भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 329

२५२ रामायणमीमांसा अष्टमं महाभारत ( १२।३२६।७७ ), हरिवंश पु० ( १।४१।११२-१२० ) तथा विष्णुपुराण ( १।९।१४३ ) में उनको विष्णु का अवतार माना गया है ।" वस्तुतः उक्त सभी ग्रन्थ प्रामाणिक हैं । उनमें कहीं भी किसी अवतार की चर्चा है तो वह प्रामाणिक है । निष्कर्षरूप में सभी विष्णु के अवतार हैं, पर इन पृथक्-पृथक् उक्तियों से अवतारों के विकास की बात सिद्ध नहीं होती । अतः बुल्के का यह निष्कर्ष कि "ब्राह्मणों में तथा अन्य प्राचीन साहित्यों में अवतारवाद विद्यमान है, किन्तु उक्त ग्रन्थों के रचनाकाल में न तो अवतारों की कोई विशेष पूजा की जाती थी और न उनमें विष्णु का प्राधान्य ही था" सर्वथा असङ्गत है । प्रजापति तथा विष्णु का विभिन्न यज्ञों में देवताओं के रूप में उल्लेख है ही । कई स्थलों में इन्द्र और विष्णु का साथ-साथ देवतात्व है, कहीं विष्णु का ही प्राधान्य भी । पीछे दिखलाया जा चुका है कि विष्णु की पूज्यता से ही उनसे अभिन्न अवतारों की पूज्यता सिद्ध होती है। वस्तुतः जैसे अग्निहोत्र, ज्योतिष्टोम आदि कर्मों का ज्ञान और अनुष्ठान किसी एक ग्रन्थ पर आश्रित नहीं होता, वह तो मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र तीनों का समन्वय करके ही समझा जा सकता है । केवल मन्त्र या ब्राह्मण के आधार पर उनका अनुष्ठान नहीं हो सकता । इतना ही क्यों, तीनों के आधार पर बनी हुई परम्पराप्राप्त पद्धतियों के आधार पर ही ज्योतिष्टोमादि का प्रयोग हो सकता है। इसी तरह मन्त्रों, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों तथा रामायण, भारत, पुराणों एवं आगमों के आधार पर बने पूजाविधानों के आधार पर ही राम, कृष्ण आदि की आराधनाएँ होती हैं, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि इनकी पूजा पहले नहीं होती थी, विकास-क्रम के बाद में चल पड़ी । "अतएव कृष्णावतार के साथ-साथ अवतारवाद के विकास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन प्रारम्भ हुआ । उस समय से लेकर अवतारवाद भक्ति-भाव से ओत-प्रोत होने लगा ।" बुल्के का यह कथन भी निराधार है, क्योंकि महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों से ही कृष्णावतार की सामग्री प्राप्त होती है और उन्हीं ग्रन्थों में विष्णु की, राम आदि की भक्ति की भी चर्चा है ही। रामतापनीय, गोपालतापनीय आदि उपनिषदों में भी राम, कृष्ण आदि अवतारों की भक्ति एवं पूजा आदि का उल्लेख है । यह कहना सर्वथा निराधार है कि "वासुदेव कृष्ण भागवतों के इष्ट देव थे । प्रारम्भ में उनका विष्णु से कोई सम्बन्ध नहीं था ।" यह भी कहना गलत है, "तीसरी शती ई० पू० में वासुदेव और कृष्ण की अभिन्नता की भावना उत्पन्न हुई । बौद्ध धर्म तथा भागवत साम्प्रदाय का भक्तिमार्ग दोनों समानरूप से ब्राह्मण-साहित्य, कर्मकाण्ड तथा यज्ञप्रधान धर्म की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न और विकसित हुए । इसके फलस्वरूप धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों का एकाधिकार लुप्त हो गया था । बौद्ध-धर्म का अधिकाधिक प्रसार देखकर ब्राह्मणों ने भागवतों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण को विष्णु नारायण का अवतार मान लिया । इससे अवतारवाद को बहुत प्रोत्साहन मिला । साथ ही साथ विष्णु का भो महत्त्व बढ़ने लगा । इस तरह अवतारवाद की सारी भावना धीरे- धीरे विष्णु नारायण में केन्द्रित होने लगी और वैदिक साहित्य के अन्य अवतारों के कार्य विष्णु में ही आरोपित हुए," क्योंकि उक्त कल्पना को सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है । बौद्ध धर्म वैदिक धर्म का प्रतिक्रियारूप था । इसमें तो प्रमाण बौद्ध ग्रन्थ ही है । बुद्ध तथा बौद्धों ने प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं । आगम प्रमाण नहीं माना । फलतः उनके मत में वेदों की मान्यता नहीं है । बौद्ध बुद्ध को ही सर्वज्ञ मानकर बुद्ध-वचन को ही धर्म में प्रमाण मानते हैं । सुतरां वे लोग वैदिक नित्यात्मवाद तथा यज्ञ, याग आदि विशेषतः पश्वादिसमवेत यज्ञ के विरोधी थे । वे जन्मना जाति नहीं मानते थे । सुतरां ब्राह्मण जाति का भी उनकी दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं था । परन्तु भागवत भी ऐसे थे यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भगवान् वासुदेव ने महाभारत तथा गीता में वेद का, आत्मा का तथा वैदिक धर्मों का महत्त्व वर्णन किया है। ऐसी स्थिति में कृष्णभक्त वेद, यज्ञ आदि का विरोधी कैसे हो सकता था ?