भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 5, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 5

[ ३ ] थानेदार थे। इनसे मुझको रानी के विषय में बहुत बातें मालूम हुईं - दादी परदादी की परम्पराओ की पोषक ' और अङ्गरेजो के दरोगा से " उन्ही दिनो झासी मे एक बुड्ढा और मिला। नाम अजीमुल्ला। यह रानी के विषय मे तुराबअली की अपेक्षा कही अधिक बातें जानता था। इसने रानी को देखा था, परन्तु वह उस समय छोटा था। तुराबअली ने' तो रानी को सैकडो ही बार देखा था। इसके उपरान्त मैने झाली के बुड्ढे-बुढियो को परेशान करना शुरू कर दिया। परन्तु वे जिस उत्साह और भक्ति के साथ रानी की बाते बतलाते थे उससे मै यह सोचता हू कि वे परेशान न हुये होगे। सवाल था रानी स्वराज्य के लिये लडी, या अङ्गरेजो की ओर से झासी ' का शासन करते करते उनको जनरल रोज से विवश होकर लडना पडा ? ' रानी ने बानपूर के राजा मर्दनसिंह को जो चिट्ठी युद्ध मे सहायता करने के लिये लिखी थी उसमें 'स्वराज्य' का शब्द आया है। यह चिट्ठी इस प्रश्न का सदा के लिये स्पष्ट उत्तर देती है। खेद है कि मै इस सस्करण में भी उस चिट्ठी का चित्र न दे सका-बानपूर के राजा के वशज ने वह चिट्ठी या उसका फोटो मेरे हवाले नही किया, परन्तु अगले सस्करण में दे सकने की मुझको आशा है। राजा गङ्गाधरराव का हस्ताक्षर मुझको राजा साहब कटेरा ने अपनी एक सनद दिखला कर सुलभ कर दिया। कृतज्ञ हू। सनद की नकल भी मेरे पास है। उस समय, ६५ वर्ष पहले लगभग आज ही की तरह की हिन्दी लिखी जाती थी, इस सनद से पता लगता है। मराठी में विष्णुराव गोडशे का 'माझा प्रवास' एक छोटा सा प्रबन्ध है। गोडशे रानी के साथ किले में था, जब रोज के मुकाबले में रानी लडी। मैने अपनी पुस्तक में माझा प्रवास का भी उपयोग किया है। मोतीबाई ऐतिहासिक है। मुझको उसका पता अकस्मात ही चला। ओर्छे दरवाजे एक मसजिद है। जिमीन का झगडा कचहरी में चला। मै मसजिद वालो की तरफ से वकील था। जिमीन का खेवट झासी में न था। ग्वालियर मे था। वहा से नकल मँगवाई। उसमें ज़मीन की पूर्व