भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 328

परम्पराप्राप्त हैं। जैसे वेदों में शाखाभेद से सभी पाठभेद प्रामाणिक हैं। सप्तशती के परम्पराप्राप्त सभी पाठ प्रामाणिक हैं। वही स्थिति रामायण के पाठ-भेदों की भी है। महाभारत में कूर्मराज से देवताओं ने और असुरों ने मन्दराचल का आधार बनने को कहा। परन्तु जब तैत्तिरीय आरण्यक में ही कूर्म को प्रजापति ईश्वर का अवतार कहा गया है तब उन कूर्मराज को प्रजापति के अवतारभूत कूर्म से अभिन्न ही मानना स्वाभाविक है। यदि वेदों और आर्ष ग्रन्थों का प्रामाण्य न माना जाय तब तो किसी कच्छप से देवताओं द्वारा प्रार्थना और उसके द्वारा मन्दराचल का धारण आदि सिद्ध ही नहीं हो सकता। उस स्थिति में यह सब कुछ पागल का प्रलापमात्र समझा जायगा । महाभारत एवं विष्णुपुराण का समन्वय करने से भी यही निष्कर्ष निकलता है। महाभारत का प्रजापति विष्णुरूप ही है। महाभारत के वचन में 'मत्परं नाधिगम्यते' कहा गया है। जिससे स्पष्ट है कि वह प्रजापति वेदान्तवेद्य ब्रह्म ही है। वही विष्णु भी हैं। 'अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा' इत्यादि का श्लोकार्थ यों है—मैं सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रह्मा हूँ। मुझसे पर (उत्कृष्ट) कोई भी प्रमाण से ज्ञात नहीं है। मैंने ही मत्स्यरूप से महान् भय से तुम देवताओं की रक्षा की थी। विष्णुपुराण के वचन का अर्थ निम्नोक्त है। जगत् का प्रलय होने पर 'तोयान्तःस्थां महीं ज्ञात्वा' अनुमान से पृथ्वी को जल के भीतर जानकर उसका उद्धार करने की कामना से प्रजापति ने पूर्व कल्पों के समान ही मत्स्य, कूर्म आदि के समान वराहरूप धारण किया। पूर्वोक्त दृष्टि से ही विष्णुपुराण में विष्णु तथा ब्रह्मस्वरूप नारायण एवं ब्रह्मा के साथ अभिन्नता कही गयी है, अतएव मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के ही अवतार हैं। आप कहते हैं विष्णु का महत्त्व बढ़ जाने से प्रजापति के अवतार मत्स्य, कूर्म आदि विष्णु के माने जाने लगे ? पर यह कल्पना सर्वथा निराधार है। किसी की इच्छा या भावना से विष्णु का महत्त्व घटता अथवा बढ़ता नहीं है। शास्त्रों के आधार पर ही विष्णु का महत्त्व है। विष्णुपुराण, हरिवंशपुराण तथा महाभारत में विष्णु का खूब महत्त्व भी कहा गया है और उन्हीं ग्रन्थों में प्रजापति के अवतारों में मत्स्य, कूर्म आदि का वर्णन भी है। अतः कब से क्यों किस प्रमाण से विष्णु का महत्त्व बढ़ा ? यह कहना और सिद्ध करना असम्भव ही है। महाभारत तथा हरिवंश में बुल्के के अनुसार भी वराह तथा विष्णु का सम्बन्ध माना गया है। वस्तुतः हेमाद्रि, पराशरमाधव, मिताक्षरा, निर्णयसिन्धु आदि में जैसे मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक, विविध स्मृतियों, पुराणों और आगमों का समन्वय करके ही निष्कृष्ट अर्थ निकाला जाता है वैसे ही अवतारों और रामकथाओं के सम्बन्ध में भी सबका समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। जब महाभारत, हरिवंश तथा विष्णुपुराण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थों में प्रजापति और विष्णु को एक मानकर मत्स्यादि अवतारों और राम और कृष्ण को विष्णु के अवतार कहा ही जा रहा है तब हठधर्मी के कारण वाल्मीकिरामायण में राम को अवतार बतलानेवाले अंशों को क्षेपक कहने में क्या तुक है ? १४१ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, "वामनावतार और नृसिंहावतार प्रारम्भ से विष्णु से ही सम्बन्ध रखते हैं। वामनावतार का उल्लेख तैत्तिरीयसंहिता (२।१।३।१), शतपथब्राह्मण (१।२।५।५), तैत्तिरीयब्राह्मण (१।७।१७) एवं ऐतरेयब्राह्मण (६।३।७) में हुआ है। यह अवतार ऋग्वेद की एक कथा से विकसित माना जाता है (दे० ऋ० सं० १।२२) और शतपथब्राह्मण (१।२।५।१) । नारायणीय उपाख्यान महाभारत (१२।३२६।७५) तथा हरिवंश (१।४१) में इसका विष्णु के अन्य अवतारों के साथ उल्लेख हुआ है। नृसिंहावतार की कथा पहले पहल तैत्तिरीय आरण्यक के परिशिष्ट (१०।१।६) में मिलती है। नारायणीय उपाख्यान महाभारत (१२।३२६।७३ और ३३७।३६) तथा हरिवंशपु० (१।४१) में इसका उल्लेख है। परशुराम विष्णु के अवतार का प्रारम्भिक कथाओं में उल्लेख नहीं है। उदाहरणार्थ महाभारत (३।११५-११७), किन्तु नारायणीय उपाख्यान