झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २ ] सन् १६३२ तक यह उथल-पुथल अर्द्ध सुपुप्त रूप में मन के किसी कोने में पड़ी रही । एक दिन एक साहब ने कहा, 'जजी कचहरी की एक अलमारी में चालीस-पचास चिट्ठियाँ रखी हुई हैं जो १८५८ में किसी अङ्गरेज फौजी अफ़सर ने लै० गवर्नर के पास झाँसी को अधिकृत करने के बाद रोज़- रोज़ भेजी थी । मैने उन चिट्ठियो की नकल करवाई । उनमें कोई खास बात तो नही मिली, परन्तु एक विश्वास जगह करने लगा—रानी का शौर्य विवशता की परिस्थिन में उत्पन्न नही हुआ था । कचहरी में नवाब बन्ने नाम के एक अर्ज़ीनवीस काम करते थे । वह मुझको प्राय: रोज़ ही कचहरी मे मिलते थे । वह राजा रघुनाथराव के लड़के नवाब अलीबहादुर की लड़की के लड़के निकले ! मैने सोचा, शायद इनके पास रानी सम्बन्धी कोई सामग्री हो । पूछने पर उन्होने बतलाया कि नवाब अलीबहादुर का रोज़नामचा इत्यादि घर पर रखे हैं । मै उत्सुकता के मारे परेशान हो गया । रोज़नामचा देखने को मिला । उसको मैने पढ़वाया । नवाब अलीबहादुर कैसे थे और उनका नौकर पीरअली किस तरह का आदमी था यह तो उनके रोज़नामचे से प्रकट होता ही था, परन्तु रानी लक्ष्मीबाई की विलक्षणता और तत्कालीन समाज की प्रगति और रहन-सहन का भी उससे पता चला । रोज़नामचा दीमक के हमलो से जर्जर हो चुका था, और अब तो, उसके शुरू का भाग नष्ट ही हो गया है, परन्तु मैने नोट ले लिये । १८५८ में नवाब अलीबहादुर ने अपनी राजभक्ति के प्रमाण में कुछ बयान दिये थे । उन बयानो में पीरअली का भी ज़िकिर किया था । वे बयान भी मुझको मिल गये । इससे बढकर, मुझको एक व्यक्ति मिले—मु० तुराबअली दरोगा । ये, ८, १० वर्ष हुये तब परलोक गामी हुये ११५ वर्ष की आयु में । 'गदर' के जमाने में तुराबअली साहब अङ्गरेजो की ओर से पुलिस के