रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय अवतार-सामग्री “मनवे ह वै प्रातः। अवनेज्यमुदकमाजह्रर्यथेदं पाणिभ्यामवनेजनायाहरन्त्येवं तस्यावने- निजानस्य मत्स्यः पाणी आपेदे ॥१॥ स हास्मै वाचमुवाद। बिभृहि मा पारयिष्यामि त्वेति कस्मान्मा पारयिष्यसीत्यौघ इमाः सर्वाः प्रजा निर्वोढा ततस्त्वा पारयिताऽस्मीति। कथं ते भृतिरिति ॥२॥ स होवाच। यावद्वै क्षुल्लका भवामो बह्वी वै नस्तावन्नाष्ट्रा भवत्युत मत्स्य एव मत्स्यं गिलति कुम्भ्यां माग्रे बिभरासि स यदा तामतिवर्धा अथ कर्षू खात्वा तस्यां मा बिभरासि स यदा तामतिवर्धा अथ मा समुद्रम- भ्यवहरासि तर्हि वा अतिनाष्ट्रो भवितास्मीति ॥३॥ शश्वद्ध झष आस। स हि ज्येष्ठं वर्धतेऽथेतिथीं समां तदौघ आगन्ता। तन्मा नावमुप कल्प्योपासासे स औघ उत्थिते नावमापद्यासै ततस्त्वा पारयितास्मीति ।” (श० ब्रा० १।८।१।१-४) उपर्युक्त वचनों में कहा गया हैं कि मनु ने अवनेजन के लिए दोनों हाथों में जल लिया तो उसमें एक मत्स्य आ गया और उसने मनु से कहा, 'मेरी रक्षा करो, मैं प्रजा सहित तुम्हें प्रलय के महौघ से पार करूँगा।' तब मनु ने कहा 'कैसे तुम्हारा भरण हो ?' तो मत्स्य ने कहा जब तक मत्स्य छोटे रहते हैं तभी तक उनके नाश का भय रहता है। एक मत्स्य ही दूसरे मत्स्य का भक्षण करता है, अतः कुम्भी में रखकर मेरा पालन करो। मनु ने कुम्भ में मत्स्य को रखा।” जब वह अधिक बढ़ गया तो उसने कहा, “बड़ा कर्षू 'सरोवर' बनाकर हमें उसमें रखो।” मनुजी ने वैसा ही किया। जब उससे भी अधिक बढ़ गया तब उसने कहा, "अब समुद्र में मुझे रखो।” तब मनु ने समुद्र में रख दिया। मत्स्य अत्यधिक बढ़ गया और उसने मनु से कहा, “अमुक समय में महौघ आयेगा तब नौका की कल्पना कर उसमें आरूढ़ होना। मैं पार करूँगा।” “तमेवं भृत्वा समुद्रमभ्यवजहार। स यतिथीं तत्समां परिदिदेश ततिथीं समां नावमुपकल्प्योपा- सांचक्रे। स औघ उत्थिते नावमापेदे। तं स मत्स्य उपन्यापुप्लुवे तस्य शृङ्गे नावः पाशं प्रतिमुमोच तेनैत- मुत्तरं गिरिमधिदुद्राव ॥५॥ स होवाच अपीपरं वै त्वा वृक्षे नावं प्रतिबध्नीष्व तं तु त्वा मा गिरौ सन्तमुदकमन्तश्छेत्सीद्यावदुदकं समवायात्तावत्तावदन्ववसर्पासीति । स ह तावत्तावदेवान्ववसर्प तदप्येत- दुत्तरस्य गिरेर्मनोरवसर्पणमित्यौघो ह ताः सर्वाः प्रजा निरुवाहायेह मनुरेवैकः परिशिशिषे ॥६॥” (श० ब्रा० १।८।१।५,६) मनु ने समुद्र में मत्स्य को डाल दिया। जितने दिनों में महौघ आने को मत्स्य ने कहा था उतने ही दिनों में महौघ आया। मनु ने पृथिवी को नाव बनाकर उसमें स्थान प्राप्त किया और उसी मत्स्य के शृङ्ग में नाव को बाँध दिया। उसी मत्स्य के द्वारा मनु उत्तर गिरि हिमालय पहुँचे। तत्पश्चात् महामत्स्य ने कहा—मैंने तुम्हें पार कर दिया नाव को वृक्ष में बाँध दो। “ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः। अधिष्ठानं गिरेरस्य भवान् भवितुमर्हति ॥ कूर्मेण तु तथेत्युक्त्वा पृष्ठमस्य समर्पितम्। तं शैलं तस्य पृष्ठस्थं यन्त्रेणेन्द्रो न्यपीडयत् ॥ ३२