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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 353

२७६ रामायणमीमांसा अष्टम गये हैं। अहल्या अपने पति के शाप से पाषाणभूता कही गयी है। सीता के स्वयंवर के बाद अन्य क्षत्रिय राजाओं का राम पर आक्रमण करने का वर्णन है। सीताहरण का ऐसा रूप प्रस्तुत किया गया है जिसमें रावण सीता का स्पर्श नहीं करता। रावण-वध के पश्चात् राम के यज्ञों तथा स्वर्गारोहण का वर्णन है। इसमें सीता-त्याग का वृत्तान्त नहीं है।" काल-निर्णय यहाँ भी अशुद्ध ही है। गो० तुलसीदास ने भी स्वयंवर के बाद दुर्वृत्त राजाओं के राम पर आक्रमण के इरादे का वर्णन किया है, परन्तु परशुराम के आ जाने से वे ठण्डे पड़ गये थे । वह्निपुराण १६६ वें अनु० में बुल्के के अनुसार "इसकी सन् १६४६ ई० की एक हस्तलिपि लन्दन में सुरक्षित है। उसमें एक अत्यन्त विस्तृत रामकथा है, जिसमें बालकाण्ड से युद्धकाण्ड तक समस्त रामायण की कथा का वर्णन है । आरम्भ में उसमें रामावतार तथा सीता हरण का कारण भृगुशाप बताया गया है। रावण ओर कुम्भकर्ण को जन्मकथा, मधु और कैटभ एवं हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का उल्लेख है। हनुमान् का मूषिका के रूप में लङ्काप्रवेश कहा गया है।" लन्दन की हस्तलिपि का इतना ही अर्थ है कि वह १६वीं शती से पहले का है। परन्तु उसका निर्माणकाल वही है यह उससे सिद्ध नहीं हो सकता है । १६७वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "शैवपुराण तथा स्कन्दपुराण को छोड़कर उपर्युक्त पुराणों और उपपुराणों की रामकथाओं में साम्प्रदायिकता का प्रभाव कम पड़ा है। अन्य शैव और शाक्त उपपुराणों में साम्प्रदायिकता की गहरी छाप है। उनमें राम शिव अथवा देवी के भक्त रूप में दिखाये गये हैं।" यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि राम परब्रह्म होते हुए भी मर्त्यशिक्षण की दृष्टि से मर्यादापुरुषोत्तम हैं। अतः जैसे वर्णाश्रमी शिव एवं भगवती के भक्त होते हैं वैसे ही राम भी शिव, देवी आदि देवताओं के भक्त थे। इसमें साम्प्रदायिकता की कोई बात नहीं है। वाल्मीकिरामायण से भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि राम के पिता दशरथ तथा राम और उनके सभी पूर्वज वैदिक थे। मर्यादाओं तथा यज्ञ, याग आदि के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा थी। अनादि अविच्छिन्न ज्ञान, भक्ति तथा कर्म की परम्परा ही सम्प्रदाय है। साम्प्रदायिक होने के कारण ही "तुल्यं साम्प्रदायिकम्" (जै० सू० १।२।८) में भी मन्त्र के तुल्य ही ब्राह्मणभाग को वेद कहा गया है। अतः वैदिक भी साम्प्रदायिक ही होते हैं। परन्तु आजकल तो दुर्भाग्यवश फिरकापरस्ती अर्थ में सम्प्रदायशब्द का प्रयोग होने लगा है। बुल्के शिवपुराण को १४वीं शती का मानते हैं। इस सबका आधार डा० हाजरा का निर्णय ही है जो कथमपि प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता है। शिवपुराण की शतरुद्रसंहिता के सृष्टिखण्ड में नारदमोह की कथा तृतीय और चतुर्थ अध्यायों में है। सतीखण्ड में सती द्वारा राम की परीक्षा वर्णित है। राम सती से कहते हैं कि शङ्कर की आज्ञा से मैंने अवतार लिया है (अध्याय २४-२६)। युद्धखण्ड में वृन्दा का शाप (अध्याय २३) तथा शतरुद्रसंहिता (अध्याय २०) में शिवजी के वीर्य से हनुमान् का जन्म वर्णित है। आधुनिक विवेचकों द्वारा इस संहिता का रचना-काल १४वीं शती माना जाता है। इसका भी कोई आधार नहीं है। तुलसीदासजी ने इसी के आधार पर नारदमोह, सतीमोह आदि का वर्णन किया है। वे इन पुराणों को परम प्रमाण मानते थे। उमासंहिता (अध्याय ३) में राम द्वारा शिवपूजा तथा वरप्राप्ति का वर्णन है। गणपति कृष्णजी प्रेस के शिवपुराण-संस्करण में धर्मसंहिता (अध्याय १३, १४) में संक्षिप्त रामकथा उद्धृत है। ज्ञानसंहिता (अध्याय ३०) में वनवास के समय सीता द्वारा दशरथ के लिए पिण्डदान का वर्णन है और