रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२६ :रसरत्नसमुच्चये—
अथ स्वर्णरौप्ययोः कृष्टिः—
रूप्यं वा जातरूपं वा रसगन्धादिभिर्हतम् ।
समुत्थितं च बहुशः सा कृष्टी हेमतारयोः ॥ १० ॥
पारद और गन्धक आदि के द्वारा भस्म किये हुए स्वर्ण तथा रजत को उर्ध्व-पातन यन्त्र द्वारा अनेक औषधियों से जो पुनरुत्थापित कहते हैं, वह स्वर्ण और रजत की कृष्टी कही जाती है ॥ १० ॥
अथ कृष्ट्या उपयोगः—
कृष्टीं क्षिपेत्सुवर्णांन्तर्न वर्णो हीयते तया ॥ ११ ॥
उक्तविधि से की हुई स्वर्ण या रौप्य की कृष्टी को अग्निपर गलाकर स्वर्ण में मिलाने से स्वर्ण का रङ्ग कम नहीं होता है ॥ ११ ॥
स्वर्णकृष्ट्याः कार्यम्—
स्वर्णकृष्ट्या कृतं बीजं रसस्य परिरञ्जनम् ॥ १२ ॥
स्वर्ण कृष्टी से किया हुआ बीज (बनाने की विधि आगे है) पारद का रञ्जन करता है ॥ १२ ॥
अथ वरलोहकम्—
ताम्रं तीक्ष्णसमायुक्तं द्रुतं निक्षिप्य भूरिशः ।
सगन्धलकुचद्रावे निर्गतं वरलोहकम् ॥ १३ ॥
तीक्ष्णलौह तथा ताम्र को बहुतवार (प्रायः ७ वार) साथ ही पिघलाकर गन्धक के चूर्ण को बड़हल के रस में मिलाकर उसमें बुझाने से लोह को वरलोह कहा जाता है ॥ १३ ॥
अथ हेमरक्ती—
तेन रक्तीकृतं स्वर्णं हेमरक्तीत्युदाहृतम् ॥ १४ ॥
इस वरलोह के साथ स्वर्ण को पिघलाने से वह उत्तम लालवर्ण का हो जाता है उसको हेमरक्ती कहते हैं ॥ १४ ॥
हेमरक्तीप्रयोगः—
निक्षिप्ता सा द्रुते स्वर्णे स्वर्णोत्कर्षविधायिनी ।
तारस्य रञ्जनी चापि बीजरागविधायिनी ॥ १५ ॥
यह हेमरक्ती पिघले हुए स्वर्ण के साथ डालकर उसमें मिलाने से उसका रङ्ग