भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 311

२३४ रामायणमीमांसा सप्तम काव्योपजीवी तथा उसके द्वारा जीविका चलानेवाले नहीं थे । बुल्के का उक्त कथन उपजीव्यविरोधी होने से अत्यन्त हेय है । वे जिस ( उत्तरकाण्ड सर्ग ९३ ) आधार पर रामायण के कण्ठस्थ गाने का समर्थन करते हैं और कुश एवं लव को काव्योपजीवी कुशीलव सिद्ध करने का दुःसाहस करते हैं उसी से उनका कथन विरुद्ध है । वहाँ महर्षि ने अन्य शिष्यों को नहीं, किन्तु कुश एवं लव दो ही शिष्यों को रामायण-गान का आदेश दिया— “स शिष्यावब्रवीदृष्टो युवां गत्वा समाहितौ । कृत्स्नं रामायणं काव्यं गायतां परया मुदा ॥ ऋषिवाटेपु पुण्येषु ब्राह्मणावसथेषु च । रथ्यासु राजमार्गेषु पार्थिवानां गृहेषु च ॥ रामस्य भवनद्वारे यत्र कर्म च कुर्वते । ऋत्विजामग्रतश्चैव तत्र गेयं विशेषतः ॥” ( वा० रा० ७।९३।४-६ ) अर्थात् महर्षि वाल्मीकि ने अपने दोनों शिष्यों—कुश एवं लव को, जो सीता के पुत्र थें, कहा कि तुम दोनों जाकर समाहित होकर प्रसन्नता से सम्पूर्ण रामायण का गान करो । पुण्य ऋषिवाटों ( अहातों ), ब्राह्मणों के आवासों, रथ्याओं, राजमार्गों, छोटे राजाओं के महलों और रामभवन के द्वार पर और ऋत्विज जहाँ अश्वमेधसम्बन्धी कर्म कर रहे हों विशेषतः वहाँ गान करो । बुल्के यदि उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड को प्रमाण मान लेते हैं तो उनके कल्पना के सभी महल ढह जायँगे । इसी लिए वे उन्हें पहले से ही प्रक्षेप कहने की कल्पना करते हैं । वे काव्योपजीवी कुशीलव थे, उसके द्वारा जीविका चलाते थे उनकी यह कल्पना भी आगे के श्लोकों से समूल ध्वस्त हो जाती है । महर्षि कुश और लव को सम्बोधन कर कहते हैं । “वत्सो ! इन उत्तम स्वादवाले विविध फलों को, जो कि पर्वताग्रों में उत्पन्न हुए हैं, खाकर तुम गायन करना, इन सुमिष्ट फल-मूलों को खाने से तुम दोनों को श्रम ( थकावट ) न होगा और इनके खाने से तुम दोनों का कण्ठमाधुर्यरूप राग भी नहीं मिटेगा । महर्षि ने पुनः सावधान किया कि महीपति राम यदि तुमको श्रवण के लिए बुलायें तो जाना और उपविष्ट ऋषियों के समक्ष यथायोग्य गान करना । परन्तु धन की वाञ्छा से स्वल्प भी लोभ न करना, क्योंकि हम फलमूलाशी आश्रमवासियों के लिए धन का क्या प्रयोजन है— “लोभश्चापि न कर्तव्यः स्वल्पोऽपि धनवाञ्छया । किं धनेनाश्रमस्थानां फलमूलाशिनां सदा ॥” ( वा० रा० ७।९३।११ ) राम ने पहले ही दिन रामायण के बीस सर्ग सुनने पर प्रसन्न होकर लक्ष्मण को आदेश दिया कि अठारह- अठारह हजार सुवर्ण मुद्राएँ दोनों बालकों को पृथक्-पृथक् दी जायँ और भी जो इनकी इच्छा हो दिया जाय । लक्ष्मण ने वैसा ही किया, परन्तु दोनों ने सुवर्ण मुद्राओं को लेना अस्वीकार किया और कहा “इस सुवर्ण-राशि से हमें क्या प्रयोजन है ? हम लोग तो वनवासी हैं, वन्य फलमूल से ही तृप्त हैं ।” उनकी ऐसी बातें सुनकर सभी श्रोताओं और राम को बड़ा कौतूहल और विस्मय हुआ— “श्रुत्वा विंशतिसर्गास्तान् भ्रातरं भ्रातृवत्सलः । अष्टादशसहस्राणि सुवर्णस्य महात्मनोः ॥ प्रयच्छ शीघ्रं काकुत्स्थ यदन्यदभिकाङ्क्षितम् । ददौ स शीघ्रं काकुत्स्थो बालयोर्वे पृथक्-पृथक् ॥ दीयमानं सुवर्णं तु नागृह्णीतां कुशीलवौ । ऊचतुश्च महात्मानौ किमनेनेति विस्मितौ ॥

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