रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
२६६ रामायणमीमांसा अष्टम जिनका उल्लेख अन्य रामायणों में या अन्य ऋषियों की कृतियों में हो सकता है । जिनको आर्षविज्ञान नहीं सम्भव है ऐसे कविगण तो रामायण, महाभारत, पुराण, उपपुराण, तन्त्र, आगम आदि प्रामाणिक आर्ष ग्रन्थों के आधार पर ही काव्य-निर्माण करते हैं ! क्योंकि सिद्धान्त ग्रन्थों का ही उन्हें वैसा ही निर्देश है और वैसी ही परम्परा है । आर्ष विज्ञान के आधार पर प्रथम काव्य होने से ही वाल्मीकिरामायण आदि काव्य कहा जाता है। विक्रम २००० पूर्व महाकवि कालिदास ने भी वाल्मीकिरामायण को आदि काव्य कहा है। पुराणों के अनुसार वेदवेद्य परमात्मा जब दशरथात्मज राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी महर्षि प्राचेतस से रामायण के रूप में अवतरित हुए— 'वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ।।' (लवकुशप्रोक्त मङ्गलाचरण १३) 'अनन्ता वै वेदाः' ( तै० ब्रा० ३।१०।११।४ ) के अनुसार वेद अनन्त हैं, ईश्वर का ज्ञान अनन्त है । कोई भी ज्ञान बिना शब्दानुवेध के नहीं होता है । सुतरां ईश्वर का अनन्त ज्ञान जिन शब्दों से अनुविद्ध था वे ही वैदिक शब्द हैं । अनन्त वेद का अवतार शतकोटि रामायण के ही रूप में हो सकता है । वर्तमान वाल्मीकिरामायण गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों के आधार पर है । अतः जो वेद या आर्ष ज्ञान राम की लीलाओं के आधार थे वे ही कृष्ण लीलाओं के आधार थे । इसलिए कई अंशों में तुल्यता परिलक्षित होती है । अतः तुल्यता देखकर किसी को किसी का अनुकरण कहना ठीक नहीं । अतएव बुद्ध और ईसा की बहुत अंशों में तुल्यता होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि ईसा के चरित्रलेखक ने बुद्ध के चरित्र का अनुकरण किया है । श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान् का अवतार केवल धर्म-ग्लानि (अधर्म) की निवृत्ति तथा धर्मसंस्थापना एवं दुष्टदर्पदलन तथा साधुपरित्राण के लिए ही नहीं, किन्तु मुख्यतया अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रों को भक्तियोग-विधान के लिए ही होता है— “तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥” (भा० पु० १।८।२०) श्रीमद्भागवत में यह भी उल्लेख है कि भक्त की मनोवाञ्छा के अनुसार ही भगवान् अपना रूप बनाते हैं— “यद्यद् धिया त उरुगाय विभावयन्ति । तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥” (भा० पु० ३।९।११) वेद में भी उल्लेख है कि 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' ( ऋ० सं० १।१६४।४६ ) एक ही तत्त्व मित्र, वरुण, अग्नि आदि अनेक रूपों से प्रकट होता है, 'तं यथा यथोपासत' ( श० ब्रा० १०।५।२।२० ) । उस परमेश्वर की जिस प्रकार उपासना की जाती है परमेश्वर उन-उन रूपों में ही उपलब्ध होता है । गीता में भगवान् को गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण तथा सुहृद् रूप से उपास्य कहा गया है— “गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृद् ।” (गी० ९।१८) अर्जुन ने भी कहा है कि हे देव, जैसे सखा सखा के अपराधों को एवं प्रिय प्रिया के अपराधों को क्षमा करता है वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये । इन्हीं शास्त्रीय आधारों पर अनादिकाल से ही परमेश्वर के प्रति मधुरभाव की उपासना होती है । ऋग्वेद के अपालासूक्त में अपाला ने इन्द्र की कान्तभाव से उपासना की थी । इन्हीं मूल आधारों पर ही अगस्त्यसंहिता आदि आर्ष ग्रन्थों में वस्तुस्थिति के अनुसार ही श्रीराम की मधुर उपामनाओं का वर्णन हुआ है । भागवत आदि ग्रन्थों में भी उसी के आधार पर मधुर भक्ति का वर्णन है । शिवजी के प्रति भी
ऐसे भावों का वर्णन जगद्धर भट्ट की स्तुतिकुसुमाञ्जलि में हुआ है। निर्गुणवादी कबीर आदि ने अपने इष्ट ब्रह्म को पिया (प्रिय) के रूप में माना है। अतः इन्हीं आधारों पर मधुराचार्य आदि ने अपने ग्रन्थों में मधुर भक्ति का उल्लेख किया है। राम ने रावणवध आदि कार्य नहीं किये। यह तो पारमार्थिक सिद्धान्त का ही उल्लेख है, कोई अजीब नहीं। वेदान्त-मत में आत्मा कर्तृत्व तथा भोक्तृत्व से रहित अकर्ता और अभोक्ता ही है— “अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।” (गी० ३।२७) “न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।” (गी० ५।१४) परमेश्वर वस्तुतः अकर्ता ही है। अनन्त ब्रह्माण्डों का उत्पादकत्व, पालकत्व आदि अनन्तानन्त ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के सम्बन्ध से ही परमेश्वर में होता है। अध्यात्मरामायण में सीता ने हनुमान् को बतलाया है कि शिवधनुषभंग, रावण-वध आदि सब काम मैंने (मूलप्रकृति ने) किये हैं। राम में तो अज्ञानवश ही कर्तृत्व का आरोप है। वेदान्त की दृष्टि से सोपाधिक ब्रह्म संसार की उत्पत्ति, पालन आदि का काम करता है। निरुपाधिक ब्रह्म सदा ही स्वरूपानन्द में ही प्रतिष्ठित रहता है। रामायण के राम; भागवत के कृष्ण तथा विष्णुपुराण के विष्णु वस्तुतः एक ही वस्तु है। तीनों सगुण एवं साकार रूप पृथक् पृथक् हैं। सगुण निराकार रूप तथा निर्गुण रूप तीनों का एक ही है। शिवपुराण के शिव तथा शाक्तागमों की भगवती भी पूर्वोक्त तीन प्रकार की हैं। नृसिंहतापनीय, रामतापनीय आदि उपनिषदों में प्रणव की अ, उ, म् और अर्धमात्रा मानकर अर्धमात्रा का ही रामरूप में अवतार माना गया है। उस दृष्टि से जब तुरीय शुद्ध ब्रह्मरूप राम हैं तब तो उनमें कारणता भी नहीं है। उसी से रावणवध आदि कार्य राम ने नहीं किये, किन्तु मायाविशिष्ट कारणब्रह्मरूप लक्ष्मी नारायण आदि में ही कारणता का वर्णन है। उसी दृष्टि से यह कहना असङ्गत नहीं है कि राम सदा अपनी स्वरूपभूता आह्लादिनी शक्ति सीता में क्रीड़ा करते रहते हैं। ईश्वरी शक्ति जगदुत्पत्ति आदि तथा राक्षस-वध आदि कार्य करती है। हितहरिवंश आदि ने भी कहा है कि कार्य-कारणतीत नित्य निकुञ्जाधिपति कृष्ण सृष्टि आदि प्रपञ्च से दूर रहकर निरन्तर राधा को ही जानते हैं और कुछ जानते ही नहीं। “श्रीराधामेव जानन् व्रजपतिरनिशं कुञ्जवीथीमुपास्ते ।” (राधासुधानिधि) जिन वेदादि शास्त्रों के आधार पर सिद्धसिद्धान्तों के अनुसार रामभक्तों ने कार्यकारणातीत राम का प्रतिपादन किया है उन्हीं के अनुसार कृष्णभक्तों ने कृष्ण का निरूपण किया है, अतः दोनों में समता प्रतीत होती है। एतावता किसी को किसी का अनुकरण नहीं कहा जा सकता। राम का बहु विवाह भी कल्पभेद से सङ्गत है। १५१वें अनु० में “हरिवंश का रचनाकाल ४०० ई० के लगभग बताया गया है।” इसमें आर० सी० हाजरा इण्डियन कल्चर भाग २ पृ० २३७ तथा न्यू इण्डियन ऐण्टिक्वेरी भाग १ पृ० ५३२ का प्रमाणरूप से निर्देश किया गया है। जो सर्वथा अशुद्ध है। वस्तुतः हरिवंश के अनुसार वह महाभारत का खिल है तथा भगवान् व्यास की ही कृति है। फलतः जो महाभारत का काल है वही हरिवंश का भी काल है। बुल्के कहते हैं “इसके संक्षिप्त रामचरित में दशरथ के यज्ञ तथा अयोनिजा सीता का ही उल्लेख नहीं है ।” उनका यह कथन निस्सार है। कारण संक्षेप में कुछ घटनाओं का छूट जाना स्वाभाविक ही है। जब हरिवंश के दो स्थलों ( २।९३।६ तथा ३।१३२।९५ ) में रामायण का वर्णन है ही। शेष रामचरित्र वाल्मीकि- रामायण के अनुसार समझा ही जा सकता है। साथ ही हरिवंश ( २।३१।१८ ) में ‘सरस्वती च वाल्मीकेः' के अनुसार वाल्मीकि का ब्रह्मा से प्रेरित सरस्वती का सम्बन्ध भी बोधित होता है। इससे हरिवंश की दृष्टि में वाल्मीकिरामायण परम प्रामाणिक और महर्षि वाल्मीकि की कृति है, यही सिद्ध होता है। साथ ही (.१।१५।२६;
१५४।२६; २।६०।३५ तथा ३।७६।६३) में राम और रामकथा का वर्णन है। राम विष्णु के अवतार हैं, यह भी संक्षिप्त रामचरित्र में वर्णित है, यह पहले स्पष्ट किया जा चुका है। १५३वें अनु० में बुल्के ने राजेन्द्र हाजरा के अनुसार ही "मार्कण्डेयपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, भागवतपुराण तथा कूर्मपुराण को प्राचीनतम महापुराण माना है। बुल्के के अनुसार मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य इन पुराणों में रामचरित का वर्णन नहीं है। अन्य अवतारों के साथ ब्रह्माण्डपुराण तथा मत्स्यपुराण में राम का नाम लिया गया है (दे० मत्स्य अ० ४७, ब्रह्माण्ड ३।७३) । ब्रह्माण्डपुराण के मैथिलवंश के वर्णन में सीता के अलौकिक जन्म का उल्लेख किया गया है (दे० ३।६४।१५) । इसका भी समय चौथी श० ई० है। किन्तु पहले कहा जा चुका है कि पुराणों का वर्णन वेदों में भी मिलता है अतः पुराण अनादि हैं तो भी वेदव्यास के द्वारा उनका आविर्भाव होता है। अतः अन्य पुराणों के समान ही इसका भी समय व्यास का समय है जो कि ई० पू० ३५ सौ वर्ष ठहरता है। सर्वज्ञकल्प महर्षि वर्णित किसी अर्वाचीन व्यक्ति का वर्णन अनागत का ही वर्णन समझना चाहिए। उसके आधार पर किसी भी पुराण को अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता । मार्कण्डेय महर्षि ने वनपर्व में युधिष्ठिर को विस्तृत रामचरित्र सुनाया था। अध्यात्मरामायण ब्रह्माण्डपुराण का ही खिल है। मत्स्यपुराण में अन्य वस्तु न होने पर भी राम का अवतार तो माना ही गया है। एक ही व्यास सब पुराणों के निर्माता हैं। ऐसी स्थिति में किसी में किसी वस्तु का संक्षेप तो किसी में किसी का विस्तार प्रसङ्गानुसार युक्त ही है। विष्णुपुराण का भी समय चौथी शती ई० उचित नहीं है। इसमें अयोनिजा सीता का उल्लेख है (४, अध्याय ५) । ताटका का वध, अयोनिजा सीता का वर्णन, राम आदि चारों भाइयो के पुत्रों का उल्लेख (४, अध्याय ४) तथा १।१२।४ में लवणासुर-वध का वर्णन है। इसी से वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। वायुपुराण का काल हाजरा के अनुसार ही बुल्के ने ५वीं ई० शती माना है। इन पाश्चात्यों तथा उनके शिष्य भारतीय विद्वानों की दृष्टि में सारा विकास ईसा के बाद ही हुआ। इसी संकीर्णता के कारण वे रामायण तथा महाभारत के काल के विषय में ही नहीं वेदों के काल के विषय में भी ई० पू० दो या तीन हजार वर्ष से आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं। वस्तुतः वायुपुराण का भी समय व्यास का ही समय है। इसमें (अध्याय ८०।१९१- २००) में रामचरित्र का और (८९।२२) में अयोनिजा सीता का वर्णन है। भागवतपुराण का काल ६ठी अथवा ७वीं ई० शती कहना भी निराधार है। श्रीभागवत के अनुसार महाभारत, ब्रह्मसूत्र तथा १७ पुराणों के निर्माण के पश्चात् भी जब वेदव्यासजी का मन प्रसन्न नहीं हुआ तथा उन्होंने अपने आपको अकृतकृत्यसा असन्तुष्ट पाया तब देवर्षि नारद से प्रश्न किया कि मैंने यह सब किया, फिर भी मेरा मन प्रसन्न नहीं है। इसपर नारदजी संक्षिप्त भागवत का उपदेश करके विस्तृतरूप से भगवच्चरित्र-वर्णन का उपदेश करते हैं। साथ ही वे यह भी परामर्श देते हैं कि तुम समाधि द्वारा भगवान् के चरित्रों का अनुस्मरण करो— "समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ।” (भा० पु० १।५।१३) तदनन्तर भगवान् व्यास समाधि द्वारा भगवान् के स्वरूप, गुण एवं लीलाओं का अनुभव कर श्रीमद्भागवत का निर्माण करते हैं एवं अपने पुत्र शुकदेवजी को उसका अध्ययन कराते हैं। देवसहाय त्रिवेदी के अनुसार आद्य- शङ्कराचार्य का समय ई० पू० ७०० वर्ष है। स्वामी दयानन्द ने अपने सत्यार्थप्रकाश में अपने समय से २२ सौ वर्ष पूर्व शङ्कराचार्य का आविर्भाव माना है। शङ्कराचार्य ने अपने गोविन्दाष्टक में कृष्ण की मृत्तिकाभक्षणलीला का उल्लेख किया है। वह एकमात्र श्रीमद्भागवत में ही उपलब्ध है, अन्यत्र नहीं । शङ्कराचार्य के परम गुरु गौडपादाचार्य ने अपने उत्तरगीता के भाष्य में भगवान् के 'पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा' (भा० पु० १।३।४) श्लोक का उद्धरण किया है। अतः भागवत को छठी या सातवीं शती का मानना सर्वथा अशुद्ध एवं निरर्गल है।
श्रीमद्भागवत वैष्णवों का परम धन है और सभी सम्प्रदायों का मान्य एवं परम प्रामाणिक ग्रन्थ है । श्रीवल्लभाचार्य ने उसे व्यास की समाधि-भाषा कहकर वेदों से भी उसका अधिक महत्त्व माना है । इसपर अनेक प्रामाणिक टीकाएँ हैं तथा भारतवर्ष में प्रतिवर्ष श्रीभागवत के हजारों सप्ताह पाठ होते हैं । मृत पितरों तथा मृत प्रिय व्यक्ति की सद्गति एवं कल्याणार्थ इसका सप्ताह कराया जाता है । श्रीभागवत में श्रीराम को परब्रह्म तथा सीता को लक्ष्मी के रूप में प्रतिपादित किया गया है । उसमें सीता-स्वयंवर, धनुष-भङ्ग तथा शूर्पणखा को विरूप करने तथा सीता के त्याग या वनवास का वर्णन है । इससे भी बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है । श्रीभागवत के अनुसार राजा परीक्षित् को शुकदेवजी ने श्रीभागवत सुनाया है । अतः परीक्षित् के ही पहले भागवत का निर्माण मानना अनिवार्य है । श्रीभागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) में कहा गया है कि कृष्ण के परमधाम जाने के तीस वर्ष पश्चात् भाद्रपदशुक्ल नवमी से श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् को भागवत-सप्ताह-कथा सुनायी थी । उसके पश्चात् दो सौ वर्ष बाद शुचि (आषाढ़) मास में आषाढ़शुक्ल नवमी से ही गोकर्ण ने धुन्धुकारी को भागवत-कथा सुनायी थी— “आकृष्णनिर्गमाद् त्रिंशद्वर्षाधिकगते कलौ । नवमीतो नभस्ये च कथारम्भं शुकोऽकरोत् ॥ परीक्षिच्छ्रवणान्ते च कलौ वर्षशतद्वये । शुद्धे शुचौ नवम्यां च धेनुजोऽकथयत् कथाम् ॥” (भाग० मा० ६।५५-५६) कूर्मपुराण का समय भी व्यास का ही समय है, ७वीं ई० शती नहीं । उसके पूर्वविभाग १९वें अध्याय में राक्षस-वंश-वर्णन तथा सूर्यवंश-वर्णन के प्रसङ्ग में रामचरित्र वर्णित है । उसमें युद्ध के पश्चात् राम द्वारा शिवलिङ्ग की स्थापना का उल्लेख है । उत्तरविभाग २१वें अध्याय तथा ३४वें अध्याय में सीताहरण का वृत्तान्त है । भारतीय दृष्टिकोण से सभी पुराण व्यासकृत हैं । अतएव जैसे वेदों के विभिन्न शाखावाले ब्राह्मणों तथा उपनिषदों का समन्वय करके ही कर्म, उपासना एवं ब्रह्मज्ञान का रूप निर्धारित किया जाता है । इसी के लिए पूर्वोत्तरमीमांसारूप वाक्य- शास्त्र अपेक्षित है । उसी तरह पूर्वोत्तरमीमांसा के अनुसार ही वेदों के आर्ष भाष्यरूप पुराणों का भी समन्वय करके ही राम, कृष्ण आदि अवतारों के चरित्रों तथा व्रतों, उपवासों और पर्वों का निर्धारण किया जाता है । हेमाद्रि, पराशरमाधव, वीरमित्रोदय, धर्मसिन्धु आदि निबन्धग्रन्थ एवं मिताक्षरा, दायभाग सब इसी मार्ग पर चलते हैं । पाश्चात्यपद्धति से पुराण, रामायण, महाभारत, ब्राह्मण, उपनिषद् एवं वेद कोई भी न तो प्रामाणिक सिद्ध होते हैं और न उनका समन्वय ही होता है । उनकी दृष्टि से ये सब के सब कल्पनाप्रसूत हैं; विकास हैं एवं विभिन्न लेखकों के दिमाग की उपज हैं । उनका परस्पर विरोध है । अतएव सुन्द-उपसुन्द न्याय से सब अप्रमाण ही हैं । पर क्या ऐसा मानना उचित है ? १५७वें अनु० में बुल्के ने शेष महापुराणों को गौण महापुराण बताया है । राजेन्द्र हाजरा के अनुसार इन महापुराणों में कई बार रूपान्तर हुआ है । उनके अनुसार वराहपुराण का रचनाकाल ८वीं शती ई० है । परन्तु उनकी यह कल्पना भी पाश्चात्य संस्कारों का ही दुष्परिणाम है । भारतीय हेमाद्रि आदि निबन्ध-ग्रन्थों में इन पुराणों का उल्लेख है और प्रमाणरूप में इनके वचनों का उल्लेख किया जाता है । वैशम्पायन उवाच— “आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्या चिन्ततो हरिः । गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय ॥ कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव । हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथातिनाशन ॥
२७० रामायणमीमांसा अष्टम कृष्ण कृष्ण महाविष्णो विश्वात्मन् विश्वभावन । प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम् ।।' (म० भा० २।६८।४१-४३) अर्थात् जब दुःशासन द्रौपदी का वस्त्र आकर्षण करने लगा तो द्रौपदी ने भगवान् का चिन्तन ( स्मरण ) किया—हे द्वारकावासिन्, कृष्ण, गोपीजनप्रिय ! मैं कौरवों से अभिभूत ( पीड़ित-अपमानित ) हो रही हूँ क्या आप नहीं जान रहे हैं। हे नाथ, हे रमानाथ, हे व्रजनाथ, हे आर्तिहन्, मैं कौरवरूपी समुद्र में डूब रही हूँ; मेरा उद्धार करो । हे विश्वभावन, हे गोविन्द मैं आपकी शरण में हूँ। कुरुओं के मध्य अवसन्न होती हुई मेरी रक्षा करो। इस तरह महाभारत की द्रौपदी ने कृष्ण को गोपीजनप्रिय और व्रजनाथ पदों से सम्बोधित किया था। कृष्ण का गोपीजनप्रियत्व आदि श्रीभागवत से ही विदित होता है। भागवतपुराण के कर्ता ही महाभारत कर्ता थे। तभी उनको कृष्ण का व्रजसम्बन्ध ज्ञात था । महापुराणों, पुराणों तथा उपपुराणों के कर्ता के रूप से व्यासजी प्रसिद्ध हैं। उसी रूप में विविध निबन्धों और काव्यों में उनका प्रामाण्य मानकर उनका उद्धरण किया जाता है। परन्तु पाश्चात्य विद्वान् उन सबको झूठा बनाकर कहते हैं कि इनके व्यास कर्ता नहीं हैं, किन्तु कोई अन्य लोग ही कर्ता हैं। वे कर्ता कौन हैं और इसमें क्या प्रमाण है ? इस प्रश्न का उत्तर उनके पास कुछ नहीं है तो भी वे हठधर्मिता पर अड़े रहते हैं। जिन ग्रन्थों में जिनको कर्ता माना गया है। उनको कर्ता न मानकर प्रमाण के बिना ही किन्ही अन्य विभिन्न लोगों को कर्ता मान लेना कितना साहस है ? क्या पाश्चात्य जगत् में या भारत में ही कोई ऐसा किसी को ज्ञात है जो ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का निर्माण करे और अपने नाम तक का उल्लेख न करे। छल-कपट भी तो निःस्वार्थ नहीं होता। आखिर कोई क्यों ऐसे ऐसे ग्रन्थरत्नों का निर्माण करके अपना नाम छिपायेगा ? साथ ही पाश्चात्य लोग इन ग्रन्थों में वर्णित विषयों को वास्तविक एवं प्रामाणिक न मानकर काल्पनिक एवं अप्रामाणिक भी मानते हैं। यहाँ भी यह प्रश्न उठता है कि विद्वान् तत्त्वज्ञ ऐसे मिथ्या विषय पर पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थ लिखकर प्रचार क्यों करना चाहेगा ? प्रयोजन के बिना संसार में किसी की किञ्चिन्मात्र भी प्रवृत्ति नहीं होती तब फिर सैकड़ों सहस्रों विद्वानों की निरर्थक काल्पनिक मिथ्याग्रन्थों के निर्माण और प्रचार में प्रवृत्ति क्यों हुई ? और इसमें क्या प्रमाण है ? सर्वथापि जिन ग्रन्थों का जो कर्ता उस ग्रन्थ से या प्रामाणिक अन्य ग्रन्थों से सिद्ध होता है उसी को उसका कर्ता मानना चाहिए । उसके कर्ता का काल ही उस ग्रन्थ का काल मानना युक्त है। अतः वराहपुराण का भी वही काल है जो उसके कर्ता व्यास का काल है। ग्रन्थों के विषय की अर्वाचीनता देखकर ही पाश्चात्य लोग ग्रन्थों का काल-निर्धारण करते हैं। पर यह पद्धति वेदों और आर्षग्रन्थों के लिए उपयुक्त नहीं कही जा सकती, क्योंकि आर्षग्रन्थों के रचयिता योगज सामर्थ्य से अतीत और अनागत विषयों को जानकर ही उनका उल्लेख करते हैं। मिथ्या कल्पना कर उसपर काव्य लिखना तर्कशून्य है। अस्तु, वराहपुराण के अनुसार दशरथ ने रामद्वादशी का व्रत किया उसके फलस्वरूप राम, भरत आदि की प्राप्ति हुई (अ० ४५) । इस पुराण के १६३वें अध्याय का रचनाकाल ८वीं ई० शती से १० वीं शती ई० है, यह कहना भी असङ्गत ही है। कर्ता को भविष्यज्ञानशून्य मानने से ही उस अध्याय को अर्वाचीन कहने का प्रयत्न किया गया है। इसी तरह अग्निपुराण को भी ८वीं शती ई० के पश्चात् का मानना भी निराधार है। अग्निपुराण में वाल्मीकिरामायण के सातों काण्डों का संक्षिप्त रूप है, यह ठीक है—इससे बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। मन्थरा को अपने ऊपर राम के अत्याचार का भ्रम हो सकता था। अग्निपुराण (अध्याय ५।११) में उसी का उल्लेख होगा। माल्यवान् पर्वत पर राम के चातुर्मास्य यज्ञ करने का उल्लेख है। लिङ्गपुराण को दसवीं शती ई० का मानना भी पूर्ववत् भ्रान्ति ही है। इसमें भी अत्यन्त संक्षिप्त राम- चरित्र का वर्णन है (दे० लि० पु० पूर्वार्ध ९६।३५, ३६)। अम्बरीषोपाख्यान में राम तथा उनके भाइयों के अवतारत्व का उल्लेख है। वस्तुतः उन ग्रन्थों को अर्वाचीन कहने का आधार यह है कि उनमें भरत और शत्रुघ्न को शङ्ख एवं
चक्र का अवतार माना गया है और उनके अवतारत्व का विकास अर्वाचीन है। पर यह तर्क अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त है। कारण, उनके अवतारत्व को अर्वाचीन तभी कहा जा सकता है जब उनके बोधक ग्रन्थ अर्वाचीन हों और ग्रन्थ अर्वाचीन तभी सिद्ध होंगे जब उक्त अवतारत्व की अर्वाचीनता सिद्ध हो। वस्तुतः प्राचीन उपनिषद् रामरहस्य में भरत, शत्रुघ्न आदि को अवतार माना गया है। अतः उनका अवतारत्व विकास नहीं है। वामनपुराण भी अर्वाचीन नहीं है। अतएव वेदवती का सीता में सायुज्य प्राप्त करके सीतारूप में प्रादुर्भाव युक्त ही है। १५८वें अनु० में बुल्के कहते हैं, ‘नारदपुराण अप्राप्य है। प्रचलित नारदीयपुराण दसवीं शती ई० का है। इसमें पीछे से बहुत से प्रक्षेप जोड़े गये हैं।‘’ यह भी अनर्गल कल्पना है। कल्पना के आधार पर किसी प्रामाणिक ग्रन्थ के कुछ अंशों को अप्रामाणिक कहना अक्षम्य अपराध है। इसके पूर्वखण्ड में संक्षिप्त रामचरित बालकाण्ड तक वर्णित है। इससे भी बालकाण्ड की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। ७९ वें अध्याय में द्रविड़ देश के ब्राह्मणों द्वारा बाँधे गये विभीषण की राम द्वारा मुक्ति का वर्णन है तथा उत्तरखण्ड में बालकाण्ड से उत्तरकाण्ड तक समस्त वाल्मीकिरामायण की कथा वर्णित है। जिसमें राम, लक्ष्मण आदि नारायण, संकर्षण आदि के अवतार बताये गये हैं। ७५वें अध्याय को वस्तुतः वाल्मीकिरामायण का संक्षिप्तीकरण मानने की अपेक्षा महर्षि की स्वतन्त्र कृति मानना ही उचित है। १५९वें अनु० में बुल्के कहते हैं, ‘‘ब्रह्मपुराण की अधिकांश सामग्री अन्य पुराणों से ली गयी है। २१३वें अध्याय का रामचरित्र ज्यों का त्यों हरिवंश के ४१वें अध्याय से उद्धृत है।‘’ बुल्के के उक्त कथन से यही सिद्ध होता है कि दोनों के रचयिता एक ही हैं। अतएव हरिवंश का रामचरित्र ब्रह्मपुराण में उद्धृत किया ही जा सकता है। अस्मदादि के लेखों तथा ग्रन्थों में भी ऐसा होता है। कभी-कभी एक ग्रन्थ की कोई बात ज्यों की त्यों अन्य ग्रन्थ में उद्धृत कर दी जाती है। १७६वें अध्याय में रावण चरित्र के अन्तर्गत रावण की तपस्या के बाद एक संक्षिप्त रामकथा है। उसमें रावण द्वारा अमरावती से चुरायी हुई वासुदेवप्रतिमा का वृत्तान्त है। रावण वध के बाद राम ने वह मूर्ति समुद्र को समर्पित कर दी थी। लेकिन बाद में कृष्ण ने उसे पुरुषोत्तमक्षेत्र में स्थापित किया था। ‘‘ब्रह्मपुराण की शेष रामकथासम्बन्धी सामग्री गौतमीमाहात्म्य अध्याय ७०-१७५ के अन्तर्गत मिलती है। यह माहात्म्य प्रारम्भ में एक स्वतन्त्र ग्रन्थ था जिसकी रचना १०वीं शती में अथवा उसके बाद हुई होगी। इसमें भिन्न-भिन्न तीर्थों के माहात्म्य दिखलाने के लिए बहुत सी कथाओं का संकलन किया गया है। रामतीर्थमाहात्म्य में रामकथा का वर्णन मिलता है। इसकी निम्नोक्त विशेषताएँ हैं— कैकेयी द्वारा देव-दानव-युद्ध में तीन वरों की प्राप्ति, श्रवणकुमार-वध के प्रायश्चित्त रूप में दशरथ का अश्वमेध यज्ञ करना तथा उसमें आकाशवाणी द्वारा उन्हें पुत्रोत्पत्ति का आश्वासन दिया जाना। वनवास-काल में गोमती-तट पर राम के पिण्डदान द्वारा नरक से दशरथ की मुक्ति (अध्याय १२३) एवं सहस्रकुण्ड-माहात्म्य (अध्याय १५४) में सीता-त्याग का उल्लेख है। इसके बाद वियोगी राम का गौतमी-तट के सहस्र-कुण्ड पर तपस्या करने का वर्णन है। किष्किन्धा-तीर्थमाहात्म्य १५७वें अध्याय में रावण-वध के बाद अयोध्या की यात्रा करते हुए गौमती-तट पर राम के ५ दिन निवास तथा शिवलिङ्ग-पूजा का उल्लेख किया गया है।‘’ बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि ब्रह्मपुराण की अधिकांश सामग्री अन्य पुराणों से ली गयी है। किन्तु इतना ही कहा जा सकता है कि इन इन अंशों में अन्य पुराणों से उसकी समानता है। ऋग्वेद की विभिन्न शाखाओं में बहुत मन्त्रों की समानता प्रतीत होती है तो भी यह नहीं माना जाता है कि एक शाखा ने दूसरी शाखा से उन मन्त्रों का उद्धरण किया है। विभिन्न वेदों की विभिन्न शाखाओं के पुरुषसूक्तों में बहुत समानता है। फिर भी वे सभी
अनादि, अपौरुषेय और स्वतन्त्र माने जाते हैं । जैसे सह्याद्रिखण्ड स्कन्दपुराण का अंश होता हुआ भी स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित है। उसी तरह ब्रह्मपुराण का अंश होता हुआ गौतमीमाहात्म्य भी स्वतन्त्र ग्रन्थ समझा जाता है। वस्तुतः वह ब्रह्मपुराण का अंश ही है। सुप्रसिद्ध 'गीता' जैसा ग्रन्थ भी तो महाभारत का अंश होते हुए भी स्वतन्त्र ग्रन्थ माना जाता है । गौतमीमाहात्म्य दसवीं शती ई० का है इसका भी कोई प्रामाणिक आधार नहीं है। किसी आधुनिक व्यक्ति, तीर्थ या घटना का वर्णन होने के कारण ही पाश्चात्य विचार के लोग ग्रन्थों का काल-निर्धारण करते हैं । परन्तु यह नियम आर्षग्रन्थों पर लागू नहीं होता, क्योंकि ऋषि योगबल से भविष्यकाल की वस्तुओं को जानकर अपने ग्रन्थ में लिख सकता है। पुण्य तथा पाप अदृष्ट वस्तु है। उनका ज्ञान किसी सामान्य मनुष्य को नहीं होता। अनादि अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक धर्मशास्त्रों, महाभारत, पुराण, उपपुराण आदि आर्षग्रन्थों से ही धर्म, अधर्म अथवा पुण्य तथा पाप का ज्ञान हो सकता है। किस तीर्थ से कौन और कितना पाप नष्ट होता है एवं कितना पुण्य होता है। परलोक में किस तीर्थ के दर्शन, स्पर्शन, अभिषेक, श्राद्ध, पूजा और तपस्या से क्या फल होगा ? इसमें आर्षग्रन्थ ही प्रमाण हो सकते हैं। धर्मशास्त्र-निबन्धकार भी तीर्थों तथा व्रतों का विचार आर्ष वचनों के अनुसार ही करते हैं, अतः गौतमीमाहात्म्य को आधुनिक तथा सामान्य मनुष्यकृत मानना भारतीय दृष्टि से सर्वथा भ्रान्त धारणा है। पाश्चात्यों की अनर्गल कल्पनाओं के आधार पर विचार करने से अवतार, तीर्थ, पूजा, पाठ तथा भक्ति सब केवल कल्पनामात्र ठहरते हैं। कल्पना भी क्रम से विकसित हुई। राम, कृष्ण आदि सब मनुष्य थे। कुछ समय बाद उनके प्रभाव से प्रभावित लोग उन्हें ईश्वर समझने लगे, अवतार मानने लगे। उनको विष्णु से अभिन्न मानने लगे । विष्णु में भी महत्त्वबुद्धि बाद में हुई। पहले इन्द्र ही मुख्य एवं प्रधान देवता थे। अवतार भी प्रजापति के माने जाते थे । विष्णु का महत्त्व बढ़ने से वही अवतार विष्णु के माने जाने लगे। राधा तथा सीता में अवतारत्व कल्पना और बाद में हुई । लक्ष्मण, भरत आदि में शङ्ख, चक्र आदि के अवतारत्व की कल्पना और बाद में हुई । इसी तरह तीर्थों की भी कल्पना का विकास हुआ है। फलतः जिन ग्रन्थों में सीता को लक्ष्मी या लक्ष्मण को शेष कहा गया हो, वे सब ग्रन्थ १०वीं या ११वीं शती ई० के ठहरा दिये जाते हैं । वास्तव में ये सब कल्पनाएँ निष्प्रमाण हैं। भारतीय दृष्टिकोण से प्रत्यक्ष तथा अनुमान के समान ही वेदादि आगम भी स्वतन्त्र प्रमाण हैं। शब्द का प्रामाण्य सर्वत्र मान्य है। पार्लियामेण्ट तथा न्यायालयों में शब्द का प्रामाण्य मान्य है। विधान के शब्दों, न्यायाधीशों के निर्णयों तथा साक्षियों की गवाहियों का आदर होता है। वक्ता के दोष से ही शब्द का अप्रामाण्य होता है। यदि कोई अनादि अपौरुषेय शब्द सिद्ध होता हो तो उसमें वक्ता के भ्रम, प्रमाद आदि दोषों से दूषित होने की कल्पना नहीं होती। सुतरां निर्भ्रान्त आप्त वक्ता का वचन होने से उसका ( शब्द का ) अधिक प्रामाण्य माना जाता है। मन्त्र, ब्राह्मण तथा उपनिषद वेद हैं । वे सब अपौरुषेय हैं। सर्वज्ञ- कल्प ऋषि-महर्षियों ने वेदों का परम प्रामाण्य माना है। बड़े-बड़े दार्शनिकों, तार्किकों को पाश्चात्यों की निराधार मिथ्या कल्पनाओं के बल पर ठुकराया नहीं जा सकता । निबन्धकारों ने ऋषियों तथा मीमांसा की दृष्टि से आर्ष वचनों में प्रतीत होनेवाले विरोधों का परिहार कर समन्वय कर रखा है। पुराणों के विरोधाभासों का भी सन्तोष- जनक समाधान सुलभ है। अतः बुल्के तथा उनके अन्य साथियों की आर्ष परम्पराविरुद्ध उक्त सभी कल्पनाएँ सर्वथा उपेक्षणीय ही हैं । अन्य आर्ष ग्रन्थों में वाल्मीकिरामायण की कथाओं से विलक्षण कथाएँ होना भी असम्भव नहीं है, क्योंकि किसी एक पुस्तक में जीवन के प्रतिदिन या प्रत्येक घटना का उल्लेख होना सम्भव नहीं । अतः विभिन्न ऋषियों के कहने के लिए बहुत से विषयों का अवशेष रहना सम्भव ही है, इसलिए राम का गौतमी-तट पर पिण्डदान, सहस्रकुण्ड पर तपस्या, शिवलिङ्ग की स्थापना करना आदि सब ठीक है।
अध्याय अवतार-सामग्री २७३ १६०वें अनु० गरुड़पुराण की रचना का समय भी उसके रचयिता व्यास का ही समय मानना उचित है। इसके विपरीत उसका रचना-काल १०वीं शती ई० मानना असङ्गत है। शूर्पणखा को राम स्वयं विरूप करते हैं। कल्पभेद से यह भी सम्भव ही है। राम गया में अपने पिता का श्राद्ध करते हैं, यह तो मर्यादापुरुषोत्तम राम के स्वरूपानुरूप ही है। १६१वें अनु० में बुल्के का कथन है कि "स्कन्दपुराण की अधिकांश सामग्री की सृष्टि आठवीं शती ई० के बाद हुई है। लेकिन इसमें बहुत से प्रक्षेप हैं। जिनका रचनाकाल अज्ञात है।" किन्तु यह कहना असङ्गत है। स्कन्दपुराण को पुराणों में प्रमुख स्थान प्राप्त है। यह प्रसिद्ध व्यासकृति ई० पू० ३५ सौ वर्षों से कम अर्वाचीन नहीं है। माहेश्वरखण्ड में रावणचरित, रामावतार और राम के द्वारा रावण का वध वर्णित है। वैष्णवखण्ड के अन्तर्गत कार्तिक- माहात्म्य में अवतार के कारणों के वर्णन के प्रसङ्ग में वृन्दा-शाप तथा धर्मदत्त और कलहा की कथा है। धर्मदत्त का ही दशरथरूप में जन्म कहा गया है। वैशाखमासमाहात्म्य में वाल्मीकि की जन्म-कथा तथा अयोध्यामाहात्म्य में राम का स्वधाम-गमन वर्णित है। ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सेतुमाहात्म्य के २ अध्यायों में संक्षिप्त रामकथा वर्णित है। जिसमें सेतुबन्ध का विशेषरूप से वर्णन है। ७ वें अध्याय में समुद्रबन्धन के पूर्व शिवप्रतिष्ठा का वर्णन है। २२ वें अध्याय में सीता की अग्निपरीक्षा तथा अग्नि द्वारा सीता के सतीत्व की प्रशंसा वर्णित है। २३वें अध्याय में रावणवध से हुई ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्तरूप में राम द्वारा कोटितीर्थ पर शिवलिङ्ग की स्थापना का वर्णन है। ३०वें अध्याय में विभीषण द्वारा सेतु तोड़ने के लिए श्रीरामजी से प्रार्थना की गयी है। अध्याय ४४-४७ में रामोपाख्यान पर आधारित संक्षिप्त रामचरित, रावणवध के प्रायश्चित्तरूप में रामेश्वर-लिङ्ग की स्थापना, शिवलिङ्ग ले आने के लिए हनुमान् को कैलाश भेजा जाना तथा मुहूर्त बीत जाने की आशङ्का से राम द्वारा सैकतमय (बालू के) शिवलिङ्ग की स्थापना का वर्णन है। धर्मारण्यखण्ड अध्याय ३०, ३१ में एक संक्षिप्त कालनिर्णय रामायण का वर्णन है। अध्याय ३२-३५ में राम द्वारा धर्मारण्य की तीर्थ-यात्रा वर्णित है। काशीखण्ड, इसमें रामकथा का अभाव हैं। अवन्तीखण्ड अध्याय २१ में शिवलिङ्ग ले आने के लिए हनुमान् की लङ्का यात्रा, अध्याय २४ में वाल्मीकि-जन्मकथा, अध्याय ७९ में हनुमान् का चरित्र । इसमें हनुमान् रुद्रावतार माने गये हैं। अध्याय ७३ रेवाखण्ड में ब्रह्महत्या दोष-निवारणार्थ हनुमान् की तपस्या एवं अहल्योद्धार की कथा; राम से उद्धृत अहल्या नर्मदा-तीर पर शिव की पूजा करने जाती हैं। अध्याय १६८ में रावणादि की तपस्या तथा शिवजी द्वारा वर-प्रदान वर्णित है। नागरखण्ड अध्याय २० में लक्ष्मण का स्वामिद्रोह और तपस्या। अध्याय ९६-९८ में शनि का दशरथ को वर प्रदान। दशरथ और इन्द्र की मैत्री, कार्तिकेयपुर में पुत्र-प्राप्ति के लिए दशरथ का तपस्या करना तथा ४ पुत्रों एवं एक पुत्री का जन्म। अध्याय ९९-१०२ में राम का स्वर्गारोहण, विभीषण को राम द्वारा धर्मोपदेश तथा राम द्वारा सेतुभङ्ग एवं अनेक तीर्थों में राम द्वारा शिवप्रतिष्ठा। अध्याय १२४ में वाल्मीकि-कथा एवं अध्याय २०८ में अहल्योद्धार । अहल्या की तीर्थयात्रा तथा शिव-पूजा । प्रभासखण्ड अध्याय १११-११३ में रामेश्वरतीर्थ में राम और लक्ष्मण द्वारा शिव-प्रतिष्ठा, अध्याय १२३ में रावण द्वारा रावणेश्वर-तीर्थ में शिव-प्रतिष्ठा, अध्याय १७१ में दशरथेश्वर में दशरथ द्वारा पुत्रार्थ शिव-प्रतिष्ठा तथा अध्याय २७८ में वाल्मीकि-कथा। इन उद्धरणों से विदित होता है कि स्कन्दपुराण द्वारा भगवान् व्यास ने विभिन्न प्रसङ्गों में राम के मर्यादापुरुषोत्तमरूप को व्यक्त किया है। श्रीमद्भागवत में व्यास ने कहा है कि भगवान् राम का मर्त्यावतार मत्यों के शिक्षणार्थ ही है। केवल रावणादि राक्षसों के वधार्थ नहीं— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम् ।” (भा० पु० ५।१९।५) ३५
२७४ रामायणमीमांसा अष्टम १६२ वें अनु० में बुल्के के अनुसार "पद्मपुराण के विभिन्न खण्डों का रचनाकाल अलग-अलग है। पाताल- खण्ड जिसमें बहुत सी रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है, १२वीं शती का माना जाता है। उत्तरखण्ड अपना वर्तमान रूप १५०० ई० के लगभग प्राप्त कर सका। इसमें भी रामचरित का पूरा वर्णन है। पातालखण्ड का एक गौड़ीय पाठ सुरक्षित है, जिसमें प्रारम्भ के २८ अध्यायों में कालिदासकृत रघुवंश से मिलती जुलती कथाएँ मिली हैं। आनन्द- श्रम-संस्करण के पातालखण्ड में रामाश्वमेध का विस्तृत वर्णन है।" उनके इस कथन का आधार भी डा० हाजरा की 'इण्डियन कल्चर' पुस्तक है जो कि अटकलमात्र तथा सब पुराणों से विरुद्ध है। अनेक प्रामाणिक पुराणों में १८ पुराण तथा १४ उपपुराणों का उल्लेख है। उनमें स्कन्द- पुराण, पद्मपुराण आदि पुराण वर्णित हैं। केवल अटकलबाजियों से आर्ष पुराणों की उक्तियों को झुठलाया नहीं जा सकता है। जहाँ जहाँ राम की ब्रह्मरूपता, परमेश्वरता तथा राम की भक्ति का वर्णन है उन उन ग्रन्थों या खण्डों को आधुनिक कहना कोई तर्क-युक्तिसंगत नहीं है। वेदों, उपनिषदों, रामायण, भारत आदि सभी प्रामाणिक ग्रन्थों में अवतारसत्ता, राम की ब्रह्मरूपता और उनकी भक्ति प्रसिद्ध है। अन्यान्य आर्ष ग्रन्थों के विरुद्ध होने के कारण इन ग्रन्थों के काल-निर्णय की उक्त पद्धति ही गलत है। पातालखण्ड में राम-चरित्र की मुख्य घटनाओं की तिथियों के उल्लेख को बुल्के स्कन्दपुराण की नकल मानते हैं। परन्तु उनका यह कथन ठीक नहीं है। जैसे वैदिक संहिताओं में समान पाठ होने पर भी एक संहिता का दूसरी संहिता में अनुकरण नहीं माना जाता वैसे ही पुराणों में भी तुल्य वर्णन होने पर भी, वेदों के समान ही, एक में दूसरे का अनुकरण नहीं माना जा सकता। ४४वें अध्याय में हनुमान्जी की वीरता का वर्णन, ४४-४६ अध्यायों में राम तथा शिव का अभेद प्रतिपादन, ५५, ५६वें अध्यायों में धोबी के कथन के फलस्वरूप सीता का परित्याग, ५९-६६ अध्यायों में कुश और लव की उत्पत्ति तथा उनका राम की सेना से युद्ध करना, ६७, ६८वें अध्यायों में राम और सीता का पुनर्मिलन। पातालखण्ड के १०० वें अध्याय में बाँधे हुए विभीषण की राम द्वारा मुक्ति तथा १, २ वें अध्याय में पुराकल्पीय रामायण का वर्णन। उनमें दशरथ की कौशल्या, सुमित्रा, सुरूपा तथा सुवेषा चार पत्नियों का उल्लेख है। बाल-लीलाएँ, सीता-स्वयंवर में इन्द्र, रावण आदि के असफल होने पर राम द्वारा धनुर्भङ्ग की कथा तथा शिव के दिये हुए अजगव धनुष पर वानरसेना द्वारा समुद्र पार करने की कथा है एवं कुम्भकर्ण-वध रावण-वध के बाद माना गया है। ११३ वें अध्याय में राम शिव से शिवभक्ति का वरदान माँगते हैं— "भक्तिरस्तु स्थिरा त्वयि।" यह सब मर्यादापुरुषोत्तम राम के स्वाभाविक रूप का ही वर्णन है। शिवमहिम्न आदि अनेक प्रामाणिक ग्रन्थों में यह वर्णन मिलता ही है कि विष्णु भगवान् प्रतिदिन सहस्र कमल अर्पित कर शिव की पूजा करते थे। किसी दिन एक कमल कम होने पर उन्होंने अपना नेत्र ही कमल मानकर शिवजी को चढ़ा दिया। सृष्टिखण्ड में शम्बूक-वध तथा राम और अगस्त्य का संवाद है। बुल्के कहते हैं इसमें वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड के सर्ग ७९ से ८३ तक के ५ सर्गों की सामग्री उद्धृत है, उनका यह कथन असङ्गत है। यद्यपि वाल्मीकि- रामायण व्यास से भी अतिप्राचीन है, अतः उसके उक्त अंश का उद्धरण करना असंभव नहीं है तथापि बुल्के तो उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप ही मानते हैं। व्यास भगवान् ने जैसे स्वयं भी आर्ष विज्ञान से रामाश्वमेध आदि का निर्माण किया है वैसे ही वे अगस्त्य-संवाद का भी निर्माण कर ही सकते हैं। सृष्टिखण्ड के ३९ वें अध्याय में राम का विभीषण को उपदेश और मथुरा में वामन की प्रतिष्ठा करना प्रतिपादित है। उत्तरखण्ड में वृन्दा का शाप, रामरक्षास्तोत्र, शम्बूक-वध तथा संक्षिप्त रामसम्बन्धी वृत्तान्त वर्णित हैं।
अध्याय अवतार-सामग्री २७५ प्रारम्भ में रामावतार के कारण के वर्णन-प्रसङ्ग में स्वायंभुव मनु की तपस्या का वर्णन है। जिसके फल- स्वरूप वे तीन जन्मों में विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त कर सके थे । इसमें अवतारवाद के अधिक व्यापक होने से ही बुल्के आदि इसे अर्वाचीन मानते हैं। इसी कारण वाल्मीकिरामायण के उन अंशों को भी जिनमें अवतार-सामग्री है, वे आधुनिक प्रक्षेप मानते हैं। यह उनका केवल दुराग्रह ही है। वहाँ राम ने अपनी माता को विष्णुरूप में दर्शन दिया है। राम और सीता विष्णु और लक्ष्मी के पूर्ण अवतार माने जाते हैं। लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न शेष, सुदर्शन तथा पाञ्चजन्य के अवतार माने जाते हैं। इसमें राम ने ही शूर्पणखा को विरूप किया था। इसी के अनुसार गो० तुलसीदासजी ने भी रामचरितमानस में स्वायंभुव मनु की तपस्या का वर्णन एवं जन्म-काल में राम द्वारा कौशल्या को चतुर्भुजरूप में दर्शन देने का वर्णन किया है । १६३वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "ब्रह्मवैवर्तपुराण ७०० ई० के पूर्व ही निर्मित हुआ; लेकिन उसका वर्तमान रूप सोलवीं शती का है। इसमें वेदवती के वृत्तान्त के वर्णन के बाद सीताहरण की कथा दी गयी है। अग्नि द्वारा एक मायामयी सीता की सृष्टि करने का उल्लेख है। प्रकृतिखण्ड के १४वें अध्याय की यह कथा श्रीमद्देवीभागवत के वृत्तान्त से अभिन्न है (स्क० ९ अ० १६) । कृष्णजन्मखण्ड (अध्याय ६२) में अहल्योद्धार-वर्णन के प्रसङ्ग में संक्षिप्त रामकथा है जिसमें शूर्पणखा के कुब्जारूप में प्रकट होने का वृत्तान्त है। इसी खण्ड के ५६वें अध्याय में जय और विजय के ३ जन्मों का उल्लेख है।" उपर्युक्त ब्रह्मवैवर्तपुराण का भी कालनिर्णय अशुद्ध है। अन्यान्य पुराणों के समान ही यह भी व्यासकृत ही है। १६ वीं शती में इसका विस्तार हुआ यह कथन भी मान्य नहीं है, क्योंकि अन्यान्य पुराणों के वर्णनप्रसङ्ग में उनके श्लोकों की संख्या भी दी गयी है। तदनुसार ही ब्रह्मवैवर्तपुराण की श्लोक-संख्या है। उपपुराण १६४वें अनु० में बुल्के के अनुसार, "विष्णुधर्मोत्तरपुराण की रचना संभवतः ५वीं शती के लगभग कश्मीर में हुई है। इसमें लवण-वध की कथा के बाद खण्ड १ के अध्याय २०० में गन्धर्वों के विरुद्ध भरत के युद्ध का विस्तृत वर्णन है। अध्याय २०२-२६९ के अन्तर्गत रावण का चरित वर्णित है। उसमें राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न क्रमानुसार नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध के अवतार बताये गये हैं (दे० अध्याय २१२) ।" उपपुराण भी पुराणों के समय के ही हैं। वे भी आर्ष हैं और प्रामाणिक हैं। पुराणों में उपपुराणों की भी चर्चा है। अतः विष्णुधर्मोत्तर का काल पांचवीं शती न होकर व्यास का काल ही उसका काल है। भारतीय धर्मग्रन्थ परस्पर एक दूसरे से संबद्ध ही हैं। इसलिए अल्पश्रुत के लिए शास्त्रों का अभिप्राय दुरूह ही रहता है। इतिहास, पुराण और उपपुराण का अध्ययन करते समय उनके समन्वय से ही तात्पर्यार्थ निर्धारित होता है। चतुर्व्यूह नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के रूप में राम आदि का अवतार ठीक ही है। जिनको ईश्वर एवं उसके अवतार में विश्वास नहीं है, जो राम का अवतार नहीं मानते हैं एवं जिन्होंने यह निर्णय कर रखा है कि राम की भक्ति और उनके अवतारत्व की कल्पना अर्वाचीन है, उनकी दृष्टि में जिन ग्रन्थों में अवतार-सामग्री उपलब्ध हो वे ग्रन्थ ही अर्वाचीन प्रतीत होंगे, परन्तु उक्त धारणा ठीक नहीं है, यह कहा जा चुका है। नृसिंहपुराण १६५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "यह चौथी या पाँचवीं शती ई० का है। इसमें छः अध्याय (४७ से ५२ तक) मिलते हैं जिनमें वाल्मीकिरामायण के प्रथम छः काण्डों की कथा का किंचित्-परिवर्तन के साथ वर्णन है। अवतारवाद को अधिक महत्त्व दिये जाने के कारण राम नारायण के पूर्णावतार तथा लक्ष्मण शेष के अवतार बताये
२७६ रामायणमीमांसा अष्टम गये हैं। अहल्या अपने पति के शाप से पाषाणभूता कही गयी है। सीता के स्वयंवर के बाद अन्य क्षत्रिय राजाओं का राम पर आक्रमण करने का वर्णन है। सीताहरण का ऐसा रूप प्रस्तुत किया गया है जिसमें रावण सीता का स्पर्श नहीं करता। रावण-वध के पश्चात् राम के यज्ञों तथा स्वर्गारोहण का वर्णन है। इसमें सीता-त्याग का वृत्तान्त नहीं है।" काल-निर्णय यहाँ भी अशुद्ध ही है। गो० तुलसीदास ने भी स्वयंवर के बाद दुर्वृत्त राजाओं के राम पर आक्रमण के इरादे का वर्णन किया है, परन्तु परशुराम के आ जाने से वे ठण्डे पड़ गये थे । वह्निपुराण १६६ वें अनु० में बुल्के के अनुसार "इसकी सन् १६४६ ई० की एक हस्तलिपि लन्दन में सुरक्षित है। उसमें एक अत्यन्त विस्तृत रामकथा है, जिसमें बालकाण्ड से युद्धकाण्ड तक समस्त रामायण की कथा का वर्णन है । आरम्भ में उसमें रामावतार तथा सीता हरण का कारण भृगुशाप बताया गया है। रावण ओर कुम्भकर्ण को जन्मकथा, मधु और कैटभ एवं हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का उल्लेख है। हनुमान् का मूषिका के रूप में लङ्काप्रवेश कहा गया है।" लन्दन की हस्तलिपि का इतना ही अर्थ है कि वह १६वीं शती से पहले का है। परन्तु उसका निर्माणकाल वही है यह उससे सिद्ध नहीं हो सकता है । १६७वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "शैवपुराण तथा स्कन्दपुराण को छोड़कर उपर्युक्त पुराणों और उपपुराणों की रामकथाओं में साम्प्रदायिकता का प्रभाव कम पड़ा है। अन्य शैव और शाक्त उपपुराणों में साम्प्रदायिकता की गहरी छाप है। उनमें राम शिव अथवा देवी के भक्त रूप में दिखाये गये हैं।" यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि राम परब्रह्म होते हुए भी मर्त्यशिक्षण की दृष्टि से मर्यादापुरुषोत्तम हैं। अतः जैसे वर्णाश्रमी शिव एवं भगवती के भक्त होते हैं वैसे ही राम भी शिव, देवी आदि देवताओं के भक्त थे। इसमें साम्प्रदायिकता की कोई बात नहीं है। वाल्मीकिरामायण से भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि राम के पिता दशरथ तथा राम और उनके सभी पूर्वज वैदिक थे। मर्यादाओं तथा यज्ञ, याग आदि के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा थी। अनादि अविच्छिन्न ज्ञान, भक्ति तथा कर्म की परम्परा ही सम्प्रदाय है। साम्प्रदायिक होने के कारण ही "तुल्यं साम्प्रदायिकम्" (जै० सू० १।२।८) में भी मन्त्र के तुल्य ही ब्राह्मणभाग को वेद कहा गया है। अतः वैदिक भी साम्प्रदायिक ही होते हैं। परन्तु आजकल तो दुर्भाग्यवश फिरकापरस्ती अर्थ में सम्प्रदायशब्द का प्रयोग होने लगा है। बुल्के शिवपुराण को १४वीं शती का मानते हैं। इस सबका आधार डा० हाजरा का निर्णय ही है जो कथमपि प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता है। शिवपुराण की शतरुद्रसंहिता के सृष्टिखण्ड में नारदमोह की कथा तृतीय और चतुर्थ अध्यायों में है। सतीखण्ड में सती द्वारा राम की परीक्षा वर्णित है। राम सती से कहते हैं कि शङ्कर की आज्ञा से मैंने अवतार लिया है (अध्याय २४-२६)। युद्धखण्ड में वृन्दा का शाप (अध्याय २३) तथा शतरुद्रसंहिता (अध्याय २०) में शिवजी के वीर्य से हनुमान् का जन्म वर्णित है। आधुनिक विवेचकों द्वारा इस संहिता का रचना-काल १४वीं शती माना जाता है। इसका भी कोई आधार नहीं है। तुलसीदासजी ने इसी के आधार पर नारदमोह, सतीमोह आदि का वर्णन किया है। वे इन पुराणों को परम प्रमाण मानते थे। उमासंहिता (अध्याय ३) में राम द्वारा शिवपूजा तथा वरप्राप्ति का वर्णन है। गणपति कृष्णजी प्रेस के शिवपुराण-संस्करण में धर्मसंहिता (अध्याय १३, १४) में संक्षिप्त रामकथा उद्धृत है। ज्ञानसंहिता (अध्याय ३०) में वनवास के समय सीता द्वारा दशरथ के लिए पिण्डदान का वर्णन है और
अध्याय अवतार-सामग्री २७७ (अध्याय ५७) में सागर को पार करने के लिए राम द्वारा सहायता के लिए शिव की प्रार्थना की गयी है। शिवपुराणोक्त रामसम्बन्धी आख्यान भी राम के परमेश्वरत्व और मर्यादापुरुषोत्तमत्व का ही पोषक है। १६८ अनु० में बुल्के कहते हैं, "श्रीमद्देवीभागवतपुराण के नवरात्रमाहात्म्य में वर्णित रामकथा के अनुसार राम ने शूर्पणखा को विरूप किया। शेष कथा रामायणीय कथा से मिलती जुलती है। इसमें सीताहरण के बाद नारद के उपदेश से राम रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए नवरात्रोपवास करते हैं। इसके अन्त में सिंहासनारूढा देवी भगवती राम को दर्शन देकर रावण पर विजय का आश्वासन देती हैं। अनन्तर राम विजया-पूजा कर वानरसेना के साथ समुद्र की ओर प्रस्थान करते हैं (देवीभा० ३।२८-३०)। नवें स्कन्ध में वेदवती-वृत्तान्त तथा छायासीता की कथा भी मिलती है।" बुल्के इन प्रामाणिक आदरणीय सभी धर्मग्रन्थों को अपनी कल्पना के आधार पर मिथ्या सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। पर सभी प्रामाणिक ऋषि एवं उनके ग्रन्थ एक स्वर से राम को ब्रह्म और मर्यादापुरुषोत्तम ही प्रमाणित करते हैं। गुणोपसंहारन्याय से वाल्मीकिरामायण या अन्य ग्रन्थों में अनुक्त होने पर प्रामाणिक ग्रन्थों की कथाओं को मिलाकर ही रामकथा की पूर्णता का निर्णय किया जाता है। इस तरह मर्यादापुरुषोत्तम राम के द्वारा शिवपूजा और देवीपूजा, सूर्यपूजा आदि सभी सम्भव हैं, क्योंकि अपने आचरण से मनुष्यों को धर्म, कर्म, व्यवहार आदि की शिक्षा देना ही राम के अवतार का मुख्य उद्देश्य है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम् ।” (भा० पु० ५।१९।५ ) १६९ अनु० में बुल्के कहते हैं, "हाजरा के अनुसार महाभागवतपुराण गुजराती प्रिंटिंग प्रेस बम्बई सन् १९१३ के संस्करण का निर्माण ११वीं शती ई० के लगभग पूर्व बङ्गाल में अथवा कामरूप में हुआ था। इसमें एक रामोपाख्यान मिलता है, जिसकी कथावस्तु रामायण से बहुत भिन्न है। इसके अनुसार देवता रावण का वध करने के लिए विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना करते हैं। विष्णु उनसे कहते हैं जब तक देवी लङ्का में निवास करती हैं, मैं रावण को पराजित नहीं कर सकता। अनन्तर सब मिलकर कैलाश पर्वत पर देवी के पास जाते हैं। देवी सीताहरण के कारण लङ्का छोड़ देने की प्रतिज्ञा करती हैं तथा शिव हनुमान् का रूप धारण कर राम की सहायता करने का वचन देते हैं। अन्त में राम देवी से अमोघ अस्त्र ग्रहण कर रावण को मारने में समर्थ होते हैं (अ० ४७, ६६)। ब्रह्मा भी राम की विजय के लिए देवी की मृण्मयी मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करते हैं। इस वृत्तान्त में सीता मन्दोदरी के गर्भ से उत्पन्न मानी गयी हैं (अ० ४२।६४)। इस पुराण में अन्यत्र माया सीता का हरण तथा नारदशाप दोनों का उल्लेख है (अध्याय ११।१०७-११२) ।” हाजरा महाभागवतपुराण की कथावस्तु वर्णन के आधार पर ही ११वीं शती का अनुमान करते हैं। उनके पास और कोई ठोस प्रमाण नहीं है। यह भी देवीभागवत का ही परिवर्तित रूप है। लोकोत्तर माहात्म्य तो प्रसिद्ध ही है। देवी की कृपा से राम रावण को मारने में समर्थ हैं, यह उनके मर्यादापुरुषोत्तम रूप के अनुरूप ही है। राम की ब्रह्मरूपता इस पुराण से भी सिद्ध ही है। १७० वें अनु० में बुल्के के अनुसार "बृहद्धर्मपुराण १३वीं शती ई० के महाभागवतपुराण की कथा से बहुत भिन्न नहीं है। उसमें सीताहरण का वृत्तान्त नृसिंहपुराण की कथा से मिलता-जुलता है। तथा हनुमान् विडालका का रूप धारण कर लङ्का में प्रवेश करते हैं (दे० पूर्वखण्ड अ० १८-२२)। रामकथा के वर्णन के बाद रामायणोत्पत्ति का वृत्तान्त दिया गया है, जिसमें श्लोकोत्पत्ति आदि के बाद रामायण के उत्कर्ष-वर्णन के प्रसङ्ग में रामायण के महाभारत तथा पुराणों का बीज होने का उल्लेख है (पू० ख० अध्याय २५-३०) ।" यह भी १३ वीं शती की रचना है। यह कल्पना पूर्ववत् निराधार ही है। आर्ष सभी पुराण ऋषिकाल के ही हैं। रामायण आदिकाव्य है। अन्य
महाभारत, पुराण आदि का वही बीज है, यह सिद्धान्त ठीक ही है। भारतीय अन्य साहित्यों से भी यही सिद्ध है। कालिदास, हर्षवर्धन आदि भी यही मानते हैं। बौद्ध अश्वघोष भी वाल्मीकि की कृति को अपूर्व मानते हैं। १७१ वें अनु० में सौरपुराण का रचना-काल सन् ९५०-१०५० ई० बताया गया है। प्रायः काल-निर्णय सबका अशुद्ध है। इसमें सूर्य-वंश वर्णन के प्रसङ्ग से जो रामकथा है उसमें राम को महादेवपरायण कहा गया है। शङ्कर के प्रसादस्वरूप राम अपने पद को प्राप्त करते हैं। जनक ने गौरी को सन्तुष्ट करके सीता को प्राप्त किया था (अध्याय ३०)। सौरपुराण भी सनातनधर्ममान्य उपपुराण है। इसका वृत्त-वर्णन भी युक्त ही है। १७२ वें अनु० में कालिकापुराण को भी ११ वीं शती का कहा गया है; जो सर्वथा अशुद्ध है। इसमें ब्रह्मा द्वारा राम की विजय के लिए दुर्गा की पूजा का उल्लेख (अध्याय ६२।२०-३८) एवं ३८ वें अध्याय में जनक के हल जोतते समय सीता को तथा अन्य पुत्रों को प्राप्त करने की कथा वर्णित है। इनकी कथाओं से भी रामायण की कथा का समर्थन होता है। १७३ अनु० में बुल्के कहते हैं दो अर्वाचीन पुराणों में रामकथा की सामग्री मिलती है। वस्तुतः बुल्के की दृष्टि में सभी पुराण अर्वाचीन ही हैं। वैदिक सनातनसिद्धान्तनिष्ठों के अनुसार तथावर्णित सभी ग्रन्थों की दृष्टि से बुल्के और उनके मान्य हाजरा का मत सर्वथा अमान्य है। हाँ, आदिपुराण में वसुदेव-विवाह से यमलार्जुन कथातक कृष्ण-चरित वर्णित है। नन्ददृष्ट स्वप्न वर्णन नामक १६वें अध्याय में संक्षिप्त रामकथा के अतिरिक्त इसका भी उल्लेख है कि नन्द ने पूर्वजन्म में भक्तिपूर्वक भगवान् से प्रार्थना की थी जिसके फलस्वरूप रामावतार में तथा कृष्णावतार में उनको भगवान् के पिता होने का वरदान प्राप्त हुआ था। आदिपुराण का रामचरित वाल्मीकिरामायण के अनुसार है। यहाँ कनकमुग को देखकर राम स्वयं कहते हैं कि अवश्य ही कोई मायावी राक्षस है। वस्तुतः अन्य पुराणों की भाँति यह भी रामायणीय रामकथा का पोषक है। कल्किपुराण की संक्षिप्त रामकथा (अंश ३।६।२६-५८) की यह विशेषता है कि इसमें राम-सीता के पूर्वानुराग की झलक मिलती है तथा सीता ने अशोकवन में रुक्मिणीव्रत किया था जिसके फलस्वरूप वह राम से पुनः मिल सकीं (३।१७।४०)। बुल्के को इसमें आश्चर्य प्रतीत हो सकता है। परन्तु पुराणों के सिद्धान्तानुसार कृष्ण तथा राम का बराबर विभिन्न कल्पों में अवतार होता रहता है। तदनुसार इस वाराह कल्प के पहले सारस्वत कल्प में भी कृष्ण का अवतार हुआ था, अतः २४वें त्रेता में रामायण के राम की सीता रुक्मिणी-व्रत करे तो इसमें विरोध की कोई बात नहीं है। कल्किपुराण को भी अर्वाचीन नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह भी आर्ष है। पुराणों के लक्षण तथा उनके नाम और संख्या तथा उनकी श्लोक-संख्या भी पुराणों में मिलती है। पुराणों में ही उपपुराण तथा औपपुराणों का भी वर्णन है। उससे उनका भी आर्षत्व और प्रमाणत्व सिद्ध होता है। अतः उनके अनुसार हाजरा या अन्य विद्वानों की तत्सम्बन्धी काल-कल्पना सर्वथा अप्रमाण ही है। जैसा कि कूर्मपुराण में कहा गया है— सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ ब्राह्मं पुराणं प्रथमं पाद्मं वैष्णवमेव च। शैवं भागवतं चैव भविष्यं नारदीयकम् ॥ मार्कण्डेयमथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च। लैङ्गं तथा च वाराहं स्कान्दं वामनमेव च ॥
अध्याय अवतार-सामग्री २७९ कौर्मं मात्स्यं गारुडञ्च वायवीयमनन्तरम् । अष्टादशं समुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति संज्ञितम् ॥ अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कथितानि तु । अष्टादशपुराणानि श्रुत्वा संक्षेपतो द्विजाः ॥ आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहमतः परम् । तृतीयं स्कान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् ॥ चतुर्थं शिवधर्माख्यं साक्षान्नन्दीशभाषितम् । दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदीयमतः परम् ॥ कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम् । ब्रह्माण्डं वारुणं चैव कालिकाद्वयमेव च ॥ माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसञ्चयम् । पराशरोक्तं मारीचं तथैव भार्गवाह्वयम् ॥ ( कू० पु० पूर्वार्ध १।१२-२० ) सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित ये पाँच लक्षण जिसमें हों वही पञ्चलक्षण पुराण है । इस सूची में ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, भविष्य, नारदीय, मार्कण्डेय, आग्नेय, ब्रह्मवैवर्त, लैङ्ग, वाराह, स्कान्द, वामन, कौर्म, मात्स्य, गारुड़ और ब्रह्माण्ड ये १८ पुराण वर्णित है । सनत्कुमार, नारसिंह, स्कान्द, ( यह पूर्वोक्त स्कान्द से भिन्न है ), शिवधर्म, दुर्वासाप्रोक्त आश्चर्यपुराण, नारदीय ( यह भी पूर्वोक्त से अन्य है ), कापिल, मानव, औशनस, ब्रह्माण्ड, वारुण, कालिका, माहेश्वर, साम्ब और पराशरोक्त मारीचपुराण तथा भार्गव ये उपपुराण भी आर्ष हैं । अतः इनको आधुनिक कहना सर्वथा असङ्गत है । धर्मकल्पद्रुम में ज्ञानानन्दजी ने अष्टादश औपपुराणों ( जो पुराणों एवं उपपुराणों से पृथक् हैं ) की चर्चा की है और बृहद्विवेकग्रन्थ में इनका निरूपण बताया है । ब्रह्माण्डविवेक के तीसरे अध्याय में भी औपपुराणों की चर्चा है । वहाँ के श्लोक उद्धृत किये जा रहे हैं— आद्यं सनत्कुमारं च नारदीयं बृहच्च यत् । आदित्यं मानवं प्रोक्तं नन्दिकेश्वरमेव च ॥ कौर्मं भागवतं ज्ञेयं वासिष्ठं भार्गवं तथा । मुद्गलं कल्किदेव्यौ च महाभागवतं ततः ॥ बृहद्धर्मं परानन्दं वह्नि पशुपतिं तथा । हरिवंशं ततो ज्ञेयमिदमौपपुराणकम् ॥ उन पुराणों के श्लोकों की संख्या भी निम्नोक्त है । स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे-- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ ब्राह्मं पुराणं तत्राद्यं संहितानां विभूषितम् । श्लोकानां दशासाहस्रं नानापुण्यकथायुतम् !। ( १ ब्रह्मपुराण में १०००० श्लोक )
२८० रामायणमीमांसा अष्टम पाद्मं च पञ्चपञ्चाशत्सहस्राणि निगद्यते । ( २ पाद्म में ५५००० श्लोक ) तृतीयं वैष्णवं नाम त्रयोविंशतिसंख्यया । ( ३ वैष्णव में २३००० श्लोक ) चतुर्थं वायुना प्रोक्तं वायवीयमिति स्मृतम् । शिवभक्तिसमायोगाच्छैवं तच्चापराख्यया ॥ चतुर्विंशतिसंख्यातं सहस्राणि तु शौनक । ( ४ वायुपुराण में २४००० श्लोक ) चतुर्भिः पर्वभिः प्रोक्तं भविष्यं पञ्चमं तथा । चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च ॥ ( ५ भविष्य १४५०० श्लोक ) मार्कण्डं नवसाहस्रं षष्ठं तत्परिकीर्तितम् ॥ ( ६ठा मार्कण्डेय ९००० श्लोक ) आग्नेयं सप्तमं प्रोक्तं सहस्राणि तु षोडश । ( ७वां आग्नेय १६००० श्लोक ) अष्टमं नारदीयं तु प्रोक्तं वै पञ्चविंशतिः । ( ८ वां नारदीय २५००० श्लोक ) नवमं भागवतं नाम भागद्वयविभूषितम् । तत्राष्टादश साहस्रं प्रोच्यते ग्रन्थसंख्यया । ( ९वां भागवत १८००० श्लोक ) दशमं ब्रह्मवैवर्तं तावत्संख्यमिहोच्यते । ( १०वां ब्रह्मवैवर्त १८००० श्लोक ) लैङ्गमेकादशं ज्ञेयं तथैकादशसंख्यया । भागद्वयविरचितं तल्लिङ्गमृषिपुङ्गव ॥ ( ११ वां लैङ्ग ११००० श्लोक ) चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं द्वादशं विदुः ॥ ( १२ वां वाराह २४००० श्लोकं ) विभक्तं सप्तभिः खण्डैः स्कान्दं भाग्यवतांवर । तदेकाशीतिसाहस्रं संख्यया वै निरूपितम् ॥ ( १३ वां स्कान्द ८१००० श्लोक ) ततस्तु वामनं नाम चतुर्दशतमं स्मृतम् । संख्यया दशासाहस्रं प्रोक्तं कुलपते पुरा ॥ ( १४ वां वामन पुराण १०००० श्लोक ) कौर्मं पञ्चदशं प्राहुर्भागद्वयविभूषितम् । दशसप्तसहस्राणि पुरा संख्यायते कलौ ॥ ( १५ वां कौर्म १७००० श्लोक ) मात्स्यं मत्स्येन यत्प्रोक्तं मनवे षोडशं क्रमात् । तच्चतुर्दशसाहस्रं संख्यया वदतांवर ॥ ( १६ वां मत्स्य १४००० श्लोक ) गारुडं सप्तदशमं स्मृतं चैकोनविंशतिः । ( १७ वां गारुड १९००० श्लोक ) अष्टादशं तु ब्रह्माण्डं भागद्वयविभूषितम् । तच्च द्वादशसाहस्रं शतमष्टसमन्वितम् ॥ ( १८ वां ब्रह्माण्ड १२८०० श्लोक ) यहाँ पुराणों को ब्रह्मप्रोक्त कहा गया है । इदं ब्रह्मपुराणस्य सुलभं सौरमुत्तमम् । संहिंताद्वयसंयुक्तं पुण्यं शिवकथाश्रयम् ॥ आद्या सनत्कुमारोक्ता द्वितीया सूर्यभाषिता । सनत्कुमारनाम्ना हि तद्विख्यातं महामुने ॥ द्वितीयं नारसिंहं च पुराणे पाद्मसंज्ञिते । शौनकेयं हि तृतीयं पुराणे वैष्णवे मतम् ॥ बार्हस्पत्यं चतुर्थं च वायव्यं सम्मतं सदा । दौर्वाससं पञ्चमं च स्मृतं भागवते सदा ॥
भविष्ये नारदोक्तं च सूरिभिः कथितं पुरा । कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम् ॥ ब्रह्माण्डं वारुणं चाथ कालिकाद्वयमेव च । माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसञ्चयम् ॥ पराशरं भागवतं कौर्मं चाष्टादशं क्रमात् । एतान्युपपुराणानि मयोक्तानि यथाक्रमम् ॥ ( स्कन्दपुराण रेवाखण्ड उत्तरार्ध १ ) “पुराणमेकमेवासीत् सर्वकालेषु मानद । चतुर्वर्गस्य बीजं च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः ॥ हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ॥ तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ अस्त्येव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते । ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च वायवीयं तथैव च ॥ भागवतं नारदीयं मार्कण्डेयं च कीर्तितम् । आग्नेयं च भविष्यं च ब्रह्मवैवर्तलिङ्गके ॥ वाराहं च तथा स्कान्दं वामनं कूर्मसंज्ञकम् । मात्स्यं च गारुडं तद्वद् ब्रह्माण्डाख्यमिति त्रिषट् ॥” ( बृह० ना० पु० पूर्वभाग ९२।२२-२८ ) ऊपर के वचनों में कहा गया है कि चतुर्वर्ग का बीज शतकोटिप्रविस्तर पुराण पहले एक ही था । उसी से सब शास्त्रों की प्रवृत्ति हुई है । युगह्रास से सामान्य मेधावाले पुरुषों के लिए उनका ग्रहण करना असंभव जानकर भगवान् हरि व्यासरूप में प्रकट होकर प्रति द्वापर में चतुर्लक्ष श्लोकात्मक १८ पुराणों को भूलोक में प्रकट करते हैं । देवलोक में अब भी पुराण शतकोटिप्रविस्तर ही है । उसका सार ही १८ पुराणों में वर्णित है । “ब्राह्मं पुराणं प्रथमं द्वितीयं पाद्ममुच्यते । तृतीयं वैष्णवं चैव चतुर्थं शैवमुच्यते ॥ अथ भागवतं प्रोक्तं पञ्चमं षष्ठमुच्यते । भविष्यं नारदीयं च सप्तमं परिकीर्तितम् ॥ मार्कण्डेयमिति प्रोक्तमष्टमं नवमं तथा । आग्नेयं ब्रह्मवैवर्तं दशमं परिकीर्तितम् ॥ लैङ्गं च वामनं चैव स्कान्दं मात्स्यमथैव च । कौर्मं वाराहमुदितं गारुडं वाथ कीर्तितम् ॥ ब्रह्माण्डमित्यष्टादश पुराणानि विदुर्बुधाः ।
तथा चोपपुराणानि कथयिष्याम्यतः परम् ।। आद्यं सनत्कुमाराख्यं नारसिंहमतः परम् । तृतीयमाण्डमुद्दिष्टं दौर्वासमेव च ।। नारदीयमथान्यच्च कापिलं मानवं तथा । तद्वदौशनसं प्रोक्तं ब्रह्माण्डं च ततः परम् ।। वारुणं कौलिकाव्हानं माहेशं साम्बमेव च । सौरं पाराशरं चैव मारीचं भार्गवाह्वयम् ।। कौमारं च पुराणानि कीर्तितान्यष्ट वै दश ।” ( पद्मपु० पातालखण्ड ११५।८९-९७ ) ऊपर के श्लोकों में पुराणों के क्रम दिये गये हैं। कल्पभेद से क्रम में भेद भी हो जाता है, अतः श्रीमद्भागवत के अनुसार श्रीभागवत १८वां पुराण है। परन्तु ऊपर भागवत को पाँचवाँ कहा गया है। “अष्टादश पुराणानि यो वेत्ति हरिरेव हि ।। सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ।। ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा । भविष्यं नारदीयं च स्कान्दं लैङ्गं वराहकम् ।। मार्कण्डेयं तथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च । कौमं मात्स्यं गारुडञ्च वायवीयमनन्तरम् ।। अष्टादशं समुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति संज्ञितम् । अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कथितानि तु । आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहमथापरम् ।। तृतीयं स्कान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् । चतुर्थं शिवधर्माख्यं स्यान्नन्दीश्वरभाषितम् ।। दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदोक्तमतः परम् । कापिलं वामनं चैव तथैवोशनसेरितम् ।। ब्रह्माण्डं वारुणञ्चाथ कालिकाव्हयमेव च । माहेश्वरं तथा साम्बमेवं सर्वार्थसञ्चयम् ।। पराशरोक्तमपरं मारीचं भार्गवाह्वयम् ।” ( ग० पु० २१५।१३-२१ ) उपर्युक्त वचनों में भी पुराणों और उपपुराणों की गणना की गयी है। ऐसे ही अन्य पुराणों में भी पुराणों की गणना की गयी है । कहीं कहीं नामों और पुराणत्व, उपपुराणत्व आदि में परिलक्षित भेद कल्पभेद से समाहित होते हैं। इसी तरह देवीभागवत में भी पुराणों का वर्णन है। शृण्वन्तु संप्रवक्ष्यामि पुराणानि मुनीश्वराः । यथाश्रुतानि तत्त्वेन व्यासात् सत्यवतीसुतात् ॥ मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम् । अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि पृथक् पृथक् ॥
ध्याय अवतार-सामग्री २८३ चतुर्दशसहस्रं च मात्स्यमाद्यं प्रकीर्तितम् । तथा ग्रहसहस्रंतु मार्कण्डेयं महाद्भुतम् ॥ चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्च शतानि च । भविष्यं परिसंख्यातं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ४ ॥ अष्टादशसहस्रं वै पुण्यं भागवतं किल । तथा चायुतसंख्याकं पुराणं ब्राह्मसंज्ञकम् ॥ द्वादशैव सहस्राणि ब्रह्माण्डं च शताधिकम् । तथाष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमेव च ॥ अयुतं वामनाख्यं च वायव्यं षट्शतानि च । चतुर्विंशतिसंख्यातः सहस्राणि तु शौनक ॥ त्रयोविंशतिसाहस्रं वैष्णवं परमाद्भुतम् । चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं परमाद्भुतम् ॥ षोडशैव सहस्राणि पुराणं चाग्निसंज्ञकम् । पञ्चविंशतिसाहस्रं नारदं परमं मतम् ॥ ९
तस्माद्भूतं भविष्यच्च वर्तमानमपि द्विजाः। वदन्ति सूक्ष्मं शास्त्राणि तेषु शङ्कां न कारयेत् ॥ (का० के० मा० १५।९-१०) काशीकेदारमाहात्म्य में कहा गया है कि वेद, आगम, पुराण, इतिहास आदि सभी युगों के अनुसार अनादि हैं, भगवान् के श्वासस्वरूप हैं। कभी वे मलिन कभी विशद होते हैं और वे भगवान् की प्रपञ्च-लीला का वर्णन करते हैं। उनमें भूत, भविष्य तथा वर्तमान का वर्णन होता है, अतः उनमें शङ्का नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार अन्य पुराणों और उपपुराणों में भी पुराणों तथा उपपुराणों के नाम एवं उनकी श्लोकसंख्या तथा कहीं कहीं अनुक्रमणिका भी निर्दिष्ट है। इससे पुराणों का प्रामाण्य सिद्ध होता है। यदि कोई पुराण किसी आधुनिक वञ्चक द्वारा रचित होता तो अन्य पुराणों में उसका उल्लेख कैसे होता ? सभी को वञ्चक कहना तो किसी वञ्चक के लिए ही सम्भव है। प्रमाणरूप से आदृत इन अनेक ग्रन्थों में विभक्त अष्टलक्षाधिक श्लोकों का निर्माण करनेवाले लोग निर्माता के रूप में नाम न देते यह सर्वथा असम्भव ही है। अतः पाश्चात्यों तथा उनके अनुयायी भारतीयों की पुराणसम्बन्धी कालकल्पना सर्वथा अप्रामाणिक ही है। योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण को बुल्के १७४ वें अनुच्छेद में साम्प्रदायिक रामायण कहते हैं। इनका भी रचनाकाल एम्. विंटरनित्स तथा एस. एन्. दास गुप्ता ८वीं शती मानते हैं। डाक्टर वी. राघवन् ११वीं शती इनका रचनाकाल मानते हैं। यह कम से कम योगवासिष्ठ के तो सर्वथा विरुद्ध ही हैं। जिस ग्रन्थ के काल का विचार किया जाय यदि उसके कथन की उपेक्षा कर मनमाने ढङ्ग से काल का निर्णय किया जाने लगे तो किसी भी ग्रन्थ का मनमाना काल निर्धारित किया जा सकता है। योगवासिष्ठ के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ही उक्त ग्रन्थ के रचयिता हैं। ऐसी स्थिति में जो काल उन महर्षि का है वही योगवासिष्ठ का भी काल है। विंटरनित्स के अनुसार योगवासिष्ठ शङ्कराचार्य के अनुयायियों की कृति है। भीखनलाल आत्रेय के अनुसार ७वीं से ८वीं शती में उसकी उत्पत्ति हुई है। भर्तृहरि के वाक्यपदीय के एवं योगवासिष्ठ के कुछ श्लोक परस्पर मिलते जुलते हैं। भर्तृहरि का काल ७वीं शती माना जाता है। इस दृष्टि से भी कम से कम ई० सन् ६०० योगवासिष्ठ का रचनाकाल है। परन्तु यह सब वस्तुतः पाश्चात्य प्रभाव हैं। पाश्चात्य लोग संसार भर के सभी ग्रन्थों को हजार पन्द्रह सौ वर्ष के भीतर लाने का प्रयास करते हैं। योगवासिष्ठ के टीकाकार आनन्दबोधेन्द्रसरस्वती तथा अन्वयारण्य आत्मसुख, गङ्गाधरेन्द्र सरस्वती आदि भी १६वीं शती के आसपास के हैं। मुकुन्द्यति के शिष्य रामवनस्वामी की व्याख्या योगवासिष्ठ पर है, वे १४वीं शती से पहले के हैं। उनकी रामार्चनचन्द्रिका का उल्लेख निर्णयसिन्धु आदि निबन्धग्रन्थों में किया गया है। मधुसूदनसरस्वती १६वीं शती के आचार्य हैं। उनके सिद्धान्तबिन्दु तथा संक्षेपशारीरकव्याख्या में तथा गीताव्याख्या में योगवासिष्ठ के श्लोकों का उद्धरण है। गीता के ६-३२ तथा ३६वें श्लोकों की व्याख्या में योगवा- सिष्ठ के बहुत श्लोकों का उल्लेख हुआ है। 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' की टीका में “वासिष्ठविष्णुपुराणादिषु रुसिष्ठ- पराशरादिभिर्बहुधा गीतम् ।” श्रीधरस्वामो ने गीता की सुबोधिनी टीका में योगवासिष्ठ के श्लोकों का उद्धरण किया है। काश्मीरी विद्वान् गौड़ अभिनन्दी ने, जो ९वीं शती के थे, योगवासिष्ठसार नाम का ग्रन्थ लिखा है। आद्य श्रीशङ्कराचार्य ने श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्य में लिखा है— “तथा च—वासिष्ठयोगशास्त्रे प्रश्नपूर्वकं दर्शितम् । तथात्मा निर्गुणः शुद्धः सदानन्दोऽजरोऽमरः ॥” इत्यादि चार श्लोक उन्होंने उद्धृत किये हैं। सनत्सुजातीयभाष्य में भी १।१५ से आद्यशङ्कराचार्य कहते हैं—“तथा चाह भगवान् वसिष्ठः—
अध्याय अवतार-सामग्री २८५ चतुर्वेदोऽपि यो विप्रः सूक्ष्मं ब्रह्म न विन्दति । वेदभारभराक्रान्तः स वै ब्राह्मणगर्दभः ॥” ३१ वें श्लोक में “तथा चाह भगवान् वासिष्ठः— यन्न सन्तं न चासन्तम् ॥” श्वेताश्वतर उपनिषद् शङ्कराचार्य का प्रधान ग्रन्थ है। शङ्करदिग्विजय में माधवाचार्य ने कहा है— “सन्तत्सुजातीयमसत्सु दूरं ततो नृसिंहस्य च तापनीयम् ॥” विवेकचूडामणि, लघुवाक्यादि में भी योगवासिष्ठ के भाव हैं । भारतीय परम्परा के अनुसार आद्यशङ्करा- चार्य का काल विक्रम से कई शती पूर्व है । फिर योगवासिष्ठ उनसे भी पहले का है ही । इसके अनुसार वसिष्ठ रामचन्द्र को मोक्षप्राप्ति पर विस्तृत उपदेश करते हैं । इस संवाद को वाल्मीकि अरिष्टनेमि को सुनाते हैं । अगस्त्य ने उसी का उपदेश सुतीक्ष्ण के लिए दिया है । योगवासिष्ठ में भी राम विष्णु के अवतार बताये गये हैं । वस्तुतः रामायण में वेद के पूर्वकाण्ड का ही उपबृंहण हं । वेद के उत्तरकाण्ड वेदशीर्ष वेदान्त का उपबृंहण योगवासिष्ठ या महारामायण में किया गया है। मर्यादापुरुषोत्तम राम ने जैसे वेद के पूर्वकाण्ड का स्वयं आचरण कर आदर्श उपस्थित करके लोकशिक्षा दी उसी तरह तीर्थयात्रा, परमवैराग्य एवं उत्तम मुमुक्षा से युक्त होकर उत्तम जिज्ञासु हो गुरुपसदनपूर्वक वेदान्तों के श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा तत्त्वसाक्षात्कार के सम्पादन का भी आदर्श उपस्थित कर लोकशिक्षा दी थी । इसी प्रकार अध्यात्मरामायण को भी साम्प्रदायिक एवं आधुनिक कहना वास्तविकता का अपलाप है, यह पीछे कहा जा चुका है। अध्यात्मरामायण और श्रीमद्भागवत ये दोनों ग्रन्थ रामचरितमानस के प्रमुख आधार हैं। अध्यात्मरामायण में राम को परब्रह्म, सीता को लक्ष्मी तथा लक्ष्मण को शेष कहा गया है। उसमें राम को विष्णु का अवतार भागवत का अनुकरण कर नहीं कहा गया है, किन्तु जन्म-समय में राम ने कौशल्या को विष्णुरूप में जो दर्शन दिया था उस वस्तुस्थिति के अनुसार ही कहा गया है। अहिल्योद्धार के अनन्तर केवट का वृत्तान्त दिया गया है। यौवराज्य अभिषेक के पूर्व राम-नारद-संवाद तथा मन्थरा में सरस्वती का प्रवेश बताया गया है। रामनाम- महिमा के वर्णन प्रसङ्ग में वाल्मीकि की आत्मकथा, मायामयी सीता के हरण का वृत्तान्त, लक्ष्मण का द्वादशवर्ष तक उपवास, सेतुबन्ध रामेश्वर की स्थापना, कालनेमि का वृत्तान्त, रावण का शुक्र के परामर्श से यज्ञानुष्ठान करना और अङ्गद के द्वारा उसका भङ्ग किया जाना, रावण की नाभि में अमृत का होना, भगवत्पदप्राप्ति के उद्देश्य से रावण के द्वारा सीताहरण आदि इसकी विशेष कथाएँ हैं। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण में राम के माधुर्यप्रधान स्वरूप का वर्णन है। अध्यात्मरामायण में ऐश्वर्यप्रधान स्वरूप का वर्णन है। भक्ति-सिद्धान्त में माधुर्य- प्रधान रूप का बड़ा महत्त्व है। उसमें लौकिक रूप का ही अधिकांश प्राकट्य होता है। रागानुगा स्वारसिकी प्रीति होती है । ऐश्वर्यप्रधान रूप में वह भक्ति नहीं हो पाती । एक माता अपने बालक में स्वाभाविक जितना स्नेह या प्यार कर सकती है उतना ईश्वर में नहीं कर सकती है, क्योंकि ऐश्वर्य में भय, संकोच आदि के कारण उद्दाम ममता और स्नेह नहीं बन पाता । यदि यशोदा कृष्ण को ब्रह्म या परमेश्वर समझती तो मृत्तिका-भक्षण के प्रसङ्ग से कृष्ण को उलूखल में बाँधने की हिम्मत कदापि नहीं कर सकती । इसी लिए मृद्भक्षण के प्रसङ्ग में मैंने मिट्टी नहीं खायी । ग्वालबाल सब मिथ्या बोलते हैं। तुझे विश्वास नहीं है तो मेरा मुंह देख ले, कृष्ण के यह कहने पर जब यशोदा ने मुख खोलने को कहा, तब श्रीकृष्ण ने माँ के भय से मुँह खोल दिया । उसके भीतर सूर्य, चन्द्र, भूधर, सागर आदि सारे विश्व को देखकर उसने निश्चय कर लिया कि यह तो साक्षात् परब्रह्म है। यह मेरा पुत्र है, मैं माँ हूँ यह कल्पना मोहमूलक है। भगवान् ने फिर से अपनी मोहनी वैष्णवी माया फैलाकर माता यशोदा के ज्ञान को आवृत कर दिया,