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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ७ [ २ ] रघुनाथराव के उपरान्त राज्य के लिये चार मुख्य दावेदार खड़े हुये- गङ्गाधरराव ( भाई ) कृष्णराव ( रामचन्द्रराव का कथित दत्तक पुत्र ) अलीबहादुर और रघुनाथराव की विधवा रानी । कृष्णराव की पीठ पर सखूबाई थी । बन्दीगृह के जीवन ने सखूबाई का दमन नही कर पाया था, प्रत्युत वह अधिक सतर्क, सतेज, और सन- कीली हो गई थी । रघुनाथराव की अन्त्येष्टि क्रियायें भी साङ्गोपाङ्ग न हो पाई थी कि सखूबाई ने किले पर अधिकार कर लिया, खज़ाने पर अपने सन्त्री बिठला दिये, तोपो पर अपने तोपचियो को और सिलहखाने पर अपने सिलेदारो को नियुक्त कर दिया । गङ्गाधरराव शहर वाले महल में थे । उनको ऐसा लगता था जैसे अपने ही घर में कैद हो । सखूबाई को कैद करने का निर्णय जिन लोगो ने दिया था उनमें गङ्गाधरराव भी थे । सखूबाई की प्रतिहिंसा के भय से, और साधन-हीन होने के कारण गङ्गाधरराव झांसी से भागे और अङ्गरेजो के पास सीधे कानपूर पहुंचे । उस समय कानपूर अङ्गरेजो की बढ़ी हुई शक्ति का काफी बड़ा अड्डा था । अलीबहादुर ने करेरा के दुर्ग में शरण ली और वह वहा से सैन्य संग्रह करने लगे । उस समय मध्य भारत के लिये गवर्नर जनरल का एजेन्ट साइमन फ्रेज़र था—सन् १८५७ के विप्लवकाल में यह आगरे का लैफ्टि- नेंट गवर्नर हो गया था । इस गडबड की ख़बर पाकर फ्रेज़र झांसी आया । कम्पनी सरकार के प्रबल सगठन और बल के आतंक ने उसके कर्मचारियो को उद्धत बना दिया था । वह दो एक चोबदारो को लेकर सखूबाई के पास क़िले में पहुचा और उसने सखू को धमकाया ।

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