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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय अवतार-सामग्री २५५ अंश ही हैं। इस दृष्टि से राम का स्वतःसिद्ध लोकोत्तर महत्त्व प्रख्यात है। फिर ईसा की अमुक शती में राम ने ब्राह्मणधर्म में विष्णु के अवतार का पद प्राप्त कर लिया, यह कहना धृष्टतामात्र है । दसवें अध्याय में, १६४वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं, "रामकथा-साहित्य में अवतारवाद की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई व्यापकता के साथ-साथ भक्ति-भावना भी उत्पन्न हुई और धीरे-धीरे विकसित होने लगी। बुल्के की दृष्टि में अवतारवाद एक भावनामात्र है। राम के आदर्शचरित्र के कारण उनमें विष्णु अवतार होने की कल्पना हो गयी, वस्तुतः राम विष्णु अवतार नहीं थे। परन्तु अवतारभावना के साथ-साथ राम-भक्ति भी विकसित होने लगी।" परन्तु विष्णु, राम, कृष्ण अनादि काल से ही भारतीय साहित्य में परब्रह्म रूप से प्रसिद्ध हैं। अतः उनकी भक्ति भी अनादिकाल से ही सिद्ध है। उसका विकास या कल्पना नहीं है। बुल्के कहते हैं, "भारतीय भक्ति-मार्ग का सूत्रपात और विकास राम-भक्ति के शताब्दियों पूर्व हुआ था । वेदों में इसका बीजारोपण हुआ और भागवत धर्म में वह पल्लवित हुआ। बौद्ध धर्म और जैन-धर्म की भाँति भागवतों का भक्ति-मार्ग भी कर्मकाण्ड तथा यज्ञप्रधान ब्राह्मण-धर्म की प्रतिक्रिया रूप में उत्पन्न हुआ। लेकिन इसमें वेदों की निन्दा को स्थान नहीं मिला और इस प्रकार बाद में ब्राह्मण तथा भागवत धर्म के समन्वय के साथ वैष्णव धर्म की उत्पत्ति सम्भव हो सकी । इसमें भागवतों के देवता वासुदेव कृष्ण प्राचीन वैदिक देवता विष्णु के अवतार माने गये हैं। भक्ति-भावना इन्हीं विष्णु नारायण वासुदेव कृष्ण में केन्द्रीभूत होकर उत्तरोत्तर विकसित होने लगी । विष्णु के अवतार भी माने जाने लगे । जिनमें से रामावतार भारतीय संस्कृति के दृष्टिकोण से सबसे महत्त्वपूर्ण है । फिर भक्तिमार्ग के इतिहास में भागवत धर्म तथा पाञ्चरात्र के साहित्य में शाण्डिल्यभक्तिसूत्र, नारदीयभक्तिशास्त्र, रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभाचार्य के सम्प्रदायों में कृष्णावतार को प्रायः एकाधिकार मिला है।" परन्तु अपने उक्त कथन की पुष्टि में बुल्के ने कोई प्रमाण नहीं दिया। टिप्पणी में इनसाइक्लोपीडिया आव रिलीजन एण्ड एथिक्स के भक्तिमार्ग, हेमचन्द्रराय चौधरी के अर्ली हिस्ट्री आव वैष्णव सेक्ट, बलदेवप्रसाद मिश्र के तुलसीदर्शन को ही अपने कथन का आधार बताया है, जो कि स्वयं में ही प्रमाण नहीं हो सकते, क्योंकि उक्त कथन भारतीय साहित्य के विरुद्ध ही हैं। बुल्के भी वेदों में भक्तिमार्ग का बीज मानते हैं। पर वेद नित्य एवं अनादि हैं (दे० वेदप्रामाण्य ) । भागवतों का भक्तिमार्ग ब्राह्मण-धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, किन्तु वह ब्राह्मण- धर्म का ही एक अंग है। साथ ही वैदिक धर्म से भिन्न कोई ब्राह्मण-धर्म है यह केवल पाश्चात्यों की कल्पना है। वेदों के आरण्यक, उपनिषद् भागों में ही उपासना और ज्ञान काण्ड का प्रतिपादन है। इसी लिए वेद त्रिकाण्ड कहा जाता है। वेदों में कर्मकाण्ड की तथा कर्मकाण्ड में भी अनेक निन्दाएँ मिलती हैं पर उन निन्दाओं का तात्पर्य विविक्षित अर्थ की स्तुति में ही होता है : "नहि निन्दा निन्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम् । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति ॥" "अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥" (यजु० सं० ४०।९) उक्त प्रसङ्गों में वेदोक्त कर्मकाण्ड और उपासनात्मक ज्ञान दोनों की निन्दा है । पर यह निन्दा दोनों के समुच्चयानुष्ठान विधि के प्रशंसार्थ ही है। इस तरह कहीं कर्मकाण्ड की निन्दा देखकर इसे प्रतिक्रिया समझना भ्रान्ति ही है। महाभारत वेद का उपबृंहणमात्र है। श्रीभागवत में कहा गया है कि भगवान् व्यास ने भारत के व्यपदेश से वेदार्थ ही प्रदर्शित किया है। फलतः भागवत-धर्म का मूल नारायणीयोपाख्यान आदि भी वेदार्थ का ही उपबृंहणमात्र है। विष्णुपुराण, हरिवंश, भागवत आदि सभी पुराण भी वेदार्थ के उपबृंहण और वेद के विस्तृत आर्ष भाष्यमात्र हैं ।

२५६ रामायणमीमांसा अष्टम

शैव, वैष्णव, शाक्त आदि विभिन्न आगम एवं तन्त्र आदि भी वैदिक धर्म की ही शाखा-प्रशाखाओं के ही उपबृंहक हैं। सर्वत्र ही न केवल विष्णु या कृष्ण की ही भक्ति वर्णित है बल्कि शिव, शक्ति, विष्णु एवं राम तथा कृष्ण आदि की भक्ति का स्पष्ट वर्णन है। जैसे उपनिषदों में रामतापनीय है वैसे ही गोपालतापनीय, नृसिंहतापनीय आदि हैं। रामानुज, निम्बार्क, मध्व आदि ने रामायण, महाभारत, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों को परम प्रमाण माना है। सुतरां उनमें वर्णित राम की भक्ति को भी पूर्णरूप से आदृत किया है। श्रीमद्भागवत के नवें स्कन्ध में रामचरित का सर्वोत्तम वर्णन है।

'भक्ति का सूत्रपात ई० सन् के प्रारम्भ के आसपास हुआ' यह कहना सर्वथा असङ्गत है। वेद एवं वेदोक्त भक्ति अनादि है। आधुनिक इतिहास की दृष्टि में भी वेद, वैदिक सभ्यता तथा शिवभक्ति ईसा से हजारों वर्ष पूर्व का है। ऋग्वेद में रुद्र शब्द का प्रयोग शिव के लिए मिलता है और जो विशेषण शिवजी के लिए प्रयुक्त हुए हैं, वे प्रायः रुद्र के लिए मिलते हैं। शिव शब्द भी है ही।

आधुनिक मोहनजोदड़ो और हरप्पा की खुदाई ने भारतीय धार्मिक इतिहास पर बहुत प्रभाव डाला है। वहाँ दो प्रकार की शिव-मूर्तियाँ मिली हैं, पहली जो मोहनजोदड़ो की मुहरों में मिली है, उसमें योगावस्था में बैठे ध्यानी शिव हैं। इसमें शिवजी बीच में बैठे हैं ओर चारों ओर पशुओं की आकृतियाँ हैं। शिव को पशुपतिनाथ कहा ही जाता है, अतः बाघ, हाथी, गेंडा और भैंसा ध्यानी शिव के चारों तरफ खड़े हैं। त्रिशूल की जगह पर शिव के मस्तक पर तीन आकृतियाँ हैं। उसमें शिव के सिंहासन के नीचे दो मृग भी हैं। दूसरी मुहर में शिव के तीन मुख हैं जो ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश त्रिरूप के बोधक हैं। हरप्पा में बहुत सी पत्थर की सामग्रियाँ मिली हैं जो शिव-लिङ्ग जैसी हैं। एतावता शिव-लिङ्ग की पूजा स्वतः प्रमाणित हो जाती है। ऋग्वेद में शिश्नदेवाः शब्द (ऋ० सं० ७।२१।५ और १०।१०।१९) आया है। पाश्चात्य लोग इसके आधार पर कहते हैं कि अनार्य लोग शिव-लिङ्ग के पूजक थे, आर्यों में उन्हीं से वह ली गयी है। परन्तु पाश्चात्यों की उक्त धारणा गलत है। यास्क तथा सायण ने इसका 'अब्रह्मचर्य' अर्थ लिया है। शिश्नोदरपरायण विषयी लोग शिश्नदेव माने जाते थे। अब भी वैसे ही माने जाते हैं। इस आधार पर कम से कम ६ हजार वर्ष पहले शिव-पूजा प्रचलित थी, यह सिद्ध होता है।

ईसा से २०० वर्ष पूर्व पुष्यमित्र शृङ्ग ने वैदिक धर्म का प्रसार किया। ईसा के पूर्व पहली शती में बैंक्ट्रियन तथा शक राजाओं ने उत्तर पश्चिम भारत पर राज्य किया था। उनके सिक्कों पर वृषभ के चिह्न हैं।

ईसा की पहली शती में कुषाणवंशीय नरेशों ने एक बहुत बड़ा राज्य स्थापित किया था जिसका विस्तार वाराणसी तक था। राजा बीम कड फाइसीस तो शैव धर्म स्वीकार कर महादेव का पूर्ण उपासक हो गया था। उसके सिक्कों से यह स्पष्ट है। उनमें एक तरफ राजा का चित्र है दूसरी तरफ महादेव नन्दी को साथ लिए खड़े हैं। उनमें शिवजी त्रिशूल और डमरू लिये दिखाये गये हैं। कनिष्क ने भी वैसे ही सिक्के चलाये थे। उसके सिक्कों में शिवजी ईशो या ईश नाम से अङ्कित हैं। उस मूर्ति में महादेव की चार भुजाएँ हैं।

काशीप्रसाद जायसवाल ने नागवंशीय राजाओं का पता लगाया है। यह वंश कुषाणों के बाद और गुप्तकाल के पहले का है। इसके शिलालेखों से विदित होता है कि इस वंश के आदि पुरुष ने शिवलिङ्ग को अपने कन्धे पर रखकर शिवजी को परितुष्ट कर राज्य-स्थापना की थी। अंसभारसंनिवेशितशिवलिङ्गोद्वहनशिवसुपरितुष्टसमुत्थापित- राजवंशानां पराक्रमाधिगतभागीरथ्यमलजलमूर्धाभिषिक्तानां दशाश्वमेधावभृथस्नानानां भारशिवानाम्। (ना० प्र० पत्रिका भाग १२ अङ्क १)। इस वंश का नाम ही भारशिव था। इसके बाद भी गुप्तकाल में और उसके बाद भी शिव की उपासना चलती रही।

।४ )-> wait, is it ७।१०।४? Yes,७।१०।४`.

Line 10-12: “योजनौ रुद्रो यो अप्स्वन्तर्य ओषधीर्वीरुध य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय नमोऽअस्त्वग्नये ।” ( अथ० सं० ७।९२।१ ), “भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ । बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्न मृध्नुवेम कविनेषितासः ॥” ( ऋ० सं० ६।४९।१० ) Wait, look at line 12: सुषुम्न मृध्नुवेम - is there a space between सुषुम्न and मृध्नुवेम? Yes, there is a clear space.

Line 13-16: जो रुद्र अग्न्यादि वेदों का कारण है, जो विश्व का एकमात्र स्वामी है, महाज्ञानी और अतीन्द्रियार्थदर्शी है और जो हिरण्यगर्भ को उत्पन्न करता है वह हमें शुभ बुद्धि दे । जो रुद्र अग्नि में, जल में, ओषधियों और वनस्पतियों में है और जो भुवनों का निर्माण करता है उस तेजस्वी रुद्र को हमारा नमस्कार हो। जो भुवनों का रक्षक है तथा जो `बड़ा ज्ञानी है, प्रेरक

२५८ रामायणमीमांसा अष्टम थे तब हनुमान् और लक्ष्मण उन्हें दबा-दबाकर उनकी थकावट दूर करते थे । शूर्पणखा की नाक और कान काटकर विरूप करने के कारण उन्हें अपनी प्रिया का वियोग भी सहना पड़ा । इस वियोगजनित रोष के कारण भौंहें तन गयीं जिन्हें देखकर समुद्र भी भयभीत हो गया । इसके बाद उन्होंने समुद्र में पुल बाँधा और लङ्का में जाकर दुष्ट राक्षसों के जङ्गल को दावाग्नि के समान दग्ध कर दिया । वे कोशलेन्द्र हम सबकी रक्षा करें । “नेदं यशो रघुपतेः सुरयाञ्चयाऽऽत्तलीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः । रक्षोवधो जलधिबन्धनमक्षपूगैः किं तस्य शत्रुहनने :कपयः सहायाः ॥” (भा० पु० ९।११।२०) “यस्यामलं नृपसदःसु यशोऽधुनापि गायन्त्यघघ्नमृषयो दिग्भेन्द्रपट्टम् । तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्टपादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये ॥” (भा० पु० ९।११।२१) भगवान् श्रीराम के समान भी यश और ऐश्वर्यवाला कोई नहीं, फिर उनसे अधिक ऐश्वर्यशाली कैसे कोई हो सकता है ? भगवान् ने देवताओं की प्रार्थना से ही दिव्य लीलाविग्रह धारण किया था । उन रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीराम के लिए यह कोई बड़े गौरव की बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों से बड़े-बड़े राक्षसों को मार डाला, या समुद्र पर पुल बाँध दिया । भला क्या उन्हें शत्रुओं को मारने के लिए बन्दरों की सहायता की आवश्यकता थी । वस्तुतः सब उनकी लीला ही थी । भगवान् का निर्मल यश सब पापों को नष्ट करनेवाला है । वह इतना फैल गया कि दिग्गजों का भूषणरूप हो गया है । आज भी बड़े-बड़े मार्कण्डेय आदि ऋषि-महर्षि युधिष्ठिर आदि राजाओं की सभाओं में उस यश का गान करते हैं । स्वर्ग के देवता तथा पृथ्वी के नरपति अपने कमनीय किरीटों से उनके चरणकमल का नीराजन करते हैं । श्रीमद्भागवत वोपदेवकृत है यह कहना असङ्गत है, क्योंकि १३ वीं शती में देवगिरिस्थ वोपदेव ने भागवत के ही आधार पर मुक्ताफल, भागवतानुक्रमणिका और भागवतसारबोधक ग्रन्थ लिखे हैं । यदि वोपदेव ने भागवत भी बनाया होता तो उसका उल्लेख अवश्य किया होता । जैसे अन्य ग्रन्थों के कर्ता के रूप में वोपदेव का उल्लेख है वैसे ही भागवत में भी उल्लेख होना चाहिए था । परन्तु भागवत के प्रथम स्कन्ध में कर्ता रूप से ही व्यास का उल्लेख है । वोपदेव के आश्रयदाता चतुर्वर्गचिन्तामणि के निर्माता हेमाद्रि थे । उन्होंने महापुराणों के दान के प्रसङ्ग में श्रीमद्भागवत पुराण का भी दान लिखा है । यदि भागवत का निर्माण उसी समय हुआ होता तो महापुराणों के प्रसङ्ग में महा- पुराणरूप से भागवत का दान वर्णन कैसे होता ? फिर, वोपदेव हुए तेरहवीं शती में ग्यारहवीं शती का हस्तलिखित भागवत काशी के सरस्वतीभवन में विद्यमान है । श्रीमध्वाचार्य ने अपने भागवततात्पर्यनिर्णय ग्रन्थ में लिखा है— ‘श्रीशङ्कराचार्यचित्सुखाचार्यप्रभृतिभिर्भागवते टीकाः कृताः ।’ अर्थात् श्रीशङ्कराचार्य, चित्सुखाचार्य आदि ने भागवत पर टीकाएँ लिखी थीं । पद्मपुराण के वासुदेव- सहस्रनामभाष्य में श्रीशङ्कराचार्य ने स्वयं भागवत के श्लोक का उद्धरण किया है । श्लोक यह है—"पश्यन्त्यदो रूपमभ्रचक्षुषा ।” ( भाग० पु० १।३।४ ) । शङ्कराचार्य के परम गुरु गौड़पादाचार्य ने पञ्चीकरण-टीका में भागवत का उल्लेख किया है— “स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा । कोशलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः ॥” (भा० पु० ९।११।२२) जिन्होंने राम का स्पर्श किया, जिन्होंने दर्शन किया, जो पास बैठे और जिन्होंने राम का अनुगमन किया वे सभी कोशलवासी जहाँ योगी लोग जाते हैं उस दिव्य साकेत धाम में पहुँच गये । जब शङ्कराचार्य का समय ही

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अध्याय अवतार-सामग्री २५९ नेपाल में मिले प्रमाणों के आधार पर ईसा से सात सौ वर्ष पूर्व है तो उनके परमगुरु गौडपादाचार्य के समय की प्राचीनता में क्या सन्देह ? जब उनके द्वारा भी रामभक्ति से ओतप्रोत भागवत-श्लोक उद्धृत है तो भक्तिमार्ग को और भागवत को ईसा से कुछ वर्ष पूर्व के कहने का क्या अर्थ है । श्रीकृष्ण भगवान् भी अपनी विश्वविख्यात गीता में जैसा कहते हैं— ‘वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि’ (गी० १०।३७ ) वृष्णियों में मैं वासुदेव हूँ । उसी तरह कहते हैं—‘रामः शस्त्रभृतामहम्’ (गी० १०।३१ ) । शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ । जन-जन में रामनाम जितना प्रख्यात है उतना और कोई भी विष्णु, कृष्ण आदि का नाम प्रख्यात न हो सका । पद्मपुराण के अनुसार शिवजी ने पार्वती को बतलाया कि राम ही मेरा धन है। एक बार रामनाम का जप विष्णुसहस्रनाम जप के तुल्य होता है । हे मनोरमे ! मैं उसी राम में रमण करता हूँ । हे वरानने ! मैं अतिराम अर्थात् जामदग्न्य का अतिक्रमण करनेवाले राम में अतिरमण करता हूँ । अतिरामे रामे अतिरामे— “राम रामेतिरामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥” १४७ वें अनु० में बुल्के का यह कहना भी असङ्गत है कि “रामायण के प्रक्षिप्त अंशों में तथा भारत में कई स्थलों पर रामावतार का उल्लेख है ।” भ्रान्ति या दुरभिसन्धि से ही बुल्के रामावतार-बोधक श्लोकों को प्रक्षिप्त मानते हैं । उनके पास इसके लिए कोई भी ठोस आधार नहीं है । जब कि अवतार-पक्ष में वेद, रामायण, महाभारत तथा सभी पुराण प्रमाण हैं । सीता को लक्ष्मी बतलानेवाला युद्धकाण्ड का श्लोक भी प्रक्षिप्त नहीं है । अतएव प्राचीन रामसाहित्य में कहीं भी रामभक्ति का निरूपण नहीं मिलता, यह कहना भी गलत है, क्योंकि रामतापनीय, रामरहस्योपनिषद्, वाल्मीकिरामायण, महाभारत, अध्यात्मरामायण, पुराण आदि सब प्राचीन राम- साहित्य हैं । उनमें रामभक्ति का पूर्णतया उल्लेख है । बुल्के का कहना हैं कि “हरिवंश में तथा प्राचीन पुराणों में भी रामभक्ति का उल्लेख नहीं हुआ, अतः रामावतार की भावना के बहुत काल के बाद राम-भक्ति तथा रामपूजा का आविर्भाव हुआ है। सर रामकृष्णपुल भण्डारकर का कहना है—यद्यपि ई० सन् के प्रारम्भ से ही राम विष्णु के अवतार माने गये थे, किन्तु उनकी विशेषरूप से प्रतिष्ठा ११ वीं शती के लगभग प्रारम्भ हुई । डाक्टर श्राडर का भी यह निर्णय है कि जिन वैष्णवसंहिताओं में राम अथवा राधा की एकान्तिक पूजा प्रतिपादित की गयी है वे अर्वाचीन हैं और पाञ्चरात्र के प्रामाणिक साहित्य के अनुकरण से उत्पन्न हुई हैं। फिर भी गुप्तकालों में विष्णु के अन्य अवतारों की भाँति राम की भी पूजा प्रचलित थी । धर्मोत्तरपुराण तथा वराहमिहिर की बृहत्संहिता में राममूर्ति के निर्माण के लिए नियम मिलते हैं। ५वीं शती की वाकाटक महारानी राम गिरिखामी की भक्त थी । सम्भवतः वे दाशरथि राम थे । अग्निपुराण में मत्स्यादि-प्रतिमा-लक्षण नामक ४९ वें अध्याय में राम की मूर्ति का उल्लेख है ।” उक्त सभी लेखक पाश्चात्यों के ही प्रभाव से प्रभावित होकर उक्त निष्कर्ष पर पहुँचे हैं । रामायण में राम को परब्रह्म पुरुषोत्तम कहा गया है और फलश्रुति में राम-भक्ति करनेवालों को उत्तम फल की प्राप्ति कही गयी है। श्रीराम के रामायण का सादर श्रवण करने से श्रद्धालु जितक्रोध होकर विविध विपत्तियों को पार कर लेता है । उसके सुनने से सब देवता प्रसन्न होते हैं और प्रार्थित वरप्रदान करते हैं। स्त्रियाँ इसके सुनने से उत्तम पुत्र प्राप्त करती हैं। प्राणी सब पापों से मुक्त होता है । रामायण सुनने से ऐश्वर्य एवं पुत्र का लाभ होता है । सम्पूर्ण रामायण के सुनने से और पढ़ने से राम प्रसन्न होते हैं । राम साक्षात् सनातन विष्णु, आदिदेव हरि एवं नारायण हैं—

२५० रामायणमीमांसा अष्टम “प्रीयते सततं रामः स हि विष्णुः सनातनः । आदिदेवो महाबाहुर्हरिनारायणः प्रभुः ॥” (वा० रा० ६।१२८।११७) राम की स्तुति करते हुए ब्रह्माजी ने कहा है—राम आपका दर्शन अमोघ है एवं आपका संस्तवन अमोघ है। भूतल में आपकी भक्ति करनेवाले मनुष्य भी अमोघ होंगे। ध्रुव, पुराणपुरुषोत्तमस्वरूप आपको जो भजेंगे वे इस लोक और परलोक के सब अभीष्टों को प्राप्त करेंगे— “अमोघं दर्शनं राम अमोघस्तव संस्तवः । अमोघास्ते भविष्यन्ति भक्तिमन्तो नरा भुवि ॥ ये त्वां देवं ध्रुवं भक्ताः पुराणं पुरुषोत्तमम् । प्राप्नुवन्ति तथा कामानिह लोके परत्र च ॥” (वा० रा० ६।११९।३०, ३१) जब इस तरह राम के समकाल में ही ब्रह्मादि देवता ही राम की भक्ति और उसका फल वर्णन करते हैं और महाभारत एवं पुराण सभी इसका साक्ष्य दे रहे हैं तब यह कहना कि ११वीं शती से राम की भक्ति चली धृष्टतामात्र है। हरिवंश में राम को विष्णु का स्वरूप बताया है तो सुतरां उनकी भक्ति सिद्ध है। भक्ति का अर्थ मूर्ति-पूजा ही नहीं है; श्रवण, पठन, ध्यान आदि भी भक्ति है। वस्तुतस्तु भगवद्गुणगणश्रवणजनित द्रवीभूत अन्तःकरण की भगवदाकाराकारित वृत्ति ही भक्ति है— “मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये । मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ (भा० पु० ३।२९।११) जैसे समुद्र की ओर द्रवीभूत निर्मल परम पवित्र गङ्गा का अविच्छिन्न प्रवाह प्रवाहित होता है इसी तरह सर्वगुहाशयी भगवान् की ओर निर्मल द्रवीभूत अन्तःकरण की अविच्छिन्न वृत्ति ही भक्ति है। जो राम का अवतार और राम की भक्ति का वर्णन करने के कारण ही परम प्रामाणिक रामायण के अविभाज्य अङ्ग को प्रक्षिप्त कहने का साहस कर सकता है वह प्रामाणिक से प्रामाणिक ग्रन्थ को प्रक्षिप्त कह सकता है। बुल्के को वाल्मीकिरामायण के पाँच काण्ड प्रामाणिकरूप से मान्य हैं पर उनमें अवतार-बोधक वचनों को वे प्रक्षेप मानते हैं। वे कहते हैं कि प्राचीन पुराणों में राम की भक्ति का उल्लेख नहीं है। यदि उन प्रामाणिक पुराणों में रामभक्ति का उल्लेख मिल जाय तो बुल्के उनको भी प्रक्षेप कह देंगे। इसकी कोई चिकित्सा ही नहीं है। इस तरह तो ईसाई बुल्के की बाइबिल को भी तो प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। विष्णुधर्मोत्तर और अग्निपुराण भी अर्वाचीन नहीं हैं। भारतीय दृष्टिकोण से पुराण अति प्राचीन हैं, अतएव वेदों तथा उपनिषदों में पुराणों का वर्णन है। उन्हें पांचवे वेद की संज्ञा दी गयी है। यह पीछे कहा जा चुका है। पुराणों के अनुसार राम भी पुराणों का श्रवण करते थे। तुलसीदासजी भी कहते हैं— “वेदपुरान वसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम यद्यपि सब जानहिं ॥” (रा० मा० ७।२५।१) वेद, पुराण सभी अनादि ही हैं। भेद इतना ही है कि वेदों की आनुपूर्वी कभी नहीं बदलती है, अतः वे अपौरुषेय हैं। इतिहास-पुराण पौरुषेय हैं, अतः उनकी आनुपूर्वी विभिन्न कल्पों में बदलती रहती है। परन्तु कथावस्तु और सिद्धान्त ज्यों के त्यों बने रहते हैं। इतिहास पुराण-कार त्रिकालज्ञ ऋषि हैं। अतः उनके ग्रन्थों में अतीत के समान ही अनागत वृत्तान्तों का भी वर्णन हुआ है। यह न समझने के कारण ही बुल्के आदि किसी अर्वाचीन वस्तु को देखकर उसके आधार पर पुराणों के रचना-काल की खोज करते हैं। इन्हीं वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के अनुसार ही तमिल के प्राचीनतम आल्वारों के स्तोत्रों में राम का उल्लेख हुआ है। कुलशेखर ( नवी शती के ) आल्वार द्वारा कृत रामभक्ति का निरूपण स्वतन्त्र

अध्याय अवतार-सामग्री- २६१

नहीं है, किन्तु वह सब वेदादि के आधार पर ही आधारित है। अतएव यह भी कहना निराधार है, "रामभक्ति तथा रामपूजा का शास्त्रीय प्रतिपादन पहले पहल रामानुजसम्प्रदाय में हुआ है।" यह कहना भी अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना है कि 'रामानुज ने भी रामभक्ति पर कुछ नहीं लिखा'; परन्तु अपने श्रीभाष्य में उन्होंने विभवों में राम और कृष्ण का उल्लेख किया है ( श्रीभाष्य २।२।४२ ), क्योंकि उनके सम्प्रदाय में प्रथम अर्चावतार की पूजा होती है, उसके पश्चात् विभव की पूजा होती है। अतः राम और कृष्ण को विभव स्वीकार करने से ही उनकी भक्ति भी स्वीकृत हो जाती है। बुल्के कहते हैं, "रामानुजसम्प्रदाय में अगस्त्यसंहिता, कलिराघव, बृहद्राघव, राघवौयसंहिता तथा तीन रामभक्तिसम्बन्धी उपनिषदें सुरक्षित हैं—रामपूर्वतापनीय, रामोत्तरतापनीय तथा रामरहस्योपनिषद् । इनमें रामयन्त्र, राममन्त्र तथा सीतामन्त्र आदि का उल्लेख है।" पर बुल्के का उक्त कथन सर्वथा अशुद्ध और अप्रामाणिक है, क्योंकि अगस्त्यसंहिता ग्रन्थ अतिप्राचीन है। उसका रामानुजसम्प्रदाय में परम आदर अवश्य है। परन्तु वह सम्प्रदाय के किसी आचार्य की कृति है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है। बुल्के भी कोई प्रमाण नहीं दे सके । रामतापनीय आदि उपनिषदें तो अनादि अपौरुषेय वेद के अविभाज्य अङ्ग होने से अपौरुषेय वेद ही हैं। राममन्त्र, सीतामन्त्र आदि अनादि परम्परा से ही प्रचलित हैं। किसी सम्प्रदाय में मन्त्र का निर्माण करके उपदेश नहीं होता, किन्तु अनादिपरम्पराप्राप्त मन्त्र का ही उपदेश होता है। इसी कारण इतर सम्प्रदायों में भी राममन्त्र-परम्परा चलती है। राममन्त्र अति प्राचीन स्मार्त सम्प्रदाय में भी प्रचलित है। अतएव रामतापनीय में स्पष्ट कहा गया है कि साक्षात् शङ्कर ने भी राममन्त्र का जप किया था। इसे मिथ्या कहने का साहस करना साहस ही होगा। अपनी बातों की पुष्टि में बुल्के ने भण्डारकर तथा डा० श्राडर के लेखों का स्मरण किया है जो कि स्वयं ही प्रमाणसापेक्ष हैं। बुल्के के अनुसार "उत्तरतापनीय तथा रामरहस्योपनिषद् में अद्वैत भक्ति भी प्रतिपादित है— "सदा रामोऽहमस्मीति तत्त्वतः प्रवदन्ति ये । न ते संसारिणो नूनं राम एव न संशयः ॥" जो सर्वदा तत्त्व की दृष्टि से अपने को कार्यकारणसङ्घात से भिन्न अखण्डबोध रामरूप ही समझते हैं वे संसारी न होकर राम ही हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है।" यह उद्धरण ही बुल्के के इस कथन को अप्रमाणित सिद्ध करता है कि ये उपनिषदें रामानुजसम्प्रदाय में ही निर्मित हुई हैं। कारण यदि ये किसी रामानुजीय आचार्य से निर्मित होती तो इनमें अद्वैत का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि उस सम्प्रदाय में अपने को राम या विष्णु या ब्रह्म समझना एक प्रकार का अपराध है। वे यह भी कहते हैं कि "रामतापनीय के अनेक स्थलों पर अध्यात्मरामायण के रामहृदय का साम्य पाया जाता है ( ४।७।१९) । इसमें संक्षिप्त रामचरित भी दिया गया है जिसके अनुसार रावण ने मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से सीता का हरण किया था 'स्वनिवृत्त्यर्थम्' । राम और लक्ष्मण (सीता की खोज के व्याज से ) पृथिवी का भ्रमण करते थे तथा सुग्रीव ने सीता को ले आने की आज्ञा दी थी।" वस्तुतः वेद और उपनिषद् ही रामचरित्र रामायणादि ग्रन्थों के भी मूल हैं। यह पीछे स्पष्ट किया जा चुका है, अतः अध्यात्मरामायण आदि रामतापनीय के अनुसार ही हो सकते हैं। उपनिषद् में निवृत्त्यर्थ में निवृत्ति का अर्थ मुक्ति नहीं है, किन्तु नाश ही अर्थ है। यह व्यावहारिक भाषा है। जैसे कहा जाता है पतङ्ग अपने नाश के लिए दीपादि पर हमला करता है। उसी तरह रावण भी अपने नाश के लिए ही

सीताहरणरूप कार्य में प्रवृत्त हुआ था। कलिसन्तरण और कृष्णोपनिषद् में भी राम के नाम का माहात्म्य और राम की चर्चा है ही। तारसार, त्रिपादविभूतिमहानारायण, मुक्तिकोपनिषद् आदि में राम की चर्चा है ही। त्रिपादविभूतिमहानारायण में तो भरताग्रज जानकीवल्लभ सम्बन्धित ७ वें अध्याय में 'दाशरथाय विद्महे सीता- वल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्' इस रामगायत्री का उल्लेख है। और भी अनेक उपनिषदों में राममाहात्म्य तथा वन्दना वर्णित है। मुक्तिकोपनिषद् में 'राम त्वं परमात्मासि' इत्यादि उक्तियाँ ठीक ही हैं। सीतोपनिषद् भी श्रुति ही है। बुल्के कहते हैं, "उन सब ग्रन्थों की रचना का काल निर्धारित करना असम्भव प्रतीत होता है।" वस्तुतः प्रतीत नहीं असम्भव ही है। कारण, वेद अनादि हैं। उक्त उपनिषदें वेद हैं, अतः अनादि ईश्वर के अनादि निःश्वासभूत हैं। उनका रचनाकाल ढूँढना अनभिज्ञता ही है। संसार में कोई भी व्यक्ति छोटा सा भी लेख लिखता है तो उपाधियों सहित उसमें अपने नाम का उल्लेख करता है। यदि ये उपनिषदें किसी व्यक्तिविशेष की निर्मित होतीं तो इनमें उस लेखक का नाम अवश्य होता। लेखक का नाम न होने से भी इनकी अपौरुषेयता ही व्यक्त होती है। वेबर ने रामतापनीय का प्राचीनतम निर्माणकाल ११वीं शती माना है। उनके अनुसार उस समय से लेकर रामभक्तिविषयक साहित्य का निर्माण होने लगा था। परन्तु वेबर की यह कल्पना अटकल पर ही निर्भर है। रामार्चनसोपान, सर्वसिद्धान्त, रामार्चनपद्धति, रामपूजापद्धति आदि पौरुषेय ग्रन्थों के निर्माणकाल की कल्पना ठीक हो सकती है। इसी प्रकार भगवद्गीता के अनुकरण पर रामगीता नामक ग्रन्थों का उल्लेख मानना भी अशुद्ध है। कारण जिस महाभारत का भगवद्गीता रत्न माना जाता है उसमें उत्तरगीता, अनुगीता आदि अनेक गीताओं का उल्लेख है। इसमें अनुकरण का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। अतएव अध्यात्मरामायण की रामगीता, स्कन्दपुराणीय निर्वाणखण्ड की रामगीता को किसी का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। अध्यात्मरामायण की रामगीता को तो कथमपि अनुकरण नहीं कहा जा सकता। तत्त्वमस्यादि वाक्यों का विवेचन और श्लोकों का ढङ्ग इसका सर्वथा विलक्षण ही है। गो० तुलसीदासजी का श्रोराचरितमानस किसी सम्प्रदायविशेष पर निर्भर नहीं है, किन्तु उनके ही शब्दों में नानापुराण, निगम, आगम और अपनी परम्परा पर ही निर्भर है। बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है, "रामभक्ति के विकास के साथ-साथ रामकथा को भक्ति के ढाँचे में ढालने की आवश्यकता का अनुभव हुआ। फलस्वरूप बहुत से साम्प्रदायिक रामायणों की सृष्टि होने लगी। जिनमें अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा अद्भुतरामायण प्रमुख हैं।" क्योंकि रामभक्ति के विकास के आधार पर भक्तिग्रन्थों का आविर्भाव नहीं हुआ। किन्तु उन वेद, उपनिषद् आदि ग्रन्थों के आधार पर ही भक्ति का आविर्भाव हुआ है। अतः अध्यात्मरामायण आदि को अर्वाचीन बतलाने का साहस करना वृथा ही है। अध्यात्मरामायण का निर्माण शङ्कराचार्य के अद्वैतसिद्धान्त के अनुसार नहीं हुआ, किन्तु शङ्कराचार्य के अद्वैतसिद्धान्त को ही इसके अनुसार कहा जा सकता है। तभी तो इसका सम्मान अन्य सम्प्रदायों में भी है। यदि यह शङ्कराचार्य के सिद्धान्त के आधार पर निर्मित होता तो निश्चित ही विशिष्टाद्वैती तथा रामानन्दीय सम्प्रदाय में इसका इतना आदर न होता। अद्वैत- बोधक बहुत से वचन जैसे वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों में मिलते हैं, वैसे ही अध्यात्मरामायण में भी हैं। अतः इतने से ही किसी अद्वैतसम्प्रदायी द्वारा उसका निर्माण नहीं कहा जा सकता। श्रीमद्भागवतपुराण का भी राम- चरितमानस में आश्रय लिया गया है। रामचरितमानस का भी वह मुख्य आधार पुराणांश होने से ही हुआ है। अतएव वह अध्यात्मरामायण तथा ब्रह्माण्डपुराण का ही अंश माना जाता है। यदि अन्य कोई रचयिता होता तो वह ऐसे ग्रन्थरत्न के रचयिता के रूप में अपने नाम का अवश्य उल्लेख करता। अतएव १७५ वें अनु० की बुल्के की कल्पनाएँ निराधार ही हैं। एकनाथ वाल्मीकिरामायण की अपेक्षा अध्यात्मरामायण को अर्वाचीन मानते हैं। सो यह तो ठीक ही है। वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ चौबीसवीं चतुर्युगी के त्रेतायुग की कृति है और

अध्याय अवतार-सामग्री २६३ अध्यात्मरामायण २८वीं चतुर्युगी के द्वापर में व्यास द्वारा निर्मित है, अतः उसकी प्राचीनता महाभारत के समान ही असन्दिग्ध है। भारतीय लेखक मिथ्या संवाद नहीं लिखते । अतएव सर्वज्ञकल्प व्यास ने ही ब्रह्मानारदसंवाद और पार्वती-शङ्कर संवाद के रूप में अध्यात्मरामायण का आविर्भाव किया है। अवतारवाद की व्यापकता वस्तुस्थिति है। श्रीराम परब्रह्म हैं और सीता मूलप्रकृति है, यह उल्लेख ठीक ही है। बालकाण्ड में भागवत का अनुकरण करके राम का कौशल्या को अपना विष्णुरूप दिखलाया गया है, यह भी अशुद्ध है, क्योंकि पुराणों में अन्यत्र भी वही पद्धति है। वामन भगवान् भी अपनी माता अदिति के सामने चतुर्भुजरूप से ही प्रकट हुए थे। इसी तरह भगवान् व्यास तथा ब्रह्मा, नारद और शिव, पार्वती की परम्परा के राम का कौशल्या में वैसा ही आविर्भाव हुआ है। इसी लिए इस संवाद में वैसा उल्लेख है। अहल्योद्धार, केवट का वृत्तान्त, अभिषेक के पूर्व राम-नारदसंवाद, मन्थरा में सरस्वती का प्रवेश, वाल्मीकि द्वारा अपनी कथा द्वारा रामनाम का माहात्म्य वर्णन, मायामयी सीता का हरण-वृत्तान्त, लक्ष्मण का १९ वर्ष तक उपवास आदि, सेतुबन्ध के पूर्व रामेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना आदि सब वृत्तान्त कल्पना नहीं हैं किन्तु वस्तुस्थिति के अनुसार ही उनका उल्लेख है। तदनुसार ही अनेक पुराणों में भी रामेश्वरस्थापना का वर्णन है। इतना ही नहीं आज तक सेतुबन्ध रामेश्वर नाम से ही धनुष्कोटि के समीप रामेश्वर लिङ्ग स्थित है। देश-देशान्तर से लक्ष्यों लक्ष आस्तिक दर्शन करने जाते हैं। 'नह्यमूलं प्ररोहति' बिना मूल के यह सब सम्भव नहीं हो सकता। अद्भुतरामायण को भी अर्वाचीन कहना अशुद्ध ही है। विभिन्न रामायणों और पुराणों में रामकथा की वस्तु के भेद का कारण कल्पभेद ही है। रामचरितमानस में कहा गया है— “कलपभेद हरि चरित सुहाये, भाँति अनेक मुनीसन गाये ।” ( रा० मा० १।३२।४ ) सहस्रमुख रावणवध आदि भी कल्पनामात्र नहीं है। अतीत घटनाओं में इतिहास आदि ग्रन्थ ही प्रमाण होते हैं। अतः अद्भुतरामायण के अनुसार तथावर्णित उस घटना के अभाव में कोई प्रमाण नहीं। आनन्दरामायण भी अद्भुतरामायण आदि के तुल्य वाल्मीकिकृत ही है। पुराणों तथा वाल्मीकिपरम्परा प्राप्त वचनों के आधार पर प्रत्येक आस्तिक यह जानता है कि रामायण ग्रन्थ शतकोटि श्लोकों में विस्तृत हुआ है। “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥” ( रामरक्षास्तोत्र ) रघुनाथ रामभद्र का चरित्र शतकोटि श्लोकों में विस्तृत हुआ है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है— “रामायन सतकोटि अपारा” ( रा० मा० १।३२।३ ), “रामचरित सतकोटिमहँ, लिय महेश जिय जानि ।” ( रा० मा० १।२५ ) रामचरित मानस में कवीश्वर और कपीश्वर दोनों को 'सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारी' कहा गया है। “सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥” ( रा० मा० १।मंगलाचरण। ४ ) तुलसीदास जैसे तत्त्वदर्शी सन्त स्वप्न में भी अनृतवादी होना पाप मानते हैं। फिर वे मिथ्या बातों को अपने अमरकाव्य में कैसे स्थान दे सकते थे ? वी. राघवन्, जी. ग्रियर्सन आदि समालोचकों की समालोचना निष्प्रमाण ही है। उन विदेशियों एवं भारतीयसंस्कारशून्य लोगों को इन परम प्रामाणिक आर्षग्रन्थों के सम्बन्ध में

२६४ रामायणमीमांसा अष्टम कुछ भी ज्ञात नहीं है। जैसे कुरान, बाइबिल आदि ग्रन्थों के सम्बन्ध में भी उनके रहस्यज्ञ विद्वान् ही कुछ कह सकते हैं, अन्य नहीं वैसे ही रामायण के सम्बन्ध में भी समझना चाहिये । १५०वें अनु० में बुल्के का कहना है "भारतीय भक्तिमार्ग के इतिहास में कृष्ण तथा बाद में राधा और कृष्ण का स्थान निर्विवाद रूप से प्रधान है और रामभक्ति पर कृष्णभक्ति का प्रभाव पड़ जाना स्वाभाविक था। राम के प्रति दास्यभक्ति के अतिरिक्त माधुर्यभक्ति का भी प्रतिपादन किया गया है। इस माधुर्यभक्ति के आधार पर रसिकसम्प्रदाय का सम्भवतः १६वीं शती ई० के अन्त में प्रवर्तन हुआ ।” यह कथन भी असङ्गत ही है, क्योंकि भारतीय भक्ति का इतिहास अति प्राचीन काल से वेदों में ही वर्णित है। “मुमुक्षुर्वे शरणमहं प्रपद्ये ।” “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।” ( श्वे० उ० ६।२३ ) । के अनुसार प्रपत्ति, भक्ति तथा शरणागति शब्द एक ही वस्तु के बोधक हैं। निर्गुण निराकार ब्रह्म तथा सगुण साकार ब्रह्म की भी भक्ति वेदों में वर्णित है । वेदों और उपनिषदों में उपासना एवं तत्त्वज्ञान का ही प्राधान्येन वर्णन है । ब्रह्मसूत्रों में भी उपासना और तत्त्वज्ञान की दृष्टि से ही ब्रह्म का विचार प्रस्तुत हुआ है। दर्शन, वेदन, ज्ञान आदि शब्दों का उपासना के प्रसङ्ग में उपासना ही अर्थ है। यह शङ्कर, रामानुज, निम्बार्क, मध्व तथा वल्लभ सभी को मान्य है। यह उपासना भी भक्ति है। श्रीरामानुजाचार्य ने ध्रुवा स्मृति को भक्ति माना है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन तथा पूर्णानुरक्ति आदि सभी प्रकार की भक्तियाँ वेदों में वर्णित हैं। “सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ।” “त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ।।” ( वा० रा० ६।१८।१६,१७ ) “सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।।” ( वा० रा० ६।१८।३३ ) सर्वमान्य गीता में भी भक्ति और शरणागति का खूब उल्लेख है। उसमें स्वयं भगवान् द्वारा ईश्वर (शिव) की शरणागति का उल्लेख है— “तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिस्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥” ( गीता १८।६२ ) अतः भक्ति का प्रचार आधुनिक नहीं है। उक्त वचनों में शरणागति का वर्णन भक्ति का ही वर्णन है । हनुमान्, विभीषण, भरत तथा लक्ष्मण ये भी उत्कृष्ट कोटि के भक्त थे। आजकल भक्तों एवं परम भागवतों में इन सबकी गणना है । श्रीतुलसीदासजी ने कहा है— “भरत सरिस को रामसनेही । जग जपु राम राम जपु जेही ।” ( वा० रा० २।२१७।४ ) भागवत आदि में नमस्कार भी वन्दनरूप भक्ति है । वेदों में 'नमस्ते रुद्र मन्यव उतोत इषवे', 'नमो हिरण्य- बाहवे' आदि रूप से भगवान् सगुण साकार शिवजी का स्पष्ट ही वर्णन है। रामेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना करनेवाले राम शिवभक्त ही थे। उपमन्यु से शिवमन्त्र की दीक्षा लेकर शिवजी की उपासना करते थे। महाभारत में श्रीकृष्ण ने भीष्म और धर्मराज के अनुरोध पर शिवजी की भक्ति का वर्णन किया है। महाभारत में ही श्रीकृष्ण के उपदेश से अर्जुन ने भगवती की स्तुति की थी। अतः भारतीय भक्ति के इतिहास में अनादिकाल से ही शिव, विष्णु, सीताराम तथा राधाकृष्ण की भक्ति प्रचलित है। अतः ११वीं या १७वीं शती से कृष्ण या राम की भक्ति प्रचलित हुई इत्यादि कल्पनाएँ निर्मूल ही हैं ।

अध्याय अवतार-सामग्री २६५ उत्तररामचरित, जानकीहरण, हनुमन्नाटक आदि ही नहीं वेदों, उपनिषदों और वाल्मीकिरामायण में भक्ति-भावना से ही रामचरित्र का वर्णन हुआ है । इसी लिए "प्रीयते सततं रामः" ( वा० रा० ६।१२८।११७ ) इत्यादि वचनों से कहा गया है कि रामायण-श्रवण से राम प्रसन्न होते हैं। इतना ही नहीं भारतीय दर्शनों के अनुसार 'भूतं भव्याय कल्पते' प्रत्येक भूत सिद्ध वस्तु का वर्णन उपासना या कर्म के लिए होता है। इसी लिए 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' ( जै० सू० १।२।१ ) में कहा गया है कि आम्नाय वेदराशि का क्रिया ही प्रयोजन है, अतः क्रिया जिनका अर्थ नहीं है वे अर्थवाद और मन्त्र आदि अनर्थक होंगे । इसी लिए विधि के साथ एकवाक्यता के द्वारा विध्यर्थ की स्तुति करके विधि का अङ्ग बनकर ही अर्थवाद सार्थक होता है। मन्त्र भी विध्यर्थ के अनुष्ठान में अपेक्षित कर्माङ्ग द्रव्य और देवता का स्मरण कराकर विधियोग से ही सार्थक होते हैं । ठीक इसी तरह रामायण आदि में राम और रामचरित्र का वर्णन उपास्यस्वरूप के समर्पण द्वारा उपासना में ही उपयुक्त होकर सार्थक होता है। सगुण ब्रह्म और उसका चरित्र उपास्यरूप में ही वर्णित होता है। निर्गुण ब्रह्म के प्रसङ्ग में सृष्टिकारणत्वादि वर्णन निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान के अङ्गरूप में हुआ है । लाखों करोड़ों श्लोकों में राम और रामचरित्र का वर्णन भक्ति एवं तत्त्वज्ञान के लिए हैं, अतः भक्ति को अर्वाचीन काल का मानना अत्यन्त असङ्गत है । अध्यात्मरामायण की बाललीला पर कृष्ण की बाललीला का प्रभाव सुस्पष्ट है। आनन्दरामायण, सत्यो- पाख्यान आदि में जो राम-सीता की विलासक्रीड़ाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है वह भी कृष्णलीला से प्रभावित है । कृष्णलीला के अनुकरण की परमसीमा यह है कि भुशुण्डिरामायण, हनुमत्संहिता, बृहत्कोसलखण्ड, संगीतरघुनन्दन आदि ग्रन्थों में राम की रासलीला की कल्पना कर ली गयी है। विवाह के पूर्व तथा पश्चात् राम अयोध्या के आस- पास रासलीला करते हैं तथा वनवास के समय चित्रकूट में भी । आगे चलकर मधुराचार्य आदि रसिक-सम्प्रदाय के आचार्यों ने रामकथा में यह परिवर्तन किया है कि वास्तव में न तो मीता का हरण हुआ और न स्वयं ब्रह्मराम ने एक तुच्छ राक्षस के वध के लिए धनुषबाण ही धारण किया है। वनयात्रा के समय राम, लक्ष्मण और सीता चित्रकूट के आगे नहीं बढ़े । वे स्वयं अपनी आह्लादिनी शक्ति सीता के साथ चित्रकूट में विहार करते रहे। इस लीला में कैङ्कर्य और व्यवस्था लक्ष्मण, जो जीवतत्त्व के प्रतिनिधि थे, करते रहे। चित्रकूट के आगे लक्ष्मी, नारायण और शेष उनके वेष में गये थे । परात्पर ब्रह्म रामजी ने रावण का वध करके सीता रूपी लक्ष्मी का उद्धार किया था । चित्रकूट लौट आये । कृपानिवासजी ने स्वरचित रामायण में यह कथा विस्तारपूर्वक लिखी है। मधुराचार्य ने राज्याभिषेक के अनन्तर सीता-वनवास की घटना को इसी प्रकार राम की प्रकाशलीला माना है। उपर्युक्त उल्लेखों के आधार पर भी राम की बाललीला और मधुर आदि लीलाओं को अनुकरण नहीं कहा जा सकता है। यह सब तभी कहा जा सकता है जबकि यह मान लिया जाय कि राम और राम की कथाएँ वस्तुस्थितिमूलक नहीं हैं केवल कल्पना- मूलक हैं; पर यह शतशः खण्डित है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि रामलीला कृष्णलीला की अपेक्षा अति प्राचीन है । कहा जा चुका है कि महर्षि वाल्मीकि ने अपौरुषेय वेदों, उपनिषदों तथा श्रीनारद के उपदेशों से राम की कथावस्तु को जानकर और समाधिजनित ऋतम्भरा प्रज्ञा से सम्पूर्ण चरित्रों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रामायण का निर्माण किया है। महर्षि व्यास ने इसी तरह श्रीमद्भागवत का निर्माण किया है। रामायण शतकोटिप्रविस्तर है । उसका सार २४ हजार श्लोकों का वर्तमान रामायण ग्रन्थ है। इसके अन्य अंश रामचरित का किन्हीं महर्षियों को वाल्मीकि के समान ही साक्षात्कार हो सकता है। वर्तमान रामायण की अधिकांश कथावस्तु तो राम की ४० वर्ष की आयु के भीतर की है। वाल्मीकि के अनुसार ११ हजार वर्ष तक राम धरातल पर राज्य करते रहे हैं। अतः उनके सम्पूर्ण जीवन का वृत्तान्त लिखा जाय तो शतकोटि भी कम ही है । इसके अतिरिक्त यह कहा गया कि अधिकांश वाल्मीकि- रामायण का निर्माण सीताशुद्धि के उद्देश्य से ही हुआ है । इसके अतिरिक्त बहुत से गुप्त चरित्र हो ही सकते हैं ३४

२६६ रामायणमीमांसा अष्टम जिनका उल्लेख अन्य रामायणों में या अन्य ऋषियों की कृतियों में हो सकता है । जिनको आर्षविज्ञान नहीं सम्भव है ऐसे कविगण तो रामायण, महाभारत, पुराण, उपपुराण, तन्त्र, आगम आदि प्रामाणिक आर्ष ग्रन्थों के आधार पर ही काव्य-निर्माण करते हैं ! क्योंकि सिद्धान्त ग्रन्थों का ही उन्हें वैसा ही निर्देश है और वैसी ही परम्परा है । आर्ष विज्ञान के आधार पर प्रथम काव्य होने से ही वाल्मीकिरामायण आदि काव्य कहा जाता है। विक्रम २००० पूर्व महाकवि कालिदास ने भी वाल्मीकिरामायण को आदि काव्य कहा है। पुराणों के अनुसार वेदवेद्य परमात्मा जब दशरथात्मज राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस से रामायण के रूप में अवतरित हुए— 'वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ।।' (लवकुशप्रोक्त मङ्गलाचरण १३) 'अनन्ता वै वेदाः' ( तै० ब्रा० ३।१०।११।४ ) के अनुसार वेद अनन्त हैं, ईश्वर का ज्ञान अनन्त है । कोई भी ज्ञान बिना शब्दानुवेध के नहीं होता है । सुतरां ईश्वर का अनन्त ज्ञान जिन शब्दों से अनुविद्ध था वे ही वैदिक शब्द हैं । अनन्त वेद का अवतार शतकोटि रामायण के ही रूप में हो सकता है । वर्तमान वाल्मीकिरामायण गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों के आधार पर है । अतः जो वेद या आर्ष ज्ञान राम की लीलाओं के आधार थे वे ही कृष्ण लीलाओं के आधार थे । इसलिए कई अंशों में तुल्यता परिलक्षित होती है । अतः तुल्यता देखकर किसी को किसी का अनुकरण कहना ठीक नहीं । अतएव बुद्ध और ईसा की बहुत अंशों में तुल्यता होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि ईसा के चरित्रलेखक ने बुद्ध के चरित्र का अनुकरण किया है । श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान् का अवतार केवल धर्म-ग्लानि (अधर्म) की निवृत्ति तथा धर्मसंस्थापना एवं दुष्टदर्पदलन तथा साधुपरित्राण के लिए ही नहीं, किन्तु मुख्यतया अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रों को भक्तियोग-विधान के लिए ही होता है— “तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥” (भा० पु० १।८।२०) श्रीमद्भागवत में यह भी उल्लेख है कि भक्त की मनोवाञ्छा के अनुसार ही भगवान् अपना रूप बनाते हैं— “यद्यद् धिया त उरुगाय विभावयन्ति । तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥” (भा० पु० ३।९।११) वेद में भी उल्लेख है कि 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' ( ऋ० सं० १।१६४।४६ ) एक ही तत्त्व मित्र, वरुण, अग्नि आदि अनेक रूपों से प्रकट होता है, 'तं यथा यथोपासत' ( श० ब्रा० १०।५।२।२० ) । उस परमेश्वर की जिस प्रकार उपासना की जाती है परमेश्वर उन-उन रूपों में ही उपलब्ध होता है । गीता में भगवान् को गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण तथा सुहृद् रूप से उपास्य कहा गया है— “गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृद् ।” (गी० ९।१८) अर्जुन ने भी कहा है कि हे देव, जैसे सखा सखा के अपराधों को एवं प्रिय प्रिया के अपराधों को क्षमा करता है वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये । इन्हीं शास्त्रीय आधारों पर अनादिकाल से ही परमेश्वर के प्रति मधुरभाव की उपासना होती है । ऋग्वेद के अपालासूक्त में अपाला ने इन्द्र की कान्तभाव से उपासना की थी । इन्हीं मूल आधारों पर ही अगस्त्यसंहिता आदि आर्ष ग्रन्थों में वस्तुस्थिति के अनुसार ही श्रीराम की मधुर उपामनाओं का वर्णन हुआ है । भागवत आदि ग्रन्थों में भी उसी के आधार पर मधुर भक्ति का वर्णन है । शिवजी के प्रति भी

ऐसे भावों का वर्णन जगद्धर भट्ट की स्तुतिकुसुमाञ्जलि में हुआ है। निर्गुणवादी कबीर आदि ने अपने इष्ट ब्रह्म को पिया (प्रिय) के रूप में माना है। अतः इन्हीं आधारों पर मधुराचार्य आदि ने अपने ग्रन्थों में मधुर भक्ति का उल्लेख किया है। राम ने रावणवध आदि कार्य नहीं किये। यह तो पारमार्थिक सिद्धान्त का ही उल्लेख है, कोई अजीब नहीं। वेदान्त-मत में आत्मा कर्तृत्व तथा भोक्तृत्व से रहित अकर्ता और अभोक्ता ही है— “अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।” (गी० ३।२७) “न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।” (गी० ५।१४) परमेश्वर वस्तुतः अकर्ता ही है। अनन्त ब्रह्माण्डों का उत्पादकत्व, पालकत्व आदि अनन्तानन्त ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के सम्बन्ध से ही परमेश्वर में होता है। अध्यात्मरामायण में सीता ने हनुमान् को बतलाया है कि शिवधनुषभंग, रावण-वध आदि सब काम मैंने (मूलप्रकृति ने) किये हैं। राम में तो अज्ञानवश ही कर्तृत्व का आरोप है। वेदान्त की दृष्टि से सोपाधिक ब्रह्म संसार की उत्पत्ति, पालन आदि का काम करता है। निरुपाधिक ब्रह्म सदा ही स्वरूपानन्द में ही प्रतिष्ठित रहता है। रामायण के राम; भागवत के कृष्ण तथा विष्णुपुराण के विष्णु वस्तुतः एक ही वस्तु है। तीनों सगुण एवं साकार रूप पृथक् पृथक् हैं। सगुण निराकार रूप तथा निर्गुण रूप तीनों का एक ही है। शिवपुराण के शिव तथा शाक्तागमों की भगवती भी पूर्वोक्त तीन प्रकार की हैं। नृसिंहतापनीय, रामतापनीय आदि उपनिषदों में प्रणव की अ, उ, म् और अर्धमात्रा मानकर अर्धमात्रा का ही रामरूप में अवतार माना गया है। उस दृष्टि से जब तुरीय शुद्ध ब्रह्मरूप राम हैं तब तो उनमें कारणता भी नहीं है। उसी से रावणवध आदि कार्य राम ने नहीं किये, किन्तु मायाविशिष्ट कारणब्रह्मरूप लक्ष्मी नारायण आदि में ही कारणता का वर्णन है। उसी दृष्टि से यह कहना असङ्गत नहीं है कि राम सदा अपनी स्वरूपभूता आह्लादिनी शक्ति सीता में क्रीड़ा करते रहते हैं। ईश्वरी शक्ति जगदुत्पत्ति आदि तथा राक्षस-वध आदि कार्य करती है। हितहरिवंश आदि ने भी कहा है कि कार्य-कारणतीत नित्य निकुञ्जाधिपति कृष्ण सृष्टि आदि प्रपञ्च से दूर रहकर निरन्तर राधा को ही जानते हैं और कुछ जानते ही नहीं। “श्रीराधामेव जानन् व्रजपतिरनिशं कुञ्जवीथीमुपास्ते ।” (राधासुधानिधि) जिन वेदादि शास्त्रों के आधार पर सिद्धसिद्धान्तों के अनुसार रामभक्तों ने कार्यकारणातीत राम का प्रतिपादन किया है उन्हीं के अनुसार कृष्णभक्तों ने कृष्ण का निरूपण किया है, अतः दोनों में समता प्रतीत होती है। एतावता किसी को किसी का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। राम का बहु विवाह भी कल्पभेद से सङ्गत है। १५१वें अनु० में “हरिवंश का रचनाकाल ४०० ई० के लगभग बताया गया है।” इसमें आर० सी० हाजरा इण्डियन कल्चर भाग २ पृ० २३७ तथा न्यू इण्डियन ऐण्टिक्वेरी भाग १ पृ० ५३२ का प्रमाणरूप से निर्देश किया गया है। जो सर्वथा अशुद्ध है। वस्तुतः हरिवंश के अनुसार वह महाभारत का खिल है तथा भगवान् व्यास की ही कृति है। फलतः जो महाभारत का काल है वही हरिवंश का भी काल है। बुल्के कहते हैं “इसके संक्षिप्त रामचरित में दशरथ के यज्ञ तथा अयोनिजा सीता का ही उल्लेख नहीं है ।” उनका यह कथन निस्सार है। कारण संक्षेप में कुछ घटनाओं का छूट जाना स्वाभाविक ही है। जब हरिवंश के दो स्थलों ( २।९३।६ तथा ३।१३२।९५ ) में रामायण का वर्णन है ही। शेष रामचरित्र वाल्मीकि- रामायण के अनुसार समझा ही जा सकता है। साथ ही हरिवंश ( २।३१।१८ ) में ‘सरस्वती च वाल्मीकेः' के अनुसार वाल्मीकि का ब्रह्मा से प्रेरित सरस्वती का सम्बन्ध भी बोधित होता है। इससे हरिवंश की दृष्टि में वाल्मीकिरामायण परम प्रामाणिक और महर्षि वाल्मीकि की कृति है, यही सिद्ध होता है। साथ ही (.१।१५।२६;

१५४।२६; २।६०।३५ तथा ३।७६।६३) में राम और रामकथा का वर्णन है। राम विष्णु के अवतार हैं, यह भी संक्षिप्त रामचरित्र में वर्णित है, यह पहले स्पष्ट किया जा चुका है। १५३वें अनु० में बुल्के ने राजेन्द्र हाजरा के अनुसार ही "मार्कण्डेयपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, भागवतपुराण तथा कूर्मपुराण को प्राचीनतम महापुराण माना है। बुल्के के अनुसार मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य इन पुराणों में रामचरित का वर्णन नहीं है। अन्य अवतारों के साथ ब्रह्माण्डपुराण तथा मत्स्यपुराण में राम का नाम लिया गया है (दे० मत्स्य अ० ४७, ब्रह्माण्ड ३।७३) । ब्रह्माण्डपुराण के मैथिलवंश के वर्णन में सीता के अलौकिक जन्म का उल्लेख किया गया है (दे० ३।६४।१५) । इसका भी समय चौथी श० ई० है। किन्तु पहले कहा जा चुका है कि पुराणों का वर्णन वेदों में भी मिलता है अतः पुराण अनादि हैं तो भी वेदव्यास के द्वारा उनका आविर्भाव होता है। अतः अन्य पुराणों के समान ही इसका भी समय व्यास का समय है जो कि ई० पू० ३५ सौ वर्ष ठहरता है। सर्वज्ञकल्प महर्षि वर्णित किसी अर्वाचीन व्यक्ति का वर्णन अनागत का ही वर्णन समझना चाहिए। उसके आधार पर किसी भी पुराण को अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता । मार्कण्डेय महर्षि ने वनपर्व में युधिष्ठिर को विस्तृत रामचरित्र सुनाया था। अध्यात्मरामायण ब्रह्माण्डपुराण का ही खिल है। मत्स्यपुराण में अन्य वस्तु न होने पर भी राम का अवतार तो माना ही गया है। एक ही व्यास सब पुराणों के निर्माता हैं। ऐसी स्थिति में किसी में किसी वस्तु का संक्षेप तो किसी में किसी का विस्तार प्रसङ्गानुसार युक्त ही है। विष्णुपुराण का भी समय चौथी शती ई० उचित नहीं है। इसमें अयोनिजा सीता का उल्लेख है (४, अध्याय ५) । ताटका का वध, अयोनिजा सीता का वर्णन, राम आदि चारों भाइयो के पुत्रों का उल्लेख (४, अध्याय ४) तथा १।१२।४ में लवणासुर-वध का वर्णन है। इसी से वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। वायुपुराण का काल हाजरा के अनुसार ही बुल्के ने ५वीं ई० शती माना है। इन पाश्चात्यों तथा उनके शिष्य भारतीय विद्वानों की दृष्टि में सारा विकास ईसा के बाद ही हुआ। इसी संकीर्णता के कारण वे रामायण तथा महाभारत के काल के विषय में ही नहीं वेदों के काल के विषय में भी ई० पू० दो या तीन हजार वर्ष से आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं। वस्तुतः वायुपुराण का भी समय व्यास का ही समय है। इसमें (अध्याय ८०।१९१- २००) में रामचरित्र का और (८९।२२) में अयोनिजा सीता का वर्णन है। भागवतपुराण का काल ६ठी अथवा ७वीं ई० शती कहना भी निराधार है। श्रीभागवत के अनुसार महाभारत, ब्रह्मसूत्र तथा १७ पुराणों के निर्माण के पश्चात् भी जब वेदव्यासजी का मन प्रसन्न नहीं हुआ तथा उन्होंने अपने आपको अकृतकृत्यसा असन्तुष्ट पाया तब देवर्षि नारद से प्रश्न किया कि मैंने यह सब किया, फिर भी मेरा मन प्रसन्न नहीं है। इसपर नारदजी संक्षिप्त भागवत का उपदेश करके विस्तृतरूप से भगवच्चरित्र-वर्णन का उपदेश करते हैं। साथ ही वे यह भी परामर्श देते हैं कि तुम समाधि द्वारा भगवान् के चरित्रों का अनुस्मरण करो— "समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ।” (भा० पु० १।५।१३) तदनन्तर भगवान् व्यास समाधि द्वारा भगवान् के स्वरूप, गुण एवं लीलाओं का अनुभव कर श्रीमद्भागवत का निर्माण करते हैं एवं अपने पुत्र शुकदेवजी को उसका अध्ययन कराते हैं। देवसहाय त्रिवेदी के अनुसार आद्य- शङ्कराचार्य का समय ई० पू० ७०० वर्ष है। स्वामी दयानन्द ने अपने सत्यार्थप्रकाश में अपने समय से २२ सौ वर्ष पूर्व शङ्कराचार्य का आविर्भाव माना है। शङ्कराचार्य ने अपने गोविन्दाष्टक में कृष्ण की मृत्तिकाभक्षणलीला का उल्लेख किया है। वह एकमात्र श्रीमद्भागवत में ही उपलब्ध है, अन्यत्र नहीं । शङ्कराचार्य के परम गुरु गौडपादाचार्य ने अपने उत्तरगीता के भाष्य में भगवान् के 'पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा' (भा० पु० १।३।४) श्लोक का उद्धरण किया है। अतः भागवत को छठी या सातवीं शती का मानना सर्वथा अशुद्ध एवं निरर्गल है।

श्रीमद्भागवत वैष्णवों का परम धन है और सभी सम्प्रदायों का मान्य एवं परम प्रामाणिक ग्रन्थ है । श्रीवल्लभाचार्य ने उसे व्यास की समाधि-भाषा कहकर वेदों से भी उसका अधिक महत्त्व माना है । इसपर अनेक प्रामाणिक टीकाएँ हैं तथा भारतवर्ष में प्रतिवर्ष श्रीभागवत के हजारों सप्ताह पाठ होते हैं । मृत पितरों तथा मृत प्रिय व्यक्ति की सद्गति एवं कल्याणार्थ इसका सप्ताह कराया जाता है । श्रीभागवत में श्रीराम को परब्रह्म तथा सीता को लक्ष्मी के रूप में प्रतिपादित किया गया है । उसमें सीता-स्वयंवर, धनुष-भङ्ग तथा शूर्पणखा को विरूप करने तथा सीता के त्याग या वनवास का वर्णन है । इससे भी बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है । श्रीभागवत के अनुसार राजा परीक्षित् को शुकदेवजी ने श्रीभागवत सुनाया है । अतः परीक्षित् के ही पहले भागवत का निर्माण मानना अनिवार्य है । श्रीभागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) में कहा गया है कि कृष्ण के परमधाम जाने के तीस वर्ष पश्चात् भाद्रपदशुक्ल नवमी से श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् को भागवत-सप्ताह-कथा सुनायी थी । उसके पश्चात् दो सौ वर्ष बाद शुचि (आषाढ़) मास में आषाढ़शुक्ल नवमी से ही गोकर्ण ने धुन्धुकारी को भागवत-कथा सुनायी थी— “आकृष्णनिर्गमाद् त्रिंशद्वर्षाधिकगते कलौ । नवमीतो नभस्ये च कथारम्भं शुकोऽकरोत् ॥ परीक्षिच्छ्रवणान्ते च कलौ वर्षशतद्वये । शुद्धे शुचौ नवम्यां च धेनुजोऽकथयत् कथाम् ॥” (भाग० मा० ६।५५-५६) कूर्मपुराण का समय भी व्यास का ही समय है, ७वीं ई० शती नहीं । उसके पूर्वविभाग १९वें अध्याय में राक्षस-वंश-वर्णन तथा सूर्यवंश-वर्णन के प्रसङ्ग में रामचरित्र वर्णित है । उसमें युद्ध के पश्चात् राम द्वारा शिवलिङ्ग की स्थापना का उल्लेख है । उत्तरविभाग २१वें अध्याय तथा ३४वें अध्याय में सीताहरण का वृत्तान्त है । भारतीय दृष्टिकोण से सभी पुराण व्यासकृत हैं । अतएव जैसे वेदों के विभिन्न शाखावाले ब्राह्मणों तथा उपनिषदों का समन्वय करके ही कर्म, उपासना एवं ब्रह्मज्ञान का रूप निर्धारित किया जाता है । इसी के लिए पूर्वोत्तरमीमांसारूप वाक्य- शास्त्र अपेक्षित है । उसी तरह पूर्वोत्तरमीमांसा के अनुसार ही वेदों के आर्ष भाष्यरूप पुराणों का भी समन्वय करके ही राम, कृष्ण आदि अवतारों के चरित्रों तथा व्रतों, उपवासों और पर्वों का निर्धारण किया जाता है । हेमाद्रि, पराशरमाधव, वीरमित्रोदय, धर्मसिन्धु आदि निबन्धग्रन्थ एवं मिताक्षरा, दायभाग सब इसी मार्ग पर चलते हैं । पाश्चात्यपद्धति से पुराण, रामायण, महाभारत, ब्राह्मण, उपनिषद् एवं वेद कोई भी न तो प्रामाणिक सिद्ध होते हैं और न उनका समन्वय ही होता है । उनकी दृष्टि से ये सब के सब कल्पनाप्रसूत हैं; विकास हैं एवं विभिन्न लेखकों के दिमाग की उपज हैं । उनका परस्पर विरोध है । अतएव सुन्द-उपसुन्द न्याय से सब अप्रमाण ही हैं । पर क्या ऐसा मानना उचित है ? १५७वें अनु० में बुल्के ने शेष महापुराणों को गौण महापुराण बताया है । राजेन्द्र हाजरा के अनुसार इन महापुराणों में कई बार रूपान्तर हुआ है । उनके अनुसार वराहपुराण का रचनाकाल ८वीं शती ई० है । परन्तु उनकी यह कल्पना भी पाश्चात्य संस्कारों का ही दुष्परिणाम है । भारतीय हेमाद्रि आदि निबन्ध-ग्रन्थों में इन पुराणों का उल्लेख है और प्रमाणरूप में इनके वचनों का उल्लेख किया जाता है । वैशम्पायन उवाच— “आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्या चिन्ततो हरिः । गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय ॥ कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव । हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथातिनाशन ॥

२७० रामायणमीमांसा अष्टम कृष्ण कृष्ण महाविष्णो विश्वात्मन् विश्वभावन । प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम् ।।' (म० भा० २।६८।४१-४३) अर्थात् जब दुःशासन द्रौपदी का वस्त्र आकर्षण करने लगा तो द्रौपदी ने भगवान् का चिन्तन ( स्मरण ) किया—हे द्वारकावासिन्, कृष्ण, गोपीजनप्रिय ! मैं कौरवों से अभिभूत ( पीड़ित-अपमानित ) हो रही हूँ क्या आप नहीं जान रहे हैं। हे नाथ, हे रमानाथ, हे व्रजनाथ, हे आर्तिहन्, मैं कौरवरूपी समुद्र में डूब रही हूँ; मेरा उद्धार करो । हे विश्वभावन, हे गोविन्द मैं आपकी शरण में हूँ। कुरुओं के मध्य अवसन्न होती हुई मेरी रक्षा करो। इस तरह महाभारत की द्रौपदी ने कृष्ण को गोपीजनप्रिय और व्रजनाथ पदों से सम्बोधित किया था। कृष्ण का गोपीजनप्रियत्व आदि श्रीभागवत से ही विदित होता है। भागवतपुराण के कर्ता ही महाभारत कर्ता थे। तभी उनको कृष्ण का व्रजसम्बन्ध ज्ञात था । महापुराणों, पुराणों तथा उपपुराणों के कर्ता के रूप से व्यासजी प्रसिद्ध हैं। उसी रूप में विविध निबन्धों और काव्यों में उनका प्रामाण्य मानकर उनका उद्धरण किया जाता है। परन्तु पाश्चात्य विद्वान् उन सबको झूठा बनाकर कहते हैं कि इनके व्यास कर्ता नहीं हैं, किन्तु कोई अन्य लोग ही कर्ता हैं। वे कर्ता कौन हैं और इसमें क्या प्रमाण है ? इस प्रश्न का उत्तर उनके पास कुछ नहीं है तो भी वे हठधर्मिता पर अड़े रहते हैं। जिन ग्रन्थों में जिनको कर्ता माना गया है। उनको कर्ता न मानकर प्रमाण के बिना ही किन्ही अन्य विभिन्न लोगों को कर्ता मान लेना कितना साहस है ? क्या पाश्चात्य जगत् में या भारत में ही कोई ऐसा किसी को ज्ञात है जो ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का निर्माण करे और अपने नाम तक का उल्लेख न करे। छल-कपट भी तो निःस्वार्थ नहीं होता। आखिर कोई क्यों ऐसे ऐसे ग्रन्थरत्नों का निर्माण करके अपना नाम छिपायेगा ? साथ ही पाश्चात्य लोग इन ग्रन्थों में वर्णित विषयों को वास्तविक एवं प्रामाणिक न मानकर काल्पनिक एवं अप्रामाणिक भी मानते हैं। यहाँ भी यह प्रश्न उठता है कि विद्वान् तत्त्वज्ञ ऐसे मिथ्या विषय पर पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थ लिखकर प्रचार क्यों करना चाहेगा ? प्रयोजन के बिना संसार में किसी की किञ्चिन्मात्र भी प्रवृत्ति नहीं होती तब फिर सैकड़ों सहस्रों विद्वानों की निरर्थक काल्पनिक मिथ्याग्रन्थों के निर्माण और प्रचार में प्रवृत्ति क्यों हुई ? और इसमें क्या प्रमाण है ? सर्वथापि जिन ग्रन्थों का जो कर्ता उस ग्रन्थ से या प्रामाणिक अन्य ग्रन्थों से सिद्ध होता है उसी को उसका कर्ता मानना चाहिए । उसके कर्ता का काल ही उस ग्रन्थ का काल मानना युक्त है। अतः वराहपुराण का भी वही काल है जो उसके कर्ता व्यास का काल है। ग्रन्थों के विषय की अर्वाचीनता देखकर ही पाश्चात्य लोग ग्रन्थों का काल-निर्धारण करते हैं। पर यह पद्धति वेदों और आर्षग्रन्थों के लिए उपयुक्त नहीं कही जा सकती, क्योंकि आर्षग्रन्थों के रचयिता योगज सामर्थ्य से अतीत और अनागत विषयों को जानकर ही उनका उल्लेख करते हैं। मिथ्या कल्पना कर उसपर काव्य लिखना तर्कशून्य है। अस्तु, वराहपुराण के अनुसार दशरथ ने रामद्वादशी का व्रत किया उसके फलस्वरूप राम, भरत आदि की प्राप्ति हुई (अ० ४५) । इस पुराण के १६३वें अध्याय का रचनाकाल ८वीं ई० शती से १० वीं शती ई० है, यह कहना भी असङ्गत ही है। कर्ता को भविष्यज्ञानशून्य मानने से ही उस अध्याय को अर्वाचीन कहने का प्रयत्न किया गया है। इसी तरह अग्निपुराण को भी ८वीं शती ई० के पश्चात् का मानना भी निराधार है। अग्निपुराण में वाल्मीकिरामायण के सातों काण्डों का संक्षिप्त रूप है, यह ठीक है—इससे बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। मन्थरा को अपने ऊपर राम के अत्याचार का भ्रम हो सकता था। अग्निपुराण (अध्याय ५।११) में उसी का उल्लेख होगा। माल्यवान् पर्वत पर राम के चातुर्मास्य यज्ञ करने का उल्लेख है। लिङ्गपुराण को दसवीं शती ई० का मानना भी पूर्ववत् भ्रान्ति ही है। इसमें भी अत्यन्त संक्षिप्त राम- चरित्र का वर्णन है (दे० लि० पु० पूर्वार्ध ९६।३५, ३६)। अम्बरीषोपाख्यान में राम तथा उनके भाइयों के अवतारत्व का उल्लेख है। वस्तुतः उन ग्रन्थों को अर्वाचीन कहने का आधार यह है कि उनमें भरत और शत्रुघ्न को शङ्ख एवं

चक्र का अवतार माना गया है और उनके अवतारत्व का विकास अर्वाचीन है। पर यह तर्क अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त है। कारण, उनके अवतारत्व को अर्वाचीन तभी कहा जा सकता है जब उनके बोधक ग्रन्थ अर्वाचीन हों और ग्रन्थ अर्वाचीन तभी सिद्ध होंगे जब उक्त अवतारत्व की अर्वाचीनता सिद्ध हो। वस्तुतः प्राचीन उपनिषद् रामरहस्य में भरत, शत्रुघ्न आदि को अवतार माना गया है। अतः उनका अवतारत्व विकास नहीं है। वामनपुराण भी अर्वाचीन नहीं है। अतएव वेदवती का सीता में सायुज्य प्राप्त करके सीतारूप में प्रादुर्भाव युक्त ही है। १५८वें अनु० में बुल्के कहते हैं, ‘नारदपुराण अप्राप्य है। प्रचलित नारदीयपुराण दसवीं शती ई० का है। इसमें पीछे से बहुत से प्रक्षेप जोड़े गये हैं।‘’ यह भी अनर्गल कल्पना है। कल्पना के आधार पर किसी प्रामाणिक ग्रन्थ के कुछ अंशों को अप्रामाणिक कहना अक्षम्य अपराध है। इसके पूर्वखण्ड में संक्षिप्त रामचरित बालकाण्ड तक वर्णित है। इससे भी बालकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। ७९ वें अध्याय में द्रविड़ देश के ब्राह्मणों द्वारा बाँधे गये विभीषण की राम द्वारा मुक्ति का वर्णन है तथा उत्तरखण्ड में बालकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक समस्त वाल्मीकिरामायण की कथा वर्णित है। जिसमें राम, लक्ष्मण आदि नारायण, संकर्षण आदि के अवतार बताये गये हैं। ७५वें अध्याय को वस्तुतः वाल्मीकिरामायण का संक्षिप्तीकरण मानने की अपेक्षा महर्षि की स्वतन्त्र कृति मानना ही उचित है। १५९वें अनु० में बुल्के कहते हैं, ‘‘ब्रह्मपुराण की अधिकांश सामग्री अन्य पुराणों से ली गयी है। २१३वें अध्याय का रामचरित्र ज्यों का त्यों हरिवंश के ४१वें अध्याय से उद्धृत है।‘’ बुल्के के उक्त कथन से यही सिद्ध होता है कि दोनों के रचयिता एक ही हैं। अतएव हरिवंश का रामचरित्र ब्रह्मपुराण में उद्धृत किया ही जा सकता है। अस्मदादि के लेखों तथा ग्रन्थों में भी ऐसा होता है। कभी-कभी एक ग्रन्थ की कोई बात ज्यों की त्यों अन्य ग्रन्थ में उद्धृत कर दी जाती है। १७६वें अध्याय में रावण चरित्र के अन्तर्गत रावण की तपस्या के बाद एक संक्षिप्त रामकथा है। उसमें रावण द्वारा अमरावती से चुरायी हुई वासुदेवप्रतिमा का वृत्तान्त है। रावण वध के बाद राम ने वह मूर्ति समुद्र को समर्पित कर दी थी। लेकिन बाद में कृष्ण ने उसे पुरुषोत्तमक्षेत्र में स्थापित किया था। ‘‘ब्रह्मपुराण की शेष रामकथासम्बन्धी सामग्री गौतमीमाहात्म्य अध्याय ७०-१७५ के अन्तर्गत मिलती है। यह माहात्म्य प्रारम्भ में एक स्वतन्त्र ग्रन्थ था जिसकी रचना १०वीं शती में अथवा उसके बाद हुई होगी। इसमें भिन्न-भिन्न तीर्थों के माहात्म्य दिखलाने के लिए बहुत सी कथाओं का संकलन किया गया है। रामतीर्थमाहात्म्य में रामकथा का वर्णन मिलता है। इसकी निम्नोक्त विशेषताएँ हैं— कैकेयी द्वारा देव-दानव-युद्ध में तीन वरों की प्राप्ति, श्रवणकुमार-वध के प्रायश्चित्त रूप में दशरथ का अश्वमेध यज्ञ करना तथा उसमें आकाशवाणी द्वारा उन्हें पुत्रोत्पत्ति का आश्वासन दिया जाना। वनवास-काल में गोमती-तट पर राम के पिण्डदान द्वारा नरक से दशरथ की मुक्ति (अध्याय १२३) एवं सहस्रकुण्ड-माहात्म्य (अध्याय १५४) में सीता-त्याग का उल्लेख है। इसके बाद वियोगी राम का गौतमी-तट के सहस्र-कुण्ड पर तपस्या करने का वर्णन है। किष्किन्धा-तीर्थमाहात्म्य १५७वें अध्याय में रावण-वध के बाद अयोध्या की यात्रा करते हुए गौमती-तट पर राम के ५ दिन निवास तथा शिवलिङ्ग-पूजा का उल्लेख किया गया है।‘’ बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि ब्रह्मपुराण की अधिकांश सामग्री अन्य पुराणों से ली गयी है। किन्तु इतना ही कहा जा सकता है कि इन इन अंशों में अन्य पुराणों से उसकी समानता है। ऋग्वेद की विभिन्न शाखाओं में बहुत मन्त्रों की समानता प्रतीत होती है तो भी यह नहीं माना जाता है कि एक शाखा ने दूसरी शाखा से उन मन्त्रों का उद्धरण किया है। विभिन्न वेदों की विभिन्न शाखाओं के पुरुषसूक्तों में बहुत समानता है। फिर भी वे सभी

अनादि, अपौरुषेय और स्वतन्त्र माने जाते हैं । जैसे सह्याद्रिखण्ड स्कन्दपुराण का अंश होता हुआ भी स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित है। उसी तरह ब्रह्मपुराण का अंश होता हुआ गौतमीमाहात्म्य भी स्वतन्त्र ग्रन्थ समझा जाता है। वस्तुतः वह ब्रह्मपुराण का अंश ही है। सुप्रसिद्ध 'गीता' जैसा ग्रन्थ भी तो महाभारत का अंश होते हुए भी स्वतन्त्र ग्रन्थ माना जाता है । गौतमीमाहात्म्य दसवीं शती ई० का है इसका भी कोई प्रामाणिक आधार नहीं है। किसी आधुनिक व्यक्ति, तीर्थ या घटना का वर्णन होने के कारण ही पाश्चात्य विचार के लोग ग्रन्थों का काल-निर्धारण करते हैं । परन्तु यह नियम आर्षग्रन्थों पर लागू नहीं होता, क्योंकि ऋषि योगबल से भविष्यकाल की वस्तुओं को जानकर अपने ग्रन्थ में लिख सकता है। पुण्य तथा पाप अदृष्ट वस्तु है। उनका ज्ञान किसी सामान्य मनुष्य को नहीं होता। अनादि अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक धर्मशास्त्रों, महाभारत, पुराण, उपपुराण आदि आर्षग्रन्थों से ही धर्म, अधर्म अथवा पुण्य तथा पाप का ज्ञान हो सकता है। किस तीर्थ से कौन और कितना पाप नष्ट होता है एवं कितना पुण्य होता है। परलोक में किस तीर्थ के दर्शन, स्पर्शन, अभिषेक, श्राद्ध, पूजा और तपस्या से क्या फल होगा ? इसमें आर्षग्रन्थ ही प्रमाण हो सकते हैं। धर्मशास्त्र-निबन्धकार भी तीर्थों तथा व्रतों का विचार आर्ष वचनों के अनुसार ही करते हैं, अतः गौतमीमाहात्म्य को आधुनिक तथा सामान्य मनुष्यकृत मानना भारतीय दृष्टि से सर्वथा भ्रान्त धारणा है। पाश्चात्यों की अनर्गल कल्पनाओं के आधार पर विचार करने से अवतार, तीर्थ, पूजा, पाठ तथा भक्ति सब केवल कल्पनामात्र ठहरते हैं। कल्पना भी क्रम से विकसित हुई। राम, कृष्ण आदि सब मनुष्य थे। कुछ समय बाद उनके प्रभाव से प्रभावित लोग उन्हें ईश्वर समझने लगे, अवतार मानने लगे। उनको विष्णु से अभिन्न मानने लगे । विष्णु में भी महत्त्वबुद्धि बाद में हुई। पहले इन्द्र ही मुख्य एवं प्रधान देवता थे। अवतार भी प्रजापति के माने जाते थे । विष्णु का महत्त्व बढ़ने से वही अवतार विष्णु के माने जाने लगे। राधा तथा सीता में अवतारत्व कल्पना और बाद में हुई । लक्ष्मण, भरत आदि में शङ्ख, चक्र आदि के अवतारत्व की कल्पना और बाद में हुई । इसी तरह तीर्थों की भी कल्पना का विकास हुआ है। फलतः जिन ग्रन्थों में सीता को लक्ष्मी या लक्ष्मण को शेष कहा गया हो, वे सब ग्रन्थ १०वीं या ११वीं शती ई० के ठहरा दिये जाते हैं । वास्तव में ये सब कल्पनाएँ निष्प्रमाण हैं। भारतीय दृष्टिकोण से प्रत्यक्ष तथा अनुमान के समान ही वेदादि आगम भी स्वतन्त्र प्रमाण हैं। शब्द का प्रामाण्य सर्वत्र मान्य है। पार्लियामेण्ट तथा न्यायालयों में शब्द का प्रामाण्य मान्य है। विधान के शब्दों, न्यायाधीशों के निर्णयों तथा साक्षियों की गवाहियों का आदर होता है। वक्ता के दोष से ही शब्द का अप्रामाण्य होता है। यदि कोई अनादि अपौरुषेय शब्द सिद्ध होता हो तो उसमें वक्ता के भ्रम, प्रमाद आदि दोषों से दूषित होने की कल्पना नहीं होती। सुतरां निर्भ्रान्त आप्त वक्ता का वचन होने से उसका ( शब्द का ) अधिक प्रामाण्य माना जाता है। मन्त्र, ब्राह्मण तथा उपनिषद वेद हैं । वे सब अपौरुषेय हैं। सर्वज्ञ- कल्प ऋषि-महर्षियों ने वेदों का परम प्रामाण्य माना है। बड़े-बड़े दार्शनिकों, तार्किकों को पाश्चात्यों की निराधार मिथ्या कल्पनाओं के बल पर ठुकराया नहीं जा सकता । निबन्धकारों ने ऋषियों तथा मीमांसा की दृष्टि से आर्ष वचनों में प्रतीत होनेवाले विरोधों का परिहार कर समन्वय कर रखा है। पुराणों के विरोधाभासों का भी सन्तोष- जनक समाधान सुलभ है। अतः बुल्के तथा उनके अन्य साथियों की आर्ष परम्पराविरुद्ध उक्त सभी कल्पनाएँ सर्वथा उपेक्षणीय ही हैं । अन्य आर्ष ग्रन्थों में वाल्मीकिरामायण की कथाओं से विलक्षण कथाएँ होना भी असम्भव नहीं है, क्योंकि किसी एक पुस्तक में जीवन के प्रतिदिन या प्रत्येक घटना का उल्लेख होना सम्भव नहीं । अतः विभिन्न ऋषियों के कहने के लिए बहुत से विषयों का अवशेष रहना सम्भव ही है, इसलिए राम का गौतमी-तट पर पिण्डदान, सहस्रकुण्ड पर तपस्या, शिवलिङ्ग की स्थापना करना आदि सब ठीक है।

अध्याय अवतार-सामग्री २७३ १६०वें अनु० गरुड़पुराण की रचना का समय भी उसके रचयिता व्यास का ही समय मानना उचित है। इसके विपरीत उसका रचना-काल १०वीं शती ई० मानना असङ्गत है। शूर्पणखा को राम स्वयं विरूप करते हैं। कल्पभेद से यह भी सम्भव ही है। राम गया में अपने पिता का श्राद्ध करते हैं, यह तो मर्यादापुरुषोत्तम राम के स्वरूपानुरूप ही है। १६१वें अनु० में बुल्के का कथन है कि "स्कन्दपुराण की अधिकांश सामग्री की सृष्टि आठवीं शती ई० के बाद हुई है। लेकिन इसमें बहुत से प्रक्षेप हैं। जिनका रचनाकाल अज्ञात है।" किन्तु यह कहना असङ्गत है। स्कन्दपुराण को पुराणों में प्रमुख स्थान प्राप्त है। यह प्रसिद्ध व्यासकृति ई० पू० ३५ सौ वर्षों से कम अर्वाचीन नहीं है। माहेश्वरखण्ड में रावणचरित, रामावतार और राम के द्वारा रावण का वध वर्णित है। वैष्णवखण्ड के अन्तर्गत कार्तिक- माहात्म्य में अवतार के कारणों के वर्णन के प्रसङ्ग में वृन्दा-शाप तथा धर्मदत्त और कलहा की कथा है। धर्मदत्त का ही दशरथरूप में जन्म कहा गया है। वैशाखमासमाहात्म्य में वाल्मीकि की जन्म-कथा तथा अयोध्यामाहात्म्य में राम का स्वधाम-गमन वर्णित है। ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सेतुमाहात्म्य के २ अध्यायों में संक्षिप्त रामकथा वर्णित है। जिसमें सेतुबन्ध का विशेषरूप से वर्णन है। ७ वें अध्याय में समुद्रबन्धन के पूर्व शिवप्रतिष्ठा का वर्णन है। २२ वें अध्याय में सीता की अग्निपरीक्षा तथा अग्नि द्वारा सीता के सतीत्व की प्रशंसा वर्णित है। २३वें अध्याय में रावणवध से हुई ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्तरूप में राम द्वारा कोटितीर्थ पर शिवलिङ्ग की स्थापना का वर्णन है। ३०वें अध्याय में विभीषण द्वारा सेतु तोड़ने के लिए श्रीरामजी से प्रार्थना की गयी है। अध्याय ४४-४७ में रामोपाख्यान पर आधारित संक्षिप्त रामचरित, रावणवध के प्रायश्चित्तरूप में रामेश्वर-लिङ्ग की स्थापना, शिवलिङ्ग ले आने के लिए हनुमान् को कैलाश भेजा जाना तथा मुहूर्त बीत जाने की आशङ्का से राम द्वारा सैकतमय (बालू के) शिवलिङ्ग की स्थापना का वर्णन है। धर्मारण्यखण्ड अध्याय ३०, ३१ में एक संक्षिप्त कालनिर्णय रामायण का वर्णन है। अध्याय ३२-३५ में राम द्वारा धर्मारण्य की तीर्थ-यात्रा वर्णित है। काशीखण्ड, इसमें रामकथा का अभाव हैं। अवन्तीखण्ड अध्याय २१ में शिवलिङ्ग ले आने के लिए हनुमान् की लङ्का यात्रा, अध्याय २४ में वाल्मीकि-जन्मकथा, अध्याय ७९ में हनुमान् का चरित्र । इसमें हनुमान् रुद्रावतार माने गये हैं। अध्याय ७३ रेवाखण्ड में ब्रह्महत्या दोष-निवारणार्थ हनुमान् की तपस्या एवं अहल्योद्धार की कथा; राम से उद्धृत अहल्या नर्मदा-तीर पर शिव की पूजा करने जाती हैं। अध्याय १६८ में रावणादि की तपस्या तथा शिवजी द्वारा वर-प्रदान वर्णित है। नागरखण्ड अध्याय २० में लक्ष्मण का स्वामिद्रोह और तपस्या। अध्याय ९६-९८ में शनि का दशरथ को वर प्रदान। दशरथ और इन्द्र की मैत्री, कार्तिकेयपुर में पुत्र-प्राप्ति के लिए दशरथ का तपस्या करना तथा ४ पुत्रों एवं एक पुत्री का जन्म। अध्याय ९९-१०२ में राम का स्वर्गारोहण, विभीषण को राम द्वारा धर्मोपदेश तथा राम द्वारा सेतुभङ्ग एवं अनेक तीर्थों में राम द्वारा शिवप्रतिष्ठा। अध्याय १२४ में वाल्मीकि-कथा एवं अध्याय २०८ में अहल्योद्धार । अहल्या की तीर्थयात्रा तथा शिव-पूजा । प्रभासखण्ड अध्याय १११-११३ में रामेश्वरतीर्थ में राम और लक्ष्मण द्वारा शिव-प्रतिष्ठा, अध्याय १२३ में रावण द्वारा रावणेश्वर-तीर्थ में शिव-प्रतिष्ठा, अध्याय १७१ में दशरथेश्वर में दशरथ द्वारा पुत्रार्थ शिव-प्रतिष्ठा तथा अध्याय २७८ में वाल्मीकि-कथा। इन उद्धरणों से विदित होता है कि स्कन्दपुराण द्वारा भगवान् व्यास ने विभिन्न प्रसङ्गों में राम के मर्यादापुरुषोत्तमरूप को व्यक्त किया है। श्रीमद्भागवत में व्यास ने कहा है कि भगवान् राम का मर्त्यावतार मत्यों के शिक्षणार्थ ही है। केवल रावणादि राक्षसों के वधार्थ नहीं— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम् ।” (भा० पु० ५।१९।५) ३५

२७४ रामायणमीमांसा अष्टम १६२ वें अनु० में बुल्के के अनुसार "पद्मपुराण के विभिन्न खण्डों का रचनाकाल अलग-अलग है। पाताल- खण्ड जिसमें बहुत सी रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है, १२वीं शती का माना जाता है। उत्तरखण्ड अपना वर्तमान रूप १५०० ई० के लगभग प्राप्त कर सका। इसमें भी रामचरित का पूरा वर्णन है। पातालखण्ड का एक गौड़ीय पाठ सुरक्षित है, जिसमें प्रारम्भ के २८ अध्यायों में कालिदासकृत रघुवंश से मिलती जुलती कथाएँ मिली हैं। आनन्द- श्रम-संस्करण के पातालखण्ड में रामाश्वमेध का विस्तृत वर्णन है।" उनके इस कथन का आधार भी डा० हाजरा की 'इण्डियन कल्चर' पुस्तक है जो कि अटकलमात्र तथा सब पुराणों से विरुद्ध है। अनेक प्रामाणिक पुराणों में १८ पुराण तथा १४ उपपुराणों का उल्लेख है। उनमें स्कन्द- पुराण, पद्मपुराण आदि पुराण वर्णित हैं। केवल अटकलबाजियों से आर्ष पुराणों की उक्तियों को झुठलाया नहीं जा सकता है। जहाँ जहाँ राम की ब्रह्मरूपता, परमेश्वरता तथा राम की भक्ति का वर्णन है उन उन ग्रन्थों या खण्डों को आधुनिक कहना कोई तर्क-युक्तिसंगत नहीं है। वेदों, उपनिषदों, रामायण, भारत आदि सभी प्रामाणिक ग्रन्थों में अवतारसत्ता, राम की ब्रह्मरूपता और उनकी भक्ति प्रसिद्ध है। अन्यान्य आर्ष ग्रन्थों के विरुद्ध होने के कारण इन ग्रन्थों के काल-निर्णय की उक्त पद्धति ही गलत है। पातालखण्ड में राम-चरित्र की मुख्य घटनाओं की तिथियों के उल्लेख को बुल्के स्कन्दपुराण की नकल मानते हैं। परन्तु उनका यह कथन ठीक नहीं है। जैसे वैदिक संहिताओं में समान पाठ होने पर भी एक संहिता का दूसरी संहिता में अनुकरण नहीं माना जाता वैसे ही पुराणों में भी तुल्य वर्णन होने पर भी, वेदों के समान ही, एक में दूसरे का अनुकरण नहीं माना जा सकता। ४४वें अध्याय में हनुमान्जी की वीरता का वर्णन, ४४-४६ अध्यायों में राम तथा शिव का अभेद प्रतिपादन, ५५, ५६वें अध्यायों में धोबी के कथन के फलस्वरूप सीता का परित्याग, ५९-६६ अध्यायों में कुश और लव की उत्पत्ति तथा उनका राम की सेना से युद्ध करना, ६७, ६८वें अध्यायों में राम और सीता का पुनर्मिलन। पातालखण्ड के १०० वें अध्याय में बाँधे हुए विभीषण की राम द्वारा मुक्ति तथा १, २ वें अध्याय में पुराकल्पीय रामायण का वर्णन। उनमें दशरथ की कौशल्या, सुमित्रा, सुरूपा तथा सुवेषा चार पत्नियों का उल्लेख है। बाल-लीलाएँ, सीता-स्वयंवर में इन्द्र, रावण आदि के असफल होने पर राम द्वारा धनुर्भङ्ग की कथा तथा शिव के दिये हुए अजगव धनुष पर वानरसेना द्वारा समुद्र पार करने की कथा है एवं कुम्भकर्ण-वध रावण-वध के बाद माना गया है। ११३ वें अध्याय में राम शिव से शिवभक्ति का वरदान माँगते हैं— "भक्तिरस्तु स्थिरा त्वयि।" यह सब मर्यादापुरुषोत्तम राम के स्वाभाविक रूप का ही वर्णन है। शिवमहिम्न आदि अनेक प्रामाणिक ग्रन्थों में यह वर्णन मिलता ही है कि विष्णु भगवान् प्रतिदिन सहस्र कमल अर्पित कर शिव की पूजा करते थे। किसी दिन एक कमल कम होने पर उन्होंने अपना नेत्र ही कमल मानकर शिवजी को चढ़ा दिया। सृष्टिखण्ड में शम्बूक-वध तथा राम और अगस्त्य का संवाद है। बुल्के कहते हैं इसमें वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड के सर्ग ७९ से ८३ तक के ५ सर्गों की सामग्री उद्धृत है, उनका यह कथन असङ्गत है। यद्यपि वाल्मीकि- रामायण व्यास से भी अतिप्राचीन है, अतः उसके उक्त अंश का उद्धरण करना असंभव नहीं है तथापि बुल्के तो उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप ही मानते हैं। व्यास भगवान् ने जैसे स्वयं भी आर्ष विज्ञान से रामाश्वमेध आदि का निर्माण किया है वैसे ही वे अगस्त्य-संवाद का भी निर्माण कर ही सकते हैं। सृष्टिखण्ड के ३९ वें अध्याय में राम का विभीषण को उपदेश और मथुरा में वामन की प्रतिष्ठा करना प्रतिपादित है। उत्तरखण्ड में वृन्दा का शाप, रामरक्षास्तोत्र, शम्बूक-वध तथा संक्षिप्त रामसम्बन्धी वृत्तान्त वर्णित हैं।