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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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किन्तु अपने व्यवहार में उसे नहीं लाते। इस बात को यह गाथा बताती है—हे हंस, तुम्हारे मन में काम, क्रोध आदि डेरा जमाये हैं और तुम धर्म का उपदेश कर रहे हो। कहाँ तुम्हारा नजर बचाकर अण्डों को खा जाना इतना अपवित्र कर्म और कहाँ यह धर्मोपदेश ! “अत्र पिङ्गलाया गीता गाथाः श्रूयन्ति पार्थिव । यथा सा कृच्छ्रकालेऽपि लेभे धर्मं सनातनम् ॥” ( म० भा० २।१७४।४६ ) कोई प्रेमी पिङ्गला वेश्या को सङ्केत देकर उसके पास नहीं पहुँचा। वह बहुत आतुरता से उसकी प्रतीक्षा करती रही। जब बहुत ही निराश हुई तो उसी दुःख के समय में उसे नित्य प्रसिद्ध योग ( आत्मज्ञान ) की प्राप्ति हो गयी। इस नैराश्य के विषय में पिङ्गला द्वारा गायी गाथा अब भी सुनी जाती है। “गाथाश्चाप्यब्रवीद् विद्वान् गौतमो मुनिसत्तमः । चिरकारिषु धीरेषु गुणोद्देशसमाश्रयाः ॥ चिरेण मित्रं बध्नीयात् चिरेण च कृतं त्यजेत् । चिरेण हि कृतं मित्रं चिरं धारणमर्हति ॥” (म० भा० १२।२६६।६८,६९) महाविद्वान् मुनिश्रेष्ठ गौतम ने चिरकारियों के गुण और कर्तव्य के विषय में गाथाएँ कही हैं। किसी को मित्रं बनाना हो तो जल्दी नहीं करनी चाहिये। मित्र बना लेने पर किसी कारण वश मित्र का परित्याग करना पड़े तो उसमें भी जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिये। जिसके साथ मित्रता जोड़ने में विलम्ब होता है उससे जल्दी मित्रता टूटती भी नहीं। उक्त उद्धरणों में अनेक प्रकार की गाथाओं का उल्लेख है। सिद्धान्तभूत गाथाएँ अनृत नहीं हैं। वेदों में वास्तविक इतिहास या घटनोल्लेख मानने से वेद की अपौरुषेयता का भङ्ग होता है, अतः वहाँ की घटनासम्बन्धी गाथाएँ गुणवाद अर्थवादमात्र हैं। जो सुखावबोधार्था आख्यायिका हैं, उनका तात्पर्य ही सत्य होता है। उनका वाच्यार्थ अनृत है, यही ‘गाथानृतम्’ कहने का अभिप्राय है। अश्वमेधादि यज्ञों में पुत्रादि-परिवृत राजा को नाना प्रकार के आख्यान सुनाने का विधान है। पर वहाँ भी नियम है। प्रथमेऽह्नि मनुर्वैवस्वतो राजेत्याह; द्वितीयेऽह्नि यमो वैवस्वतो राजेत्याह; तृतीयेऽह्नि वरुण आदित्यो राजेत्याह आदि वाक्यों से नियत वैदिक आख्यायिकाओं का ही श्रवण कराया जाता है ( श० ब्रा० १३।४।३ का ब्र० सू० कल्पतरु ३।४।२३ में उद्धृत वचन ) । वेद का अध्यापन, श्रावण आदि वैदिक ब्राह्मण ही करा सकता है, सूत आदि नहीं। सूत, मागध, बन्दी आदि तो प्रसिद्ध लौकिक गाथाओं की सुनाते हैं । बुल्के १३०वें अनु० में लिखते हैं, “वाल्मीकि के पूर्व रामकथासम्बन्धी गाथाएँ प्रचलित हो चुकी थीं। इसका प्रमाण हमें बौद्ध त्रिपिटक में मिलता है। एक ओर रामकथासम्बन्धी गाथाएँ रामायण पर निर्भर नहीं हो सकती हैं और दूसरी ओर बौद्ध गाथाओं में जो रामकथासम्बन्धी सामग्री मिलती है वह रामायण के आधार के लिए पर्याप्त नहीं है। अतः रामायण तथा रामकथाविषयक बौद्ध गाथाएँ दोनों प्राचीन रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य पर निर्भर हैं। दशरथजातक की वर्तमान कथा में जो पोराण पण्डिताः शब्द आया है, इससे भी इस निर्णय की पुष्टि होती है। इसके अतिरिक्त हरिवंश के एक श्लोक में रामकथा के अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन के पश्चात् इस प्रकार लिखा है— “गाथा अप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । रामे निबद्धतत्त्वार्था माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥” ( ह० पु० १।४१।१३९ )