भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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१७६रसरत्नसमुच्चये—

चिञ्चाफलजलक्वाथादयो दोषमुदस्यति ॥ १०५ ॥

अथवा लौह के पत्रों को जल से पीसे निमक से लिप्त कर अग्नि में प्रतप्त कर लें, फिर उपर्युक्त विधि से बने हुए त्रिफला क्वाथ में बुझा लें । इस तरह सात वार करने से लौह शुद्ध हो जाता है । अथवा लौह को प्रतप्त कर इमली के पत्तोंके स्वरस या क्वाथमें सात वार बुझाने से भी वह शुद्ध हो जाता है॥१०४-१०५॥

मतान्तरेण शोधनं मारणञ्च—

यद्वा फलत्रयोपेतं गोमूत्रे कथितं क्षणम् ।
रेचितं घृतसंयुक्तं क्षिप्त्वाऽयःखर्परे पचेत् ॥ १०६ ॥
चालयेल्लोहदण्डेन यावत्क्षिप्तं तृणं दहेत् ।
पिष्ट्वा पिष्ट्वा पचेदेवं पञ्चवारमतः परम् ॥ १०७ ॥
धात्रीफलरसैैर्यद्वा त्रिफलाक्वथितोदकैः ।
पुटैर्लोहं चतुर्वारं भवेद्वारितरं खलु ॥ १०८ ॥

अथवा १६ पल त्रिफला का आठगुने गोमूत्र में क्वाथ बनाकर पाच पल लौह को उस क्वाथ में खूब पकाले, फिर उस लौह का रेती से चूर्ण करके उसमें समान या द्विगुण घृत मिलाकर खर्परमें (कड़ाही) पकावे और लौहकी कलच्छी से चलाता रहे । जब पकाते २ लौह पर तृण डालने से वह जलने लगे तब उतार ले । इस तरह लौह को खरल में पीस पीसकर पाच वार पकाना चाहिये । फिर त्रिफला के क्वाथ से या आंवलों के रस में खूब खरल कर चार पुट देने चाहिए । इस तरह करने से लौह की जल में तैरने लायक भस्म हो जाती है ॥ १०६-१०८ ॥

मतान्तरेण मारणम्—

स्नेहाक्तं लोहरजो मूत्रे स्वरसेऽपि रात्रिधात्रीणाम् ।
पृथगेवं सप्तकृत्वो भर्जितमखिलामये योज्यम् ॥ १०९ ॥

अथवा लौह चूर्ण को घृत से लिप्त कर गोमूत्र, हरिद्रास्वरस और आंवले के खरस में पृथक् २ सातवार पकाकर पुटविधि से भस्म बना के सम्पूर्ण रोगों में प्रयोग करना चाहिए ॥ १०९ ॥

अथ तीक्ष्णलौहस्य मारणम्—

तीक्ष्णलौहस्य पत्राणि निर्दलानि दृढेऽनले ।
ध्मात्वा क्षिपेज्जले सद्यःपाषाणोलूखलोदरे ॥ ११० ॥