भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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बृहदारण्यक-भाष्य में आद्य शङ्कराचार्य ने मन्त्रगत उर्वशी-पुरूरवा की कथा को ही इतिहास कहा है । "असद्वा इदमग्र आसीत्" इत्यादि ब्राह्मणों को पुराण, देवयजन-विद्या को ही विद्या, "प्रियमित्येतदुपासीत" इत्यादि ब्राह्मण को ही उपनिषद्, ब्राह्मण-प्रभव मन्त्रों को ही श्लोक, "आत्मैत्येवोपासीत" इत्यादि संग्रह वाक्यों को सूत्र, मन्त्र-विवरण को अनुव्याख्यान एवं अर्थवादों को व्याख्यान कहा है (बृ० उ० २।४।१०) । ऋग्वेद संहिता ( १०।८५।६ ) इतिहासपुराणम् ( ६।७।१२ ) गाथानृतं नाराशंसी ( का० सं० १४।५ ) गाथा अप्यत्र गायन्ति ( ह० पु० १।४१।४९ ) उपर्युक्त उद्धरणों के अनुसार गाथाएँ वैदिक तथा लौकिक भी होती हैं। विभिन्न विषयों में सिद्धान्तभूत प्रसिद्ध संग्राहक पद्य ही गाथा है । गाथासप्तशती प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है। उसमें गाथाओं का ही उल्लेख है। “तवाभिगमनार्थं तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः । वाक्यानि मम गाथाभिर्गायमाना दिशो दश ॥" (म० भा० ३।७६।२७) महाराज नल के द्वारा ऐसी आशङ्का अभिव्यक्त करने पर कि प्यार करनेवाले पत्नीव्रत पति को छोड़कर कोई पत्नी कभी दूसरे पति का वरण कर सकती है क्या, जैसा कि तुम करने जा रही हो ? दमयन्ती ने अपनी सफाई देते हुए नल से यह बात कही है कि महाराज, आपका पता लगाने के लिए ही चारों ओर ब्राह्मण यहाँ से भेजे गये हैं और उन लोगों ने मेरा अभिप्राय गाथारूप में गाते हुए सर्वत्र फैलाया है। "अत्राप्युदाहरन्तोमा गाथा देवैरुदाहृताः । मुनिरासीत्पुरा पुत्र बालधिर्नाम वीर्यवान् ।। लालप्यमानं तं दृष्ट्वा मुनयः परमार्तवत् । ऊचुर्वेदविदः सर्वे गाथां यां तां निबोध मे ।। न दिष्टमर्थमप्येतुमीशो मर्त्यः कथञ्चन । महिषेर्भेदयामास धनुषाक्षो महीधरान् ।।" (म० भा० ३।१३५।४५,५४,५५) दो मित्र थे रैभ्य और भरद्वाज । दोनों में बड़ा घनिष्ठ प्रेम था । रैभ्य के दो पुत्र थे तथा भरद्वाज को एक ही लड़का था यवक्रीत । रैभ्य दोनों पुत्रों सहित बहुत विद्वान् थे, इसलिये उनकी बहुत प्रशंसा थी । भरद्वाज केवलमात्र तपस्वी थे, अतः उनकी उतनी अधिक प्रशंसा ( प्रतिष्ठा ) नहीं थी । अपने पिता की ऐसी स्थिति देखकर यवक्रीत मन में जलने लगे और बिना पढ़े ही वेद-विद्या की प्राप्ति के लिए तप करने लगे । यवक्रीत का तप जब बहुत बढ़ा तब उनकी तपोवृद्धि से इन्द्र को सन्ताप हुआ। उन्होंने यवक्रीत के पास जाकर पूछा- "आप इतना कठोर तप किसलिये कर रहे हैं ?" यवक्रीत ने कहा, "बिना पढ़े ही वेदों की प्राप्ति और उनके रहस्य-ज्ञान के लिए तप कर रहा हूँ। मैं अपने तपोबल से सब कुछ जानना चाहता हूँ।" इन्द्र ने कहा, "ब्रह्मर्षे ! वेद-प्राप्ति के लिए आपका यह मार्ग ठीक नहीं है। इस मार्ग से आपके विनाश का खतरा है। आपको गुरुमुख से पढ़कर ही वेद प्राप्त करने चाहिए।" यह सुनकर भी यवक्रीत अपने निश्चय पर अडिग रहे। अन्त में इन्द्र ने वरदान दे दिया कि तुम्हें और तुम्हारे पिता भरद्वाज दोनों को ही बिना गुरुमुख से अध्ययन किये ही वेदज्ञान हो जायेगा। यवक्रीत ने वहाँ से अपने पिता के पास आकर यह समाचार सुनाया और कहा कि अब हम पिता और पुत्र दोनों के समान कोई विद्वान् न होगा । भरद्वाज ने उत्तर दिया कि पुत्र, तुमने ऐसा वरदान लेकर अच्छा नहीं किया, क्योकि ऐसा वेदज्ञान प्राप्त कर तुम अभिमानी हो जाओगे और विद्वानों का अपमान करोगे । फलतः तुम्हारा विनाश हो जायगा। देखो इस