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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 303

२२६ रामायणमीमांसा सप्तम विषय में देवताओं द्वारा उदाहृत एक गाथा प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में बालधि नामक बड़े तपस्वी हो चुके हैं। उनके लड़के हो होकर मर जाते थे। पुत्रशोक से घबराकर उन्होंने अत्यन्त दुष्कर तप किया। देवताओं की कृपा हुई। उन्होंने वरदान मांगा कि मेरा लड़का अमर्त्य (अमरणशील) हो। किन्तु देवताओं ने कहा कि मर्त्य अमरण- शील नहीं हो सकता। कुछ आयु का निमित्त स्वीकार करो। बालधि ने कहा कि ये पहाड़ कितने समय से ऐसे ही पड़े हुए हैं। जब यह नष्ट हो तब हमारे लड़के की आयु समाप्त हो। देवताओं ने इसे मान लिया। बालधि को लड़का हुआ। वह बहुत ही मेधावी और दूसरे का उत्कर्ष देखकर जलनेवाला था। बड़ा होने पर ऋषियों, महात्माओं सज्जनों और प्रतिष्ठितों का पद पद पर अपमान करने लगा। एक समय धनुषाक्ष नामक महाविद्वान् से उसकी मुठभेड़ हो गयी। अपनी प्रतिभा के बल पर उसने धनुषाक्ष को पराजित कर बहुत ही अपमानित किया। धनुषाक्ष ने उसे शाप दिया कि तुम भस्म हो जाओ। किन्तु उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ। फिर धनुषाक्ष ने भैंसों को पाला और भैंसों से पहाड़ तुड़वा दिया। पहाड़ टूटते ही मेधावी पुत्र मर गया। बालधि बहुत रोने कलपने लगे। उन्हें इस तरह रोते-कलपते देखकर वेदवादियों ने जो गाथा कही वह सुना रहा हूँ। मनुष्य भाग्य द्वारा प्राप्त सुख या दुःख का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। धनुषाक्ष ने महिषों (भैंसों) से पहाड़ तुड़वाकर बालधि के पुत्र को नष्ट कर दिया। तपस्वी लोग तप द्वारा देवताओं की कृपा से वरदान प्राप्त कर घमण्ड में आकर नष्ट हो जाते हैं। हे पुत्र यवक्रीत, तुम इससे बचना और रैभ्य तथा उनके पुत्रों से कभी सामना न हो, ऐसा प्रयत्न करना। "अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम् । गीताः क्षमावतां कृष्णे काश्यपेन महात्मना ॥" (महा० ३।२९।३५) द्रौपदी ने महाराज युधिष्ठिर से कहा था—बलि ने अपने पितामह प्रह्लादजी से पूछा कि क्षमा ठीक है या तेज, आप बतायें। प्रह्लादजी ने उत्तर दिया "न तो बराबर क्षमा ही ठीक होती है और न बराबर तेज हो। समय देख क्षमा अपनानी चाहिए और समय देखकर तेज।" सो आप इस समय दुर्योधन पर क्रोध कर युद्ध द्वारा उसे नष्ट कीजिए। महाराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया-हे कृष्णे, महात्मा काश्यप ने क्षमाशील लोगों में बैठकर क्षमा की प्रशंसा की है। इसके बाद ११ श्लोकों में क्षमा की प्रशंसा है। "अध्यत्र संश्रयार्थाय प्रजापतिरथो जगौ । पुष्करेषु कुरुश्रेष्ठ गाथां सुकृतिनां वर ॥ मनसाऽप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः । विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्ठे च मोदते ॥" महाराज युधिष्ठिर के पुरोहित धौम्य उनसे कहते हैं—हे कुरुश्रेष्ठ, पुष्कर तीर्थ के विषय में प्रजापति ने एक गाथा गायी है। पुष्कर तीर्थ में जाने की इच्छामात्र होने पर पाप दूर होते हैं और प्राणी स्वर्ग जाकर प्रसन्न होता है। "गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । भीष्म यां तां च ते सम्यक् कथयिष्यामि भारत ॥ अन्तरात्मन्यभिहते रोषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मैतत् तव वाचमतीत्यते ॥" (म० भा० २।४१।३९, ४०) शिशुपाल ने भीष्म से कहा कि समुद्र के किनारे एक बूढ़ा हंस रहता था। वह सभी पक्षियों को उपदेश देता था कि धर्माचरण करना चाहिये। तथा उन पक्षियों की नजर बचाकर उनके अण्डे खा जाया करता था। पुराणविद लोग उस विषय में हे भीष्म, एक गाथा कहते हैं, सुनो। दुनियाँ में लोग परोपदेश में ही कुशल होते हैं;

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