झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ झांसी की रानी [ २८ ] जिस दिन गंगाधरराव का देहान्त हुआ, लक्ष्मीबाई १८ वर्ष की थी । इस दुर्घटना का उनके मन और तन पर जो आघात हुआ वह ऐसा था, जैसे कमल को तुषार मार गया हो । परन्तु रानी के मन में एक भावना थी, एक लगन थी, जो उनको जीवित रखे थी । वह छुटपन के खिलवाड़ में प्रकट हो हो जाती थी । इस अवस्था में वह उनके मन के किस कोने में पड़ी हुई थी, इसको बहुत ही कम लोग जानते थे । जो जानते थे, उनमें से एक तात्या टोपे था । दूसरा नाना घोडपन्त । राजा गंगाधरराव के फेरे के लिये बिठूर से नाना घोडपन्त, अपने दोनों भाईयो सहित आया । तात्या भी साथ था । वे सब जवान हो गये थे । पैन्शन के ज़ब्त हो जाने के कारण सतप्त थे । और रोष भरे । गंगाधर- राव के देहान्त के कारण उनको बडी ठेस लगी । जालौन का राज्य समाप्त हो चुका था । एक महाराष्ट्र की गद्दी झांसी की बची थी । उनको भय था कि यह भी विलीन होने जा रही है । अत बाजीराव द्वितीय विठूर में बैठे बैठे, शुरू ज़माने में, जिस स्वराज्य स्वप्न की कल्पनायें उपस्थित किया करते थे और जिनसे इनका तथा लक्ष्मीबाई का बाल्यकाल पाला गया था, वह केवल दुस्वप्न सा अवगत होने लगा था । रानी किले वाले महल में ही रहती थी । वही उनकी सहेलिया और सिपाही, प्यादे भी । नीचे का महल, हाथी खाना, सेना, घोड़े हथियार इत्यादि सब हाथ में थे । नगर का शासनसूत्र भी अधिकार में था । राज्य की माल दीवानी भी उनके मन्त्रियों के हाथ में थी, परन्तु कम्पनी सरकार झांसी की छावनी में अपनी सेना और तोपे बढाने में व्यस्त थी । इससे मन में कुछ खुटका उत्पन्न होता था । शोक समवेदना के उपरान्त नाना के दोनो भाई विठूर चले गये । नाना और तात्या रह गये ।