रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ रामायणमीमांसा सप्तम “स्नातमन्यत्र छान्दसात् ।” अर्थात् सूत छन्दोविषय से अन्यत्र पुराणेतिहास में ही निष्णात थे, छन्द (वेद) में नहीं। यद्यपि वे मुख्य सूत जाति नहीं थे, किन्तु राजा पृथु के यज्ञ में ऐन्द्रबार्हस्पत्य हवि के विपर्यास से अग्निकुण्ड से उद्भूत हुए थे, अतः ऋषियों ने उन्हें इतिहास-पुराण का प्रवक्ता बनाया था। इसी लिए कौटिल्य ने दो प्रकार के सूतों का निर्देश किया है। कुशीलव भी लौकिक गाथाओं का ही प्रचार कर सकते थे, वैदिक गाथाओं का नहीं; क्योंकि वेदों में त्रैवर्णिक संस्कृत द्विज जाति का ही अधिकार है, अन्य का नहीं। यह पूर्वोत्तरमीमांसा अपशूद्राधिकरण में प्रसिद्ध है। “रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी । सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम् ॥” (ऋ० सं० १०।८५।६) “सूर्या सावित्री ब्रूते रैभी रैभ्यः काश्चनर्चः ।” (रैभीः शंसति ऐ० ब्रा० ६।३२) रैभी अनुदेयी दीयमानवधूविनोदनायानुदीयमाना वयस्या आसीत् । तथा नाराशंसी मनुष्याणां स्तुतिः । न्योचनी वधूशुश्रूषार्थं दीयमाना दासी । सूर्याया मम भद्रं वासः विचित्रं दुकूलादिकं गाथया परिष्कृतम् अलङ्कृतम् । एति । उक्त मन्त्र में स्तुति की दृष्टि से कहा गया है कि सूर्या सावित्री के विवाह में रैभी संज्ञक ऋचाएँ सूर्या को वयस्या (सखी) के रूप में, नाराशंसी ऋचाएँ न्योचनी (दासी) के रूप में और गाथा उसके वस्त्र तथा अलङ्कार के रूप में दी गयी थीं। इससे स्पष्ट है कि यहाँ नाराशंसीया गाथा वेद-मन्त्र ही हैं। इनमें सूत आदि का अधिकार नहीं है। रामायण के 'कुशीलवौ' तो कुश और लव राम के पुत्र क्षत्रिय थे। वे 'कुशीलव' नृत्य-गीतोपजीवी जाति के नहीं थे। इसी लिए रामायण में 'कुशीलवः' या 'कुशीलवाः' जैसा प्रयोग कहीं नहीं मिलता; जो 'कुशीलवौ' प्रयोग मिलता है वह द्विवचनान्त ही है। अतः यह शब्द कुश और लव के अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। गाथाएँ वैदिक, पौराणिक आदि अनेक प्रकार की होती हैं। लौकिक गाथाओं को सूत आदि भी गा सकते थे । अथ सायं धृतिषु हूयमानासु राजन्यो वीणागाथी दक्षिणत उत्तरमन्द्रामुदाघ्नंस्तिस्रः स्वयं संभृता गाथा गायतीत्ययुध्यतेत्यमुं संग्राममजयदिति तस्योक्तं ब्राह्मणम् ।” (श० ब्रा० १३।४।३।५) उक्त ब्राह्मण में कहा गया है कि वीणागाथी स्वयं रचित गाथा गाता है। इस राजन्य ने अमुक संग्राम जीता है। “अथाह वीणागाथिनो राजानं सङ्गायतेति ।” (शा० गृ० सू० १।२२।११) यजमान वीणागाथियों से कहता है सोमराजा की गान द्वारा स्तुति करो । “यस्यैवंविदेतद्धोता पारिप्लवमाख्यानमाचष्टे ।” (श० ब्रा० १३।४।३।१५) उक्त ब्राह्मण से प्रतीत होता है कि होता ही पारिप्लव आख्यान का वर्णन करता है। अश्वमेधादि यज्ञों में यज्ञ के विश्रामकाल में जो प्राचीन कथाएँ कही जाती हैं उन्हीं को पारिप्लव आख्यान कहा जाता है। सांग्रामिक रथ एवं अश्वों के अलङ्कारों की रक्षा का उत्तरदायित्व सूतों पर होना चाहिये । सूत और मागधों द्वारा गाने योग्य अन्य गाथाएँ होती हैं। सूतमागधाः शूराणां स्वर्गमस्वर्गं भीरूणां जातिसङ्घकुलकर्मवृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः । सूत और मागधों को चाहिये कि शूरों के लिए स्वर्ग और भीरुओं के लिए नरक प्राप्ति का गान एवं योद्धाओं के जाति, सङ्घ और कुल के कर्म तथा वृत्तान्त की स्तुति करें।