रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० रामायणमीमांसा अष्टम
मन्थानं मन्दरं कृत्वा तथा नेत्रं च वासुकिम् । देवा मथितुमारब्धाः समुद्रं निधिमम्भसाम् ॥” ( म० भा० १।१८।११-१३ ) महाभारत के उपर्युक्त वचनों में कूर्मावतार का वर्णन है। देवताओं की प्रार्थना से उस कूर्म ने अपने पृष्ठ पर मन्दराचल को धारण किया था जिसको मन्थान दण्ड बनाकर देवताओं एवं असुरों ने समुद्रमन्थन किया था। निम्नोक्त वचनों में परशुराम आदि अवतारों का वर्णन है— “त्रेतायुगे भविष्यामि रामो भृगुकुलोद्भवः । क्षत्रं चोत्सादयिष्यामि समृद्धबलवाहनम् ॥ सन्ध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च। अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः॥ द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके । प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मंथुरायां भविष्यति ॥ हंसः कूर्मश्च मत्स्यश्च प्रादुर्भावा द्विजोत्तम । वराहो नरसिंहश्च वामनो राम एव च ॥ रामो दाशरथिश्चैव सात्वतः कल्किरेव च । यदा वेदश्रुतिर्नष्टा मया प्रत्याहृता पुनः॥ सवेदाः सश्रुतीकाश्च कृताः पूर्वं कृते युगे । अतिक्रान्ताः पुराणेषु श्रुतास्ते यदि वा क्वचित् ॥” ( म० भा० १२।३३९।८४-८९; १०१-१०५ ) “जन्माद्यस्य यतः” ( ब्र० सू० १।१।२), “प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ।” ( ब्र० सू० १।४।२३ ) इत्यादि ब्रह्मसूत्रों से सम्पूर्ण जगत् के अभिन्न निमित्तोपादान कारण को ब्रह्म कहा गया है। उपनिषदों, मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं आरण्यकों में जहाँ कहीं भी जिसमें उक्त लक्षण घटता हो वह चाहे जिस नाम से व्यपदिष्ट हो उसे ब्रह्म ही समझना चाहिये। इसी लिये “आकाशस्तल्लिङ्गात्” ( ब्र० सू० १।१।२२ ), “प्राणस्तथानुगमात्” ( ब्र० सू० १।१।२८ ), “अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्” ( ब्र० सू० १।१।२४ ) इत्यादि सूत्रों में आकाश, प्राण तथा आदित्यमण्डलस्थ पुरुष को ब्रह्म ही कहा गया है, क्योंकि श्रुतिप्रमाण से उनमें जगत्कारणता सिद्ध है। इस दृष्टि से प्रकृत में विष्णु और प्रजापति अभिन्न ही तत्त्व हैं । अतएव वाल्मीकिरामायण में प्रजापति नाम का निर्देश न होकर ब्रह्म का उल्लेख हुआ है। दक्षादि प्रजापति अवान्तर प्रजापति होते हैं। मुख्य प्रजापति ब्रह्मा ही होता है। वही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का हेतु होता है। वह यद्यपि एक ही है तो भी कार्य भेद से उसके पृथक्-पृथक् भी नाम होते हैं। उत्पादक ब्रह्मा, पालक विष्णु एवं संहारक रुद्र या शिव कहे जाते हैं। इस दृष्टि से प्रजापति ईश्वर या महाविराट् त्रिमूर्ति होता है। त्रिमूर्ति में भी विष्णु की प्रधानता होने से इन शब्दों द्वारा विष्णु का ही उल्लेख हुआ है। स्वयम्भू ब्रह्मा का देवताओं के साथ आविर्भाव हुआ और उन्होंने वाराह रूप धारण कर पृथ्वी का उद्धार किया। पूर्वापर के सभी ग्रन्थों के समन्वित निष्कर्ष से यह सिद्धान्त सिद्ध होता है कि भगवान् विष्णु ही शतपथ, तैत्तिरीय, काठक आदि में प्रजापति, ब्रह्म आदि शब्दों से उक्त हैं और उन्हीं से मत्स्य, कूर्म, वराह आदि अवतार हुए । हर ग्रन्थ में हर बात का निरूपण सम्भव नहीं होता, अपने-अपने अनुसार हि कोई ग्रन्थ मत्स्यावतार का एवं कोई वराहावतार का वर्णन करते हैं। रामायण का कोई पाठ परवर्ती नहीं है। सभी पाठ प्रामाणिक एवं