भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २३३ १३७ वें अनु० में 'आदिरामायण के विकास के सम्बन्ध में बुल्के लिखते हैं, “आदिरामायण का विकास समझने के लिए उसके प्रचार की रीति को ध्यान में रखना परमावश्यक है। बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में लिखा गया है कि वाल्मीकि ने अपने शिष्यों को रामायण सिखलाकर उसे राजाओं, ऋषियों तथा जनसाधारण को सुनाने का आदेश दिया— “कृत्स्नं रामायणं काव्यं गायतां परया मुदा । ऋषिवाटेषु पुण्येषु ब्राह्मणावसथेषु च ॥ रथ्यासु राजमार्गेषु पार्थिवानां गृहेषु च ॥” (वा० रा० ७।९३।४, ५) इससे ज्ञात होता है रामायण काव्य मौखिकरूप से प्रचलित था । कुशीलव सारे देश में उसे गाकर सुनाते थे और इस प्रकार अपनी जीविका चलाते थे । वे काव्योपजीवी ही थे । रामायण काव्य उनको कण्ठस्थ था और वे उसे अपने पुत्रों को सिखलाते थे । रामायण का कोई ग्रन्थ प्रचलित नहीं था और न प्राचीन फलश्रुति और श्रवणफलस्तुति ही थी । “श्रुत्वा रामायणमिदं दीर्घमायुश्च विन्दति ।” ( वा० रा० ६।१२८।१०९ ) बाद में रामायण के पढ़ने तथा लिखने का भी उल्लेख मिलता है— “रामायणमिदं कृत्स्नं शृण्वतः पठतः सदा ।” ( वा० रा० ६।११७।११८ ) "भक्त्या रामस्य ये चेमां संहितामृषिणा कृताम् । ये लिखन्तीह च नरास्तेषां वासस्त्रिविष्टपे ॥” ( वा० रा० ६।१२८।१२० ) लेकिन फलश्रुति का यह अंग गौड़ीयपाठ में नहीं मिलता । टीकाकार कतक ने भी उसे प्रक्षिप्त माना है ।" वस्तुतः ऐसे कथन उत्तरदायित्व-हीन हैं । किसी भी ठोस प्रमाण के सर्वथा अभाव में किसी भी ग्रन्थ के किसी भी अंश को प्रक्षेप कह देना और उन्हीं अंशों में से अपने स्वार्थ के अनुगुण कुछ अंशों को स्वीकार कर लेना नितान्त साभिप्राय कुतर्क ही है । यदि ऐसे लेखकों से प्रश्न किया जाय कि वे किस अधार पर यह कहते हैं कि अमुक अंश महर्षि वाल्मीकि की रचना है और अमुक प्रक्षेप है ? इसे किसने देखा है ? किस वर्ष, किस समय, किस पक्ष, किस तिथि में किसने कब इस अंश को लिखकर रामायण में जोड़ा था इसका प्रमाण क्या है ? और उस प्रमाण की प्रामाणिकता क्या है ? तो निश्चय ही वे कोई युक्तिसङ्गत उत्तर नहीं दे सकेंगे । उसी बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त भी कहना और उसमें से ही प्रमाणरूप से श्लोक उद्धृत भी करना अर्धकुक्कुटी-न्याय है । जैसे कोई कुक्कुटी के एक अंश को पाक के लिए और दूसरे अंश को प्रजनन के लिए रखना चाहता हो । उक्त दोनों क्रियाएँ एक ही साथ कदापि सम्भव नहीं, क्योंकि यह असङ्गत है । ठीक इसी तरह बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप कहते हुए उसके कुछ श्लोकों से स्वमन्तव्य की पुष्टि भी करना दोनों ही असङ्गत हैं । यह ठीक है कि उस समय कण्ठस्थ करने की पद्धति ही अधिक थी, परन्तु लेखन प्रणाली थी ही नहीं, यह कहना भी अनभिज्ञता का ही परिचय देना है । बहुत प्राचीनकाल से मन्त्रलेखन की पद्धति प्रचलित है। उसी आधार पर 'ये लिखन्तीह' यह फलश्रुति भी सङ्गत ही है । वह गौड़ीय पाठ में भले न मिलती हो, परन्तु दाक्षिणात्य आदि पाठों में तो मिलती ही है । रामायण के अनुसार वाल्मीकि ने जिन शिष्यों को रामायण पढ़ाकर राजाओं, ऋषियों तथा जनसाधारण में गाने को कहा उनमें प्रमुख कुश और लव थे, जो सीता के पुत्र थे, उन्हीं को कुशीलव भी कह दिया गया है । वे ३०