रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः । २१३
वाङ्माया ह्रीं ततः क्षें च दमश्च पञ्चाक्षरो मनुः । अनेन मूलमन्त्रेण भैरवं तत्र पूजयेत् ॥ सर्वेषां रससिद्धानां नाम सङ्कीर्तयेत्तदा ॥ ५० ॥
विड् (रस के जारण के लिये क्षार पदार्थों से बनाया हुआ पदार्थ विशेष) काञ्जी, विविध यन्त्र, क्षार वर्गके आठों क्षार, पञ्चमृत्तिका, पाञ्चो लवण, कोष्ठियां, सब प्रकार की मूषा, वङ्क नाल, तुष, कोयले, जङ्गली कण्डे, धौंकनी, विविध प्रकार की औषधियां चलाने के दण्ड, कल्क पीसने की शिला, खरलें, ओखलियां, सुनार के विविध उपकरण, सब प्रकार की तुलाएं और सर्व प्रकार की मिट्टी, काष्ठ, ताम्बा और लौह के पात्र तथा आश्चर्यजनक गुण करने वाली दिव्य औषधियों के वर्ग (समूह) यथा जीवक, ऋषभक, ऋद्धि, वृद्धि, इत्यादि, तथा परदादि को रङ्गने वाले पदार्थ और स्नेह, इन को द्वार के बाहर स्थापन करके मूलमन्त्र के द्वारा पूजन करनी चाहिए । मूलमन्त्र का स्वरूप—वाङ्माया ह्रीं ततः क्षेञ्च क्ष्माश्च पञ्चाक्षरो मनुः । तथा इसी मन्त्र से भैरव का पूजन भी करें, पश्चात् सब रस के सिद्ध आचार्यो का भी वहां स्मरण करना चाहिए ॥ ४७–५० ॥
अथ रससिद्धेश्वरब्राह्मणादीनां पूजनम्—
व्यालाचार्यश्चंद्रसेनः सुबुद्धिर्नरवाहनः । नागार्जुनो रत्नघोषः सुरानन्दो यशोधनः ॥ ५१ ॥ इन्द्रधूमश्च माण्डव्यश्चर्पटी शूरसेनकः । आगमो नागबुद्धिश्च खण्डः कापालिको मतः ॥ ५२ ॥ कामारिस्तान्त्रिकः शम्भुर्लङ्कालम्पटशारदौ । बाणासुरो मुनिश्रेष्ठो गोविन्दः कपिलो बलिः ॥ ५३ ॥ एते सर्वे तु सूतेन्द्रा रससिद्धा महाबलाः । चरन्ति सर्वलोकेषु नित्या भोगपरायणाः ॥ ५४ ॥ सप्तविंशतिसङ्ख्याका रससिद्धिप्रदायकाः । वैद्याः पूज्याः प्रयत्नेन ततः कुर्याद्रसार्चनम् ॥ ५५ ॥ हर्षयन्द्विजदेवानां तर्पयेदिष्टदेवताः । कुमारीयोगिनीयोगीश्वरान्मेलकसाधकान् ॥ तर्पयेत्पूजयेद्भक्त्या यथाशक्त्यनुसारतः ॥ ५६ ॥