नामक १६वें अध्याय में संक्षिप्त रामकथा के अतिरिक्त इसका भी उल्लेख है कि नन्द ने पूर्वजन्म में भक्तिपूर्वक भगवान् से प्रार्थना की थी जिसके फलस्वरूप रामावतार में तथा कृष्णावतार में उनको भगवान् के पिता होने का वरदान प्राप्त हुआ था। आदिपुराण का रामचरित वाल्मीकिरामायण के अनुसार है। यहाँ कनकमुग को देखकर राम स्वयं कहते हैं कि अवश्य ही कोई मायावी राक्षस है। वस्तुतः अन्य पुराणों की भाँति यह भी रामायणीय रामकथा का पोषक है। कल्किपुराण की संक्षिप्त रामकथा (अंश ३।६।२६-५८) की यह विशेषता है कि इसमें राम-सीता के पूर्वानुराग की झलक मिलती है तथा सीता ने अशोकवन में रुक्मिणीव्रत किया था जिसके फलस्वरूप वह राम से पुनः मिल सकीं (३।१७।४०)। बुल्के को इसमें आश्चर्य प्रतीत हो सकता है। परन्तु पुराणों के सिद्धान्तानुसार कृष्ण तथा राम का बराबर विभिन्न कल्पों में अवतार होता रहता है। तदनुसार इस वाराह कल्प के पहले सारस्वत कल्प में भी कृष्ण का अवतार हुआ था, अतः २४वें त्रेता में रामायण के राम की सीता रुक्मिणी-व्रत करे तो इसमें विरोध की कोई बात नहीं है। कल्किपुराण को भी अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह भी आर्ष है। पुराणों के लक्षण तथा उनके नाम और संख्या तथा उनकी श्लोक-संख्या भी पुराणों में मिलती है। पुराणों में ही उपपुराण तथा औपपुराणों का भी वर्णन है। उससे उनका भी आर्षत्व और प्रमाणत्व सिद्ध होता है। अतः उनके अनुसार हाजरा या अन्य विद्वानों की तत्सम्बन्धी काल-कल्पना सर्वथा अप्रमाण ही है। जैसा कि कूर्मपुराण में कहा गया है— सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ ब्राह्मं पुराणं प्रथमं पाद्मं वैष्णवमेव च। शैवं भागवतं चैव भविष्यं नारदीयकम् ॥ मार्कण्डेयमथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च। लैङ्गं तथा च वाराहं स्कान्दं वामनमेव च ॥