भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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षष्ठोऽध्यायः । २९५

जो मनुष्य उद्योग शील, सब साधनों को प्राप्त किया हुआ तथा गुरु से शास्त्र पढा हो, जिसको राजा का आधार हो और दूसरे मनुष्यों से रस सिद्धि करने के लिये प्रार्थित हो तथा अन्य सांसारिक कार्यों में जो आसक्त न हो, धनी हो, औषधादियों की मात्रा, मन्त्र, पाकक्रिया और सब काष्ठादि औषधियों के पहचानने में जो कुशल हो, भाग्य से वही शोभा और देहसिद्धि करने वाले पारद को सिद्ध कर सकता है ॥ ६० ॥

अथ कस्मै किमर्थं रसविद्या दातव्या तन्निर्देशः— रसशास्त्रं प्रदातव्यं विप्राणां धर्महेतवे । राज्ञे वैश्याय वृद्ध्यर्थं दास्यार्थमितरस्य च ॥ ६१ ॥

रस शास्त्र ब्राह्मणों को चिकित्सा द्वारा परोपकारादि धर्म कार्य करने के लिये, राजा ( क्षत्रिय ) और वैश्य को उक्त शास्त्र की वृद्धि के लिये और अन्य श्रेष्ठ शूद्रादि मनुष्यों को तीनों वर्णों को सेवा करने के लिये पढ़ाना चाहिए ॥ ६१ ॥

अथ गुरुसन्तोषस्य सर्वसिद्धिहेतुत्वनिर्देशः— गुरौ तुष्टे शिवस्तुष्येच्छिवे तुष्टे रसस्तथा । रसे तुष्टे क्रियाः सर्वाः सिध्यन्त्येवं न संशयः ॥ ६२ ॥

सुश्रूषादिक से गुरू के प्रसन्न होने से महादेव जी प्रसन्न होते हैं, महादेवजी के प्रसन्न होने से पारद प्रसन्न होता है और पारद के प्रसन्न होने से प्रायः सब काम सफल हो जाते हैं । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ६२ ॥

अथ रसविद्याया अवश्यंगोप्यत्वनिर्देशः— रसविद्या दृढं गोप्या मातृगुह्यमिवध्रुवम् । भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या च प्रकाशनात् ॥ ६३ ॥ न रोगिविदितं कार्यं बहुभिर्विदितं तथा । रोगिणां बहुभिर्ज्ञातं भवेन्निर्वीर्यमौषधम् ॥ ६४ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये शिष्योपनयनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥


रसविद्या को माता के गोप्याङ्ग के समान गुप्त रखनी चाहिए, क्योंकि गुप्त रखने से वह वीर्य्यवती होती है, और प्रकाशित करने से निर्वीर्य हो जाती है ।