रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३५ वन्येन फलमूलेन निरतौ वनवासिनौ । सुवर्णेन हिरण्येन कि करिष्यावहे वने ॥" (वा० रा० ७।९४।१७-२०) क्या ऐसी उक्ति काव्योपजीवी जाति कुशीलवों के लिए सम्भव थी ? क्या कुशीलव वनवासी होते थे ? बुल्के इस तथ्य को क्यों नहीं समझना चाह रहे हैं कि "कुशीलवौ" शब्द से प्रकृत में द्वन्द्वसमास के द्वारा कुश और लव सीता के दो पुत्र ही विवक्षित हैं, कोई कुशीलव नामक काव्योपजीवी जाति नहीं । बालकाण्ड में भी कुश-लव को 'कुशीलवौ' कहा गया गया है—यहाँ एकवचन या बहुवचन का नहीं, किन्तु अश्विनौ के समान द्विवचन का ही सर्वत्र प्रयोग हुआ है । साथ ही उन्हें मुनिवेष-धारी राजकुमार कहा गया है— "तस्य चिन्तयमानस्य महर्षेर्भावितात्मनः । अगृह्णीतां ततः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ ॥ कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ । भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥" ( वा० रा० १।४।४,५ ) उत्तरकाण्ड में महर्षि वाल्मीकि राम से कुश और लव के सम्बन्ध में कहते हैं, "ये दोनों जानकी से उत्पन्न तुम्हारे हो यमज पुत्र हैं, यह मैं सत्य कहता हूँ—" "इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ च यमजातको । सुतो तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥" ( वा० रा० ७।९६।१७ ) बुल्के उपर्युक्त सम्पूर्ण तथ्यों की उपेक्षा कर कुश और लव को काव्योपजीवी कुशीलव कहते हैं । वस्तुतः साङ्गोपाङ्ग रामायण का प्रमाण न मानने से ऐसे ही भ्रान्तिपूर्ण अनर्थ की सम्भावना होती हैं। बुल्के के लिए यह समझना उचित है कि काव्योपजीवी कुशीलव को काव्य से जीविका चलाना होता तो वे रथ्याओं, राजमार्गों, राजाओं के महलों, ऋषिवाटों, ब्राह्मणावसथों तथा जनसाधारण में रामायण का गान करते हुए क्यों घूमते ? यदि वे सादर उत्तरकाण्ड का अध्ययन करें तो उनके लिए भी स्पष्ट हो जायगा कि वस्तुतः इस सब का उद्देश्य सीता के चरित्र की पवित्रता और निर्मलता स्थापन करना ही था । यह भी विचारणीय है कि आश्रम में सीता के आने के बाद ही रामायण के निर्माण का प्रसङ्ग क्यों आता है ? लक्ष्मण वाल्मीकि आश्रम के समीप अन्तर्वत्नी सीता को पहुँचा कर लौट गये । रुदन करती हुई सीता को देखकर मुनि-बालकों ने जाकर वाल्मीकि को बताया कि कोई अदृष्टपूर्वा श्री के समान किसी की पत्नी स्वर्गच्युत देवता के समान दुःखित है । मुनिपुङ्गव वाल्मीकि ने शोकव्याकुल सीता से मधुर एवं आह्लादिनी वाणी से कहा कि तुम दशरथ की स्नुषा और राम की पत्नी तथा जनक की पुत्री हो मैंने सब समाधि से जान लिया है । तुम्हारे त्याग का कारण भी मैंने जान लिया है । तुम निष्पाप हो यह भी मैंने तपोबललब्ध चक्षु से देख लिया है। यहीं समीप में तापसी लोग हैं, ये सब तुम्हारी रक्षा करेंगी । सीता ऋषि की आज्ञा के अनुसार आश्रम में रहने लगी । निर्वासिता सीता के करुण क्रन्दन जनित करुण रस से महर्षि का हृदय परिपूर्ण था; निषाद द्वारा क्रोञ्च के वध से संतप्त क्रौञ्ची के करुण क्रन्दन ने महर्षि के तादृश हृदय को आलोड़ित कर दिया, वही करुण रस महर्षि के हृदय से उच्छलित हो श्लोक बन गया— "शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा ।" ( वा० रा० १।२।१८) शोकाकुलित वाल्मीकि महर्षि को मार्ग-प्रदर्शन करने के लिए ब्रह्माजी आये और उन्होंने कहा कि मेरी प्रेरणा से ही सरस्वती इस श्लोक रूप में प्रकट हुई है; तुम धर्मात्मा एवं धीर राम के सम्पूर्ण चरित्र को जैसे नारद