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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

अष्टमोऽध्यायः।

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अष्टमोऽध्यायः। २३७

मूर्च्छन संस्कार कहते हैं । यह संस्कार पारद के नाग, वङ्ग आदि महादोषों (१) को नष्ट करता है । पारद के अतिरिक्त अन्य पदार्थों का भी मूर्च्छन संस्कार करने से गुणोत्कर्ष होता है ॥ ६४ ॥

अथोत्थापनादिलक्षणम्—

स्वेदातपादियोगेन स्वरूपापादनं हि यत् ।
तदुत्थापनमित्युक्तं मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् ॥ ६५ ॥

मूर्च्छन संस्कार के कारण विरूपित हुए (नष्टपिष्ट हुए) पारद को फिर दोलायंत्र द्वारा स्वेदन करके या अग्नि और सूर्य के सन्ताप के द्वारा अपने पूर्व रूप में ले आते हैं, इसी को उत्थापन संस्कार कहते हैं । क्योंकि इस संस्कार से पारद पुनः स्वस्वरूप को ग्रहण कर लेता है ॥ ६५ ॥

बन्धलक्षणम्—

स्वरूपस्य विनाशेन पिष्टत्वादूध्वन्धनं हि तत् ।
विद्वद्भिर्निर्जितः सूतो नष्टपिष्टिः स उच्यते ॥ ६६ ॥

गन्धकादिक भिन्न २ पदार्थों के साथ पारद को घोटने से उसका श्वेत और चपलगुण नष्ट होकर चूर्ण या कज्जली बन जाती है और इस पेषण के कारण उसका बन्धन (मूर्तिबद्धरूप अथवा वह्निनाऽनुच्छिद्यमानत्व) हो जाता है । इस प्रकार से जीते हुए (स्वाधीन किये हुए) पारद का विद्वान् लोग नष्टपिष्टि कहते हैं ॥ ६६ ॥

अथ पातनलक्षणम् —

उक्तौषधैर्मर्दितपारदस्य यन्त्रास्थितस्योर्ध्वमधश्च तिर्यक् ।
निर्यातनं पातनसंज्ञमुक्तं वङ्गाहिसम्पर्कजकञ्चुकघ्नम् ॥ ६७ ॥

स्वेदन, मर्दनादिक संस्कार में बताई हुई तथा अन्य शास्त्रोक्त औषधियों के साथ पारद को खरल में घोट करके ऊर्ध्वपातन, अधः पातन और तिर्यक् पातन यन्त्रों में लेप कर के या चूर्ण रूप ही में रख कर क्रम से पारद को ऊपर, नीचे और तिर्यक् मार्ग से उड़ाते हैं, इस को पातन कहते हैं । इस पातन संस्कार से पारद के नाग और वङ्ग से उत्पन्न कंचुकादिक दोष नष्ट हो जाते हैं । वास्तव में खनिज पारद में नाग, वङ्ग हरताल आदि बहुत से पदार्थ मिले रहते हैं । उन


( १ ) नागो वङ्गो मलोवह्निश्वापल्यञ्च विषंगिरिः ।
असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥

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२३८ रसरत्नसमुच्चये—

पदार्थों से पारद को मुक्त करने के लिये शास्त्रकारों ने तीन प्रकार के पातनों का निर्देश किया है । पारद के अन्दर यह गुण है कि वह अग्नि लगते ही जिधर भी उसे मार्ग मिले उधर ही उड़ जाता है, किन्तु अन्य पदार्थ इस शक्ति से रहित हैं । जब पारद का ऊर्ध्वपातन करते हैं तब वह ऊपर उड़ जाता है किन्तु उसके साथ २ हरताल (आर्सेनिक) भी ऊपर उड़ता है इसलिये पारद का तिर्यक् पातन करते हैं । हरताल का तिर्यक् पातन नहीं होता है, इस तरह पारद हरताल से मुक्त हो जाता है। ऊर्ध्व पातन से अन्य नागादिक दोष नीचेही रह जाते हैं । इस वास्ते अशुद्ध पारद (हिङ्गुलोत्थ पारद से भिन्न) का तीनों प्रकार से पातन करना आवश्यक है ॥ ६७ ॥

अथ रोधनलक्षणम्—

जलसैन्धवयुक्तस्य रसस्य दिवसत्रयम् ।
स्थितिरास्थापनी कुम्भे याऽसौ रोधनमुच्यते ॥ ६८ ॥

मिट्टी के घड़े में पानी और सैन्धानमक भरकर पारद को किसी दृढ वस्त्र में बांधकर या ऐसे ही तीन दिन तक पड़ा रहने देते हैं । यह क्रिया स्वेदन मूर्च्छनादिक संस्कारों से षण्ढभावापन्न पारद के दोषों को नष्ट कर उत्कृष्टगुणों का उसमें आस्थापन (उत्पादन) करती है और इसको रोधनसंस्कार कहते हैं ॥ ६८ ॥

नियमनलक्षणम्—

रोधनाल्लब्धवीर्यस्य चपलत्वनिवृत्तये ।
क्रियते पारदे स्वेदः प्रोक्तं नियमनं हि तत् ॥ ६९ ॥

रोधन संस्कार से उत्कृष्ट शक्ति को प्राप्त हुए पारद के चपल दोष को नष्ट करने के लिये सर्पाक्षी इत्यादि नियामकगण(१) की औषधों के स्वरस में पारद का स्वेदन करते हैं, उसको नियमन संस्कार(२) कहते हैं ॥ ६९ ॥


( १ ) नियामकगण—
महाबला नागबला यमचित्रा पुनर्नवा ।
आखुकर्णी सहचरा वासिका काकमाचिका ॥ १ ॥
गोक्षुरः शरपुङ्खा च विष्णुक्रान्ता घनध्वनिः ।
मण्डूकपर्णी तुलसी बला च गिरिकर्णिका ॥ २ ॥

( २ ) यथा—
सर्पाक्षीचित्रिका कन्या भृङ्गारकनकाम्बुभिः ।
दिनं संस्वेदितः सूतो नियमात् स्थिरतां व्रजेत् ।

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-अष्टमोऽध्यायः। २३९

— दीपनलक्षणम् — धातुपाषाणमूलाद्यैः संयुक्तो घटमध्यगः। ग्रासार्थं त्रिदिनं स्वेदो दीपनं तन्मतं बुधैः॥ ७० ॥ पारद का दोलायन्त्र के द्वारा धातु, उपधातु, पाषाण या अन्य दीपनद्रव्यों (औषध) के साथ स्वर्णादिक को ग्रास करने की शक्ति बढ़ाने के लिये तीन दिन तक स्वेदन किया जाता है, इसको विद्वान् दीपनसंस्कार कहते हैं ॥ ७० ॥

अथ ग्रासमानम्— इयन्मानस्य सूतस्य भोज्यद्रव्यात्मिका मितिः। इयतीत्युच्यते याऽसौ ग्रासमानं समीरितम् ॥ ७१ ॥ इतनी मात्रा में पारद इतनी मात्रा वाले स्वर्ण अभ्रक आदि पदार्थ को ग्रसित कर सकता है, इस प्रकार जो माननिर्देश किया जाता है उसको ग्रासमान कहते हैं ॥७१॥

अथ जरणाभेदनिर्देशः— ग्रासस्य चारणं गर्भे द्रावणं जारणं तथा। इति त्रिरूपा निर्दिष्टा जारणावरवार्तिकैः॥ ७२ ॥ ग्रासः पिण्डः परिणामस्तिस्रश्चाख्याः पराः पुनः॥ ७३ ॥ समुखा निर्मुखा चेति जारणा द्विविधा पुनः॥ ७४ ॥ पारद के अन्दर ग्रासयोग्य स्वर्ण आदि का विना अग्नि संयोग के मिलाने को चारण और अग्नि संयोग से ग्रास तथा योग्य पदार्थ को द्रव करके मिलाने को द्रावण तथा रस के अन्दर ग्रासयोग्य द्रवीभूत स्वर्णादिक को मिलाकर विड्यन्त्रादि योग से (किसी काष्ठ औषधि के साथ) पाक करने को जारण कहते हैं। इस तरह रस परिभाषा को बनाने वाले विद्वानों ने तीन प्रकार का जारणसंस्कार कहा है। इसी के अन्य नाम ग्रास (पारद अन्य वस्तु को कवलित कर ले), पिण्ड (पिण्ड स्वरूप का जारण) तथा परिणाम (अवस्थान्तरप्राप्तिरूपजारण) हैं फिर जारणा के संमुखजारणा और निर्मुखजारणा ये दो भेद होते हैं ॥ ७२-७४ ॥


शतावरी शङ्खपुष्पी श्वेतार्कः कनकाह्वयः। चक्रमर्दः करञ्जश्च ब्रह्मदण्डी शिखण्डिनी ॥ ३ ॥ गुडूची सैन्धवं पाठा मृगाक्षी सोमवल्लिका। नियामकगणो ह्येषः प्रोक्तो रसविशारदैः ॥ ४ ॥

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२४० रसरत्नसमुच्चये—

निर्मुखजारणालक्षणम्—

निर्मुखा जारणा प्रोक्ता बीजाऽऽदानेन भागशः ॥ ७५ ॥

आगे कहे हुए मुख से रहित (अर्थात् पारद में चतुःषष्ठ्यंश भाग बीज न मिलाया जाय) भिन्न २ जारण में यथानिर्दिष्ट भाग से बीज का मिलाना या प्रक्षेप करना चाहिए, इसी को निर्मुखजारणा कहते हैं ॥ ७५ ॥

अथ बीजादिनिर्देशः—

शुद्धं स्वर्णं च रूप्यं च बीजमित्यभिधीयते ॥ ७६ ॥
शुद्ध स्वर्ण और शुद्ध रूपे को बीज कहते हैं ॥ ७६ ॥

मुखलक्षणम् —

चतुःषष्ठ्यंशतो बीजप्रक्षेपो मुखमुच्यते ॥ ७७ ॥
पारद के अन्दर शुद्ध स्वर्ण या शुद्ध रौप्य को पारद की अपेक्षा ६४ भाग की मात्रा में मिलाने को मुख कहते हैं ॥ ७७ ॥

सम्मुखजारणालक्षणम्—

एवं कृते रसो ग्रासलोलुपो मुखवान् भवेत् ।
कठिनान्यपि लोहानि क्षमो भवति भक्षितुम् ॥
इयं हि सम्मुखा प्रोक्ता जारणा मृगचारिणा ॥ ७८ ॥

इस तरह पारद के अन्दर ६४ वें भाग की मात्रा में बीज के मिला देने पर वह मुखवाला होकर अन्य लोह अभ्रक इत्यादि कठिन धातुओं को ग्रसित (भक्षण) करने के लिये समर्थ हो जाता है, इसी को मृगचारी नाम वाले किसी विद्वान् ने सम्मुखजारणा कही है ॥ ७८ ॥

अथ राक्षसवक्त्ररसलक्षणम्—

दिव्यौषधिसमायोगात्स्थितः प्रकटकोष्ठिषु ।
भुञ्जीताखिललोहाद्यं योऽसौ राक्षसवक्त्रवान् ॥ ७९ ॥

दिव्य औषधियों के साथ या मनःशिला के साथ मिलाकर खुले मुख वाली कोष्ठिका (यंत्र) में यदि पारा रखा जाय तो वह सम्पूर्ण लोहादि धातुओं को अपने अन्दर मिलाने में समर्थ हो जाता है, ऐसे पारद को राक्षसमुखी पारद कहते हैं अर्थात् जैसे राक्षस सबको खा जाता है उसी तरह पारद भी अत्यन्त बुभुक्षित हो जाता है ॥ ७९ ॥

अष्टमोऽध्यायः । २४१

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अष्टमोऽध्यायः । २४१

चारणालक्षणम्— रसस्य जठरे ग्रासत्क्षपणं चारणा मता ॥ ८० ॥ पारद के अन्दर किसी ग्रास करने योग्य लोहादि धातु के मिलाने या रस के साथ उसको मिश्रित करने को चारणा कहते हैं ॥ ८० ॥

गर्भद्रुतिलक्षणम्— ग्रस्तस्य द्रावणं गभ गर्भद्रुतिरुदाहृता ॥८१ ॥ 'पारद के अन्दर ग्रसित हुआ लोहादिक पदार्थ अग्नि संयोग से द्रुत होकर उसमें मिल जाते हैं इस को गर्भद्रुति कहते हैं' ॥ ८१ ॥

बाह्यद्रुतिलक्षणम्— बहिरेवं द्रुतिं कृत्वा घनसत्त्वादिकं खलु । जारणाय रसेन्द्रस्य सा बाह्यद्रुतिरुच्यते ॥ ८२ ॥ अभ्रक का सत्त्व या अन्य लोहादिकों की भस्म को पृथक् द्रव कर के पारद के अन्दर जारण करने के लिये मिलाया जाता है, इस क्रियाको बाह्यद्रुति कहते हैं॥८२॥

द्रुतेर्भेदाः— निर्लेपत्वं द्रुतत्वं च तेजस्त्वं लघुता तथा । असंयोगश्च सूतेन पञ्चधा तिलक्षणम् ॥ ८३ ॥ १ द्रव पदार्थ के साथ अच्छी तरह मिल जाना या अन्य मलसंसर्ग से रहित होना, २ विशेष रूप से पतला हो जाना, ३ पूर्व स्वरूप की अपेक्षा उत्तम रूप हो जाना, ४ स्वाभाविक गुरुता से कुछ लघुता आजाना, ४ पारद के साथ पृथक होकर दिखाई देना, ये ५ द्रुति के लक्षण हैं ॥ ८३ ॥

द्रुतेः स्वरूपम्— औषधाध्मानयोगेन लोहधात्वादिकं तथा । सन्तिष्ठते द्रवाकारं सा द्रुतिः परिकीर्तिता ॥ ८४ ॥ द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ सप्त या अष्ट प्रकार के लोह, रत्न, उपरत्न इत्यादि पदार्थ अग्नि में द्रव होकर किसी के साथ लिप्त न होते हुए उसी रूप में स्थित रहते हैं इसी को द्रुति कहते हैं ॥ ८४ ॥

अथ जारणाभेद-जारणालक्षणम्— द्रुतग्रासपरीणामो विडयन्त्रादियोगतः । रस० १६

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२४२ | रसरत्नसमुच्चये—

जारणेत्युच्यते तस्याः प्रकाराः सन्ति कोटिशः ॥ ८५ ॥
आगे कहे जाने वाले विड्यंत्र मूषायन्त्र इत्यादि के द्वारा द्रुत हुए स्वर्णादिक प्रसित पदार्थ का पारे के साथ जो पाक किया जाता है उसको जारणा कहते हैं, इसके करोड़ों भेद हैं ॥ ८५ ॥

अथ विडादिलक्षणम्—

क्षारैरम्लैश्च गन्धाद्यैर्मूत्रैश्च पटुभिस्तथा ।
रसग्रासस्य जीर्णार्थं तद्विडं परिकीर्तितम् ॥ ८६ ॥
क्षार ( यवक्षारादिक ) अम्लपदार्थ ( काञ्जी ) गन्धक आदि धातु, गोमूत्र, और पांचो प्रकार के लवण इनके सहयोग से पारद में मिलि हुई स्वर्णादिक धातु का जारण करते हैं, इसको विडयन्त्र कहते हैं ॥ ८६ ॥

रञ्जनलक्षणम्—

सुसिद्धबीजधात्वादि-जारणेन रसस्य हि ।
पीतादिरागजननं रञ्जनं परिकीर्तितम् ॥ ८७ ॥
उत्तम प्रकार से सिद्ध किये हुए बीज ( स्वर्ण और रौप्य ) तथा धातुओं के साथ पारद का जारण करके उसमें जो पीत रक्त इत्यादि रंग उत्पन्न करते हैं इसको रञ्जन कहते हैं ॥ ८७ ॥

सारणालक्षणम्—

सूते सतैलयन्त्रस्थे स्वर्णादिक्षेपणं हि यत् ।
वेधाधिक्यकरं लोहे सारणा सा प्रकीर्तिता ॥ ८८ ॥
तैल से भरी हुई अन्धमूषा में पारद डाल कर उसमें स्वर्ण रौप्य आदि धातुओं को डाल कर उनमें वेध करते हैं अर्थात् अद्भुत गुणों का उद्भावन करते हैं इसी को सारणा कहते हैं ॥ ८८ ॥

वेधलक्षणं भेदाश्च—

व्यवायिभेषजोपेतो द्रव्ये क्षिप्तो रसः खलु ।
वेध इत्युच्यते तज्ज्ञैः स चानेकविधः स्मृतः ॥ ८९ ॥
लेपः क्षेपश्च कुन्तश्च धूमाख्यः शब्दसंज्ञकः ॥ ९० ॥
अफीम, भङ्गा, नागवल्ली, कुमारी, धस्तूर इत्यादि व्यवायशक्तिवर्धक पदार्थों के साथ पारद को स्वर्णादि के समान गुण उत्पन्न करने के लिये लोहादिक धातु

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अष्टमोऽध्यायः। २४३

में डालते हैं इसको वेध कहते हैं, और यह वेध अनेक प्रकार का है। लेपवेध, क्षेपवेध,कुन्तवेध धूमवेध, शब्दवेध इस तरह से वेध पाँच प्रकार का होता है॥८९-९०॥

लेपवेधलक्षणम्—

लेपनं कुरुते लोहं स्वर्णं वा रजतं तथा ।
लेपवेधः स विज्ञेयः पुटमत्र च सौरकम् ॥ ९१ ॥

लोह आदि धातुओं पर वेधसामर्थ्य उत्पन्न करने वाली विशेष क्रिया से सिद्ध हुए पारद का लेप करके उस लोहादि धातु को स्वर्ण या रोप्य के रूप में परिवर्तित कर देते हैं इसी को लेपवेध कहते हैं। इस क्रिया में उस धातु पर पारद का लेप कर सौरक पुट ( सूर्य.पुट ) से उसे पकाते हैं ॥ ९१ ॥

क्षेपवेधलक्षणम्—

प्रक्षेपणं द्रते लोहे वेधः स्यात्क्षेपसंज्ञितः ॥ ९२ ॥

किसी रजत या ताम्र इत्यादि को द्रव कर के उस में पारद ( विशेषौषध मिश्रित ) को डालते हैं । इसको क्षेपवेध कहते हैं ॥ ९२ ॥

कुन्तवेधलक्षणम्—

सन्दंशधृतसूतेन द्रुतद्रव्याहतिश्च या ।
सुवर्णत्वादिकरणं कुन्तवेधः स उच्यते ॥ ९३ ॥

किसी धातु को अग्नि में द्रव करके उस द्रवित धातु में मूर्त्तिबद्ध पारद को संदशयंत्र से पकड़ कर डुबाते हैं इससे वह द्रुत धातु ( जिसमें पारद डुबाया जाता है ) सुवर्ण के समान रूप और गुणों को करने लायक हो जाती है इसी को कुन्तवेध कहते हैं ॥ ९३ ॥

धूमवेधलक्षणम्—

वह्नौ धूमायमानेऽन्तः प्रक्षिप्त रसधूमतः ।
स्वर्णाद्यापादनं लोहे धूमवेधः स उच्यते ॥ ९४ ॥

धूप से युक्त वह्नि की भट्टी पर एक कड़ाही रख देनी चाहिए, फिर इसमें पारद डाल देना चाहिए । जब कड़ाही के अन्दर रखे हुए पारद में धूआं निकलने लगे तब उस में अन्य भट्टी पर गले हुए लोह को डाल देते हैं इससे उस धातु में स्वर्ण के गुण धर्म उत्पन्न हो जाते हैं इसको धूमवेध कहते हैं ॥ ९४ ॥

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२४४ | रसरत्नसमुच्चये—

शब्दवेधलक्षणम्—

मुखस्थितरसेनाल्पलोहस्य धमनात्खलु ।
स्वर्णरूप्यत्वजननं शब्दवेधः स कीर्त्तितः ॥ ९५ ॥

किसी लौह आदि धातु के कुछ भाग को अग्नि पर विद्रुत कर उसको मुख में रखे हुए पारद ( वेधसमर्थपारद गोली ) से एकनली के द्वारा फूंक के जोर से धमने से वह धातु स्वर्ण या रौप्य के रूप में परिवर्तित हो जाती है इसको शब्दवेध कहते हैं ॥ ९५ ॥


उद्घाटनलक्षणम्—

सिद्धद्रव्यस्य सूतेन कालुष्यादिनिवारणम् ।
प्रकाशनं च वर्णस्य तदुद्घाटनमीरितम् ॥ ९६ ॥

मृत किये हुए ( भस्म किये हुए ) लोहादिक द्रव्यों की कलुषता (मालिन्य) विशेष रूप से सिद्ध पारद के द्वारा दूर की जाती है और उस मृत लोहादिक के रङ्ग को भी पारद उत्कृष्ट करता है इस को उद्घाटन कहते हैं ॥ ९६ ॥


स्वेदनलक्षणम्—

क्षाराम्लैरौषधैः सार्द्धं भाण्डं रुद्ध्वाऽतियत्नतः ।
भूमौ निखन्यते यत्नात्स्वेदनं सम्प्रकीर्त्तितम् ॥ ९७ ॥

क्षार, अम्ल, ( काञ्जी ) तथा और भी अन्य औषधियों को भाण्ड में भरकर उसमें पारद या अन्य लोह इत्यादि धातु को रख करके भाण्ड का मुख सकोरे से ढक कर कपड़ मिट्टि करके बन्द करदेते हैं फिर उस भाण्ड को पृथ्विी में गाड़ देते हैं, इस को भी स्वेदन यन्त्र कहते हैं । क्योंकि भूमि की आन्तरिक उष्णता से स्वेदन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है ॥ ९७ ॥


संन्यासलक्षणम् ।

रसस्यौषधयुक्तस्य भाण्डरुद्धस्य यत्नतः ।
मन्दाग्नियुतचुल्ल्यन्तः क्षेपः संन्यास उच्यते ॥ ९८ ॥

किसी भाण्ड में क्षार तथा अम्ल भरकर उसमें पारद रख देते हैं । फिर उस भाण्ड के मुख को कपड़मिट्टी से बन्द कर के मन्द २ आंच वाले चूल्हे के उपर रख देते हैं उसको सन्यास कहते हैं ॥ ९८ ॥

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अष्टमोऽध्यायः । २४५

रसस्वेदसंन्यासगुणाः ।

द्वावेतौ स्वेदसंन्यासौ रसराजस्य निश्चितम् ।
गुणप्रभावजनकौ शीघ्रव्याप्तिकरौ तथा ॥ ९९ ॥

स्वेद और सन्यास इन दोनों विधियों से पारद के अन्दर गुण और देह-सिद्धिजनक प्रभाव उत्पन्न होते हैं तथा ये दोनों संस्कार पारद को शरीर में शीघ्र ही व्याप्त होने योग्य बना देते हैं ॥ ९९ ॥


अथ परिभाषाऽऽवश्यकता—

रसनिगममहाब्धेः सोमदेवः समन्तात्
स्फुटतरपरिभाषानामरत्नानि हृत्वा ।
व्यरचयदतियत्नात्तैरिमां कण्ठमालां
कलयतु भिषगग्र्यो मण्डनार्थे सभायाम् ॥ १०० ॥

सोमदेव नामक रसशास्त्र के विशेषज्ञ ने रसशास्त्र रूपी समुद्र से प्रयत्न पूर्वक समग्ररूप से अत्यन्त स्पष्टार्थ बोधक परिभाषाओं की संज्ञा रूपी रत्नों को निकालकर उनकी कण्ठमाला (अर्थात् कण्ठस्थ करने योग्य परिभाषाएं) बनाई है। इस माला को रस शास्त्र के पण्डित सभा में स्वविषय का प्रतिपादन करने के लिये धारण करें ॥ १०० ॥


अध्यायपठनफलम्—

भवेत्पठितवारोऽयमध्यायो रसवादिनाम् ।
रसकर्माणि कुर्वाणो न स मुह्यति कुत्रचित् ॥ १०१ ॥

इति श्री वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये
रसपरिभाषाकथनं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

रस शास्त्र के आचार्यों के मत से परिपूर्ण इस अध्याय का जो विद्वान् बार-म्बार अभ्यास (आवृत्ति) करेगा, वह रस कर्म को करता हुआ किसी विषय में व्यामोहित (किंकर्त्तव्यमूढ) नहीं होगा। अर्थात् वह किसी प्रकार से रसप्रक्रिया में भ्रमित नहीं होता है ॥ १०१ ॥

इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां रसपरिभाषा-
कथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

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१४६ रसरत्नसमुच्चये—

नवमोऽध्यायः ।

अथ यन्त्राणि—

अथ यन्त्राणि वक्ष्यन्ते रसतन्त्राण्यशेषतः ।
समालोच्य समासेन सोमदेवेन साम्प्रतम् ॥ १ ॥

श्री सोमदेव ने सम्पूर्ण रसशास्त्र के भिन्न २ तन्त्रों का अवलोकन करके जो यन्त्र बनाने की विधि कही है, उस विधि से प्रयुक्त होने वाले यन्त्रों का इस स्थान पर संक्षेप से वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥

यन्त्रशब्दनिरुक्तिः—

स्वेदादिकर्मनिर्मातुं वार्तिकेन्द्रैः प्रयत्नतः ।
यन्त्र्यते पारदो यस्मात्तस्माद्यन्त्रमिति स्मृतम् ॥ २ ॥

पारद का स्वेदन, मूर्च्छन, मर्दन आदि अनेक संस्कार करने के लिये जिस उपाय से रस को नियन्त्रित किया जाता है उसको रसपरिभाषाकारक आचार्यों ने यन्त्र कहा है ॥ २ ॥

अथ दोलायन्त्रम्—

द्रवद्रव्येण भाण्डस्य पूरितार्धोदकस्य च ।
मुखस्योभयतो द्वारद्वयं कृत्वा प्रयत्नतः ॥ ३ ॥
तयोस्तु निक्षिपेद्दण्डं तन्मध्ये रसपोटलीम् ।
बद्ध्वा तु स्वेदयेदेतद्दोलायन्त्रमिति स्मृतम् ॥ ४ ॥

काञ्जी, निम्बूस्वरस, क्षार, या जयन्ती आदि स्वेदन करने में उपयुक्त ओषधियों के क्वाथ या स्वरस से एक मिट्टी की हण्डिका को आधी भर करके उस हण्डिका के किनारों पर एक दूसरे के सामने दो छिद्र युक्ति से बनाकर उन में एक लकड़ी लगा देना चाहिये फिर उस लकड़ी के बीच में पारद की पोटली या अन्य स्वेदनीय धातु उपधातु तथा रत्नों की पोटली बांध कर उस द्रव में लटका देते हैं, फिर अग्नि जलाकर चूल्हे पर हण्डिका को रखकर उस पोटली के अन्दर स्थित पदार्थ को स्वेदित करते हैं, इस को दोलायन्त्र कहते हैं । अर्थात् रसादिक की पोटली डोले (झूले) के समान दण्ड में बांधकर लटका दी जाती है, अतः दोलायन्त्र कहा गया है ॥ ३-४ ॥

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नवमोऽध्यायः । २४७

स्वेदनीयन्त्रम्—

साम्बुस्थालीमुखे बद्धवस्त्रे पाक्यं निवेशयेत् ।
पिधाय पच्यते यत्र स्वेदनीयन्त्रमुच्यते ॥ ५ ॥

जल अथवा अन्य ओषधियों के स्वरस से हण्डिका को भरकर उसके मुख पर एक वस्त्र बांध देते हैं, फिर उस वस्त्र के अवकाशयुक्त भाग में किसी धातु रत्न या पारद को रखकर ऊपर से सकोरे द्वारा बन्द करके अग्नि द्वारा पाक किया जाता है उसको स्वेदनी यन्त्र कहते हैं ॥ ५ ॥

अथ पातनायन्त्रम्—

अष्टाङ्गुलपरीणाहमोनाहेन दशाङ्गुलम् ।
चतुरङ्गुलकोत्सेधं तोयाधारं गलादधः ॥ ६ ॥
अधोभाण्डेमुखं तस्य भाण्डस्योपरि वर्त्तिनः ।
षोड़शाङ्गुलविस्तीर्णपृष्ठस्यास्ये प्रवेशयेत् ॥ ७ ॥
पार्श्वयोर्माहिषीक्षीरचूर्णमण्डूरफाणितैः ।
लिप्त्वा विशोषयेत्सन्धि जलधारे जलं क्षिपेत् ।
चुल्ल्यामारोपयेदेतत्पातनायन्त्रमुच्यते ॥ ८ ॥

आठ अङ्गुल चौड़ा ( विस्तृत ), दस अङ्गुल ऊंचा ( लम्बाई में ) और चार अङ्गुल मोटा ( स्थूल ) एक मिट्टी का भाण्ड लेकर उसको जल से भर दें, फिर इस जल से भरे नीचे के भाण्ड के मुख को गर्दन ( किनारे ) तक एक दूसरे १६ अङ्गुल चौड़ो पीठ ( पृष्ठभाग ) वाले ( जिसके भीतर की तली में निम्बू के रस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप सन्धिबन्धन करने के पहिले किया जा चुका हो ) ऊपर के मिट्टी के भाण्ड के मुख में प्रविष्ट कर देना चाहिए । फिर ( उन दोनों भाण्डों के मुखों को परस्पर मिलादेने से डमरू के समान रचना हो जाती है ) उन दोनों की मुखसन्धि को अगल बगल चारों तरफ भैंस के दुग्ध में चूने की बुकनी, मण्डूर की बुकनी और फाणित ( गुड़ की विकृति राब ) को घोट कर उससे लेप कर के सुखा देवे । फिर इस को चूल्हे पर चढ़ाकर अग्नि जला देनी चाहिए । ऊपर के भाण्ड की पीठपर एक जलाधार ( आलवाल ) या थाला ( उड़दी के ओर से ) बनाकर ठण्डाजल भरना चाहिए । ५ मिनिट बाद प्रथम गर्म हुए जलको निकाल कर दूसरा ठण्डा जल भरना चाहिए । यदि आलवाल न बना सके तो एक बा-

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२४८ रसरत्नसमुच्चये—

ल्टी में जलभर कर कपड़े को चारवार मोड़ कर लत्ते बनाकर जल में भिगो कर ऊपरी भाण्ड के पृष्ठ पर रखो कुछ देर बाद इनको बदलते रहना चाहिए । इसी को पातना यन्त्र कहते हैं ॥ ६-८ ॥

अथ अधःपातनयन्त्रम्— अथोर्ध्वभाजने लिप्तस्थापितस्य जले सुधीः । दीप्तैर्वनोत्पलैः कुर्यादधःपातं प्रयत्नतः ॥ ९ ॥

उपर्युक्त विधि से बने हुए पातन यन्त्र के ऊपर वाले भाण्ड में सन्धि बन्धन करने के पहिले निम्बूरस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप कर सुखा लेना चाहिए फिर सन्धिवन्धन करके ऊपर के भाण्ड में एक थाला या पाली बनाकर जङ्गली उपलों को उस पाली में रखकर जला देने चाहिए । इस तरह अग्निके कारण पारद निकल कर नीचे के जल से भरे भाण्ड में गिर जाता है इसको अधः पातन यन्त्र कहते हैं ॥९॥

अथ कच्छपयन्त्रम्— जलपूर्णपात्रमध्ये दत्त्वा घटखर्परं सुविस्तीर्णम् । तदुपरि बिडमध्यगतः स्थाप्यः सूतः कृतः कोष्ठ्याम् ॥ १० ॥ लघुलोहकटोरिकया कृतषण्मृत्सन्धिलेपयाऽऽच्छाद्य । पूर्वोक्तघटखर्परमध्येऽङ्गारैः खदिरकोद्भवैः ॥ ११ ॥ स्वेदनतो मर्दनतः कच्छपयन्त्रस्थितो रसो जरति । अग्निबलेनैव ततो गर्भे द्रवन्ति सर्वसत्त्वानि ॥ १२ ॥

एक जल से भरे हुए पात्र ( नाद ) के मध्य भाग में बड़ा कूंड़ा या घट का गहरा कपाल रख कर उसमें मूषायंत्र को पारे से भर कर रख देना चाहिए। फिर मूषा के ऊपर एक छोटी लोहे की कटोरी ढक कर उसके चारों ओर ६ वार कपड़मिट्टी कर देनी चाहिये । फिर उस घटखर्पर ( कूण्ड या कपाल के खाली भाग में ) में खदिर या बैर ( बदरी काष्ठ ) की लकड़ी के कोयले भर कर अग्नि जला दें, इस तरह स्वेदन और मर्दन दोनों संस्कार होकर इस यन्त्र में रखे हुए पारद का जारण हो जाता है, इसी यन्त्र से अन्य धातुओं का सत्त्वपातन भी करते हैं । इसको कच्छपयन्त्र कहते हैं ॥ १०-१२ ॥

अथ दीपिकायन्त्रम्— कच्छपयन्त्रान्तर्गतमृण्मयपीठस्थदीपिकासंस्थः ।

नवमोऽध्यायः ।

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नवमोऽध्यायः । २४९

यस्मिन्निपतति सूतः प्रोक्तं तद्दीपिकायन्त्रम् ॥ १३ ॥

उपर्युक्त विधि से कच्छप यंत्र बनाकर उसमें एक मिट्टी का खर्पर रख कर उसमें एक दीपिका या मूषा अथवा सकोरा रख देना चाहिए, इस सकोरे में पारद भर दें, फिर अग्नि के प्रभाव से पारद उस दीपिका से कच्छप यंत्र में उड़ कर गिर जाता है, इसको दीपिकायंत्र कहते हैं ॥ १३ ॥

अथ ढेकीयन्त्रम्—

भाण्डकण्ठादधश्छिद्रे वेणुनालं विनिक्षिपेत् ।
कांस्यपात्रद्वयं कृत्वा सम्पुटं जलगर्भितम् ॥ १४ ॥
नलिकास्यं तत्र योग्यं दृढं तच्चापि कारयेत् ।
युक्तद्रव्यैर्विनिक्षिप्तः पूर्वं तत्र घटे रसः ॥ १५ ॥
अग्निना तापितो नालात्तोये तस्मिन् पतत्यधः ।
यावदुष्णं भवेत्सर्वं भाजनं तावदेव हि ।
जायते रससन्धानं ढेकीयन्त्रमितीरितम् ॥ १६ ॥

एक मिट्टी के बड़े भाण्ड में या घड़े में कुछ (स्वेदनोपयोगी) औषधियों (क्षार, अम्ल इत्यादि) के साथ घोटे हुए पारद का लेप करके उस भाण्ड को सुखा लेना चाहिए । पश्चात् उस भाण्ड की ग्रीवा से कुछ नीचे (पास ही) एक छिद्र बनाकर उसमें बांस की नली का एक भाग प्रविष्ट कर भाण्ड का मुख तथा छिद्र के आस पास कपड़मिट्टी कर देना चाहिए । फिर दो कांस्य के पात्रों (कटोरों) का परस्पर सन्धिबन्धन करके ऊपर के पात्र में एक छिद्र बनाकर इसमें उस बांस की नली का दूसरा भाग प्रविष्ट करके मजबूती से सन्धिबन्धन कर देना चाहिए, फिर इस भाण्ड को आसानी से चूल्हे पर चढाकर नीचे आग जलादे, अग्नि के ताप से भाण्ड के अन्दर औषधियों के साथ घोटकर लिप्त किया हुआ पारद उड़कर उस बांस की नलिका में होता हुआ कांसे के पात्र के जल में गिर जायगा । सम्पूर्ण भाण्ड के प्रतप्त हो जाने पर प्रायः सब पारा उड़ जाता है, इसको ढेकी यन्त्र कहते हैं ॥ १४-१६ ॥

अथ जारणायन्त्रम्—

लोहमूषाद्वयं कृत्वा द्वादशाङ्गुलमानतः ।
ईषच्छिद्रान्वितामेकां तत्र गन्धकसंयुताम् ॥ १७ ॥

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२५० रसरत्नसमुच्चये—

मूषायां रसयुक्तायामन्यस्यां तां प्रवेशयेत् । तोयं स्यात्सूतकस्याध ऊर्ध्वाधो वह्निदीपनम् ॥ १८ ॥

१२ अङ्गुल लम्बी दो लोहे की मूषा बना कर एक मूषा में कुछ छिद्र बनवा कर उस में गन्धक भर दें, फिर इस गन्धक युक्त मूषा को पारद से भरी हुई द्वितीय मूषा के अन्दर रख देवे ( पारद जिसमें भरना हो उसको कुछ बड़ी बनवाना चाहिए ) पश्चात् इन दोनों मूषा को एक जल से भरे हुए भाण्ड में रख कर उस भाण्ड को चूल्हे पर चढाकर अग्नि जला देना चाहिए । इसको जारणा यंत्र कहते हैं ॥ १७-१८ ॥

अथ जारणायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्—

रसोनकरसं भद्रे यत्नतो वस्त्रगालितम् । दापयेत्प्रचुरं यत्नादाप्लाव्य रसगन्धकौ ॥ १९ ॥ स्थालीकायां पिधायोर्ध्वं स्थालीमन्यां दृढां कुरु । सन्धिं विलेपयेद्यत्नान्मृदा वस्त्रेण चैव हि ॥ २० ॥ स्थाल्यन्तरे कपोताख्यं पुटं कर्षाग्निना सदा । यन्त्रस्याधः करीषाग्निं दद्यात्तीव्राग्निमेव वा ॥ २१ ॥ एवं तु त्रिदिनं कुर्यात्ततो यन्त्रं विमोचयेत् । तप्तोदके तप्तचुल्ल्यां न कुर्याच्छीतलां क्रियाम् ॥ २२ ॥ न तत्र क्षीयते सूतो न च गच्छति कुत्रचित् । अनेन च क्रमेणैव कुर्याद्गन्धकजारणम् ॥ २३ ॥

हे पार्वति ! एक स्थाली के अन्दर पारद और गन्धक दोनों भर कर वस्त्र से छाने हुए लहसुन के पानी (स्वरस) से उन दोनों को खूब भिगोना ( आप्लावित करना) चाहिए । फिर एक शराव से रस तथा गन्धक को बन्द करके ऊपर एक और स्थाली ढककर दोनों स्थालियों की वस्त्र तथा कपड़मिट्टि से सन्धि अच्छी तरह बन्दकर के यंत्र के नीचे तेज आंच दें तथा यंत्र के ऊपर की स्थाली के ऊपर भी उपलों की आंच से कपोत (१)पुट देना चाहिए, इस तरह तीन दिन


( १ ) कपोतपुटलक्षणम्—
यत्पुटं दीयते खाते अष्टसङ्ख्यैर्वनोपलैः ।
कपोतपुटमेतत्तु कथितं पुटपण्डितैः ॥ १ ॥

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नवमोऽध्यायः । २५१

तक अग्नि देना चाहिए । तीसरे दिन के पश्चात् उष्ण चूल्हे पर गरम जल में यन्त्र को रख कर खोलना चाहिए । यंत्र को शीतल करके नहीं खोलें। इसी क्रम से पारद के साथ गन्धक का जारण करना चाहिए । यह जारणयंत्र का दूसरा स्वरूप है ॥ १९-२३ ॥

अथ विद्याधरयन्त्रम्— यन्त्रं विद्याधरं ज्ञेयं स्थालीद्वितयसम्पुटात् । चुल्लीं चतुर्मुखीं कृत्वा यन्त्रभाण्डं निवेशयेत् ॥ २४ ॥ तत्रौषधं विनिक्षिप्य निरुन्ध्याद्भाण्डकाननम् । यन्त्रं विद्याधरं नाम तन्त्रज्ञैः परिकीर्त्तितम् ॥ २५ ॥

दो मिट्टी की स्थालियों को परस्पर कपड़मिट्टी द्वारा बन्द करने की क्रिया को विद्याधर यंत्र कहते हैं। विधि-एक चार मुख वाला चूल्हा बना कर उस पर औषधादिक से भरा हुआ एक मिट्टी का भाण्ड रखना चाहिए, फिर इस भाण्ड पर एक दूसरा भाण्ड रखकर नीचे के भाण्ड के मुख को ऊपर रखे हुए भाण्ड के तल के साथ कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर देते हैं, फिर अग्नि जलाते हैं। इसको रसशास्त्र के पण्डितों ने विद्याधरयंत्र कहा है ॥ २४-२५ ॥

अथ सोमानलयन्त्रम्— ऊर्ध्वं वह्निरधश्चापो मध्ये तु रससङ्ग्रहः । सोमानलमिदं प्रोक्तं जारयेद्गगनादिकम् ॥ २६ ॥

एक स्थाली के अन्दर जल भर कर उसमें पारद से युक्त मूषा रखकर उस स्थाली के मुख को शराव से बन्द करके कपड़मिट्टी कर देते हैं । पश्चात् उस शराव पर उपलों की आँच देते हैं, इस यंत्र को सोमानल यंत्र कहते हैं। क्यों के नीचे सोम (जल) भरा रहता है, बीच में मूषा के अन्दर रस का संग्रह रहता है, ऊपर अग्नि जलाते हैं अतः इसका नाम सोमानल यंत्र है। पारद के साथ मूषा में अभ्रक आदि रखकर इससे जारण करते हैं ॥ २६ ॥

अथ गर्भयन्त्रम्— गर्भयन्त्रं प्रवक्ष्यामि पिष्टिकाभस्मकारकम् । चतुरङ्गुलदीर्घाञ्च त्र्यङ्गुलोन्मितविस्तराम् ॥ २७ ॥ मृण्मयीं सुदृढां मूषां वर्तुलां कारयेन्मुखम् ।

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२५२ रसरत्नसमुच्चये—

लोणस्य विंशतिर्भागा भाग एकस्तु गुग्गुलाः ॥ २८ ॥
सुश्लक्ष्णं पेषयित्वा तु वारं वारं पुनः पुनः ।
मूषालेपं दृढं कृत्वा लवणाङ्घ्रीमृदम्बुभिः ॥ २९ ॥
कर्षेत्तुषाग्निना भूमौ स्वेदयेन्मृदु मानवित् ।
अहोरात्रं त्रिरात्रं वा रसेन्द्रो भस्मतां व्रजेत् ॥ ३० ॥

नष्टपिष्ट किये हुए पारद की भस्म बनाने के लिये गर्भ यंत्र का वर्णन करते हैं। चार अङ्गुल लम्बी और तीन अङ्गुल चौड़ी मिट्टी की गोल मुखकी दृढ मूषा बनवानी चाहिए, फिर बीस भाग नमक और एक भाग गुग्गुल, दोनों को नमक से आधे भाग मिट्टी तथा जल के साथ घोटकर उस मूषा में लेप करना चाहिए, फिर उस मूषा के अन्दर पारद डालकर उसका मुख बन्दकर देवे। सूखनेके बाद मूषा को पृथ्वी में गाड़कर उसके ऊपर जंगली उपलों की अग्नि देकर एक दिन तक अथवा तीन दिन तक स्वेदन करना चाहिए। प्रायः अग्नि यदि तीन दिन तक देना हो तो मृदु अग्नि जलावे। और यदि एक दिन रात में पाक करना हो तो तीव्र आंच देवे, इस को गर्भयंत्र कहते हैं ॥ २७-३० ॥

अथ हंसपाकयन्त्रम्—

खर्परं सिकतापूर्णं कृत्वा तस्योपरिन्यसेत् ।
अपरं खर्परं तत्र शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ३१ ॥
पञ्चक्षारैस्तथा मूत्रैर्लवणं च विडं ततः ।
हंसपाकं समाख्यातं यन्त्रं तद्वार्त्तिकोत्तमैः ॥ ३२ ॥

एक मिट्टीके खर्पर (कुण्डा) को वालुका (रेते) से भरकर ऊपरसे दूसरा खर्पर रख कर ढक देते हैं, और इस में पारद को (१)पांचोक्षार, आठों (२)प्रकार के मूत्र तथा लवण विशेष कर विड़लवण इत्यादि पदार्थों के साथ पाक करते हैं। इस यंत्र को रसपरिभाषाकार पण्डितों ने हंसपाक यन्त्र कहा है ॥ ३१-३२ ॥


( १ ) यवमुष्ककसर्जानीं पलाशतिलयोस्तथा ।
क्षारैस्तु पञ्चभिः प्रोक्तः पञ्चक्षाराभिधोगणः ॥
( २ ) सैरिभाजाविकरभगोखरद्विपवाजिनाम् ।
मूत्राणीति भिषग्वर्यै र्मूत्राष्टकमुदाहृतम् ॥

नवमोऽध्यायः । २५३

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नवमोऽध्यायः । २५३

अथ बालुकायन्त्रम्—

सरसां गूढवक्त्रां मृद्वस्त्राङ्गुलघनावृताम् ।
शोषितां काचकलशीं त्रिषु भागेषु पूरयेत् ॥ ३३ ॥
भाण्डे वितस्तिगम्भीरे वालुकासुप्रतिष्ठिता ।
तद्भाण्डं पूरयेत्त्रिभिरन्याभिरवगुण्ठयेत् ॥ ३४ ॥
भाण्डवक्त्रं मणिकया सन्धिं लिम्पेन्मृदा पचेत् ।
चुल्ल्यां तृणस्य चादाहान्मणिकापृष्ठवर्त्तिनः ॥
एतद्धि बालुकायन्त्रं तद्यन्त्रं लवणाश्रयम् ॥ ३५ ॥

प्रथम एक आतसी शीशी को मुल्तानीमिट्टी के अन्दर लिप्त किये हुये वस्त्रों की एक तह (आवरण) चढाकर सुखा लेवे, इस तरह शीशी को सुखा कर सात बार कपड़ मिट्टी लगाकर उसे एक अङ्गुल मोटी बना लेवे' इस आतसी शीशी का मुख पतला होना चाहिए, फिर इसके तीन भाग को रस (पारदकज्जली) से भर कर तीन भाग में बालुका से भरी हुई एक नांदमें (लोहे की या मिट्टी की हो) आतसी शीशी को रख कर उस नांद को शराव अथवा अन्य बड़े कुण्डे से ढक कर सन्धि को कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर देना चाहिए, पश्चात् इस यंत्र को चूल्हे पर चढा कर पाक करे' । जब उस शराव पर तृणों को रखने से वे जलने लगें तब पाक हुआ समझना चाहिए । इसको बालुकायंत्र कहते हैं । यदि रेत के स्थान में लवण भर दिया जाय तो उसे लवण यंत्र कहते हैं ॥ ३३-३५ ॥

अथ बालुकायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्—

पञ्चाढवालुकापूर्णभाण्डे निक्षिप्य यत्नतः ।
पच्यते रसगोलाद्यं बालुकायन्त्रमीरितम् ॥ ३६ ॥

किसी एक भाण्ड में ५ आढक रेती भर कर उसके अन्दर ही शराव में सम्पुटित हुए पारद को रखकर पकाते हैं, इसको भी बालुका यंत्र कहते हैं ॥ ३६ ॥

अथ लवणयन्त्रम्—

एवं लवणनिक्षेपात्प्रोक्तं लवणयन्त्रकम् ॥ ३७ ॥

इसी तरह यदि बालू के स्थान में लवण भर दिया जाय तो वह लवण यंत्र कहलाता है ॥ ३७ ॥

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२५४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ प्रकारान्तरम्—

अन्तः कृतरसालेपताम्रपात्रमुखस्य च ।
लिप्त्वा मृल्लवणेनैव सन्धिं भाण्डतलस्य च ॥ ३८ ॥
तद्भाण्डं पटुनाऽऽपूर्य क्षारैर्वा पूर्ववत्पचेत् ।
एवं लवणयन्त्रं स्याद्रसकर्मणि शस्यते ॥ ३९ ॥

किसी एक ताम्र के पात्र के अन्दर औषधों के साथ पारद को घोट कर लेप करके उस पात्र को सुखाकर एक मिट्टी के अन्दर औंधा करके रख दें । फिर उस ताम्रपात्र के मुख को उस भाण्ड या कूण्डे की तली के साथ मिट्टी तथा लवण की पिष्ठी बनाकर उससे उन दोनों का सन्धिवन्धन करना चाहिए । फिर उस भाण्ड तथा ताम्र पात्र को वालुका अथवा क्षार या लवण से भर कर पकाना चाहिए । इसको भी लवणयंत्र कहते हैं । इस तरह का लवणयंत्र रसकर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ३८-३९ ॥

अथ नालिकायन्त्रम्—

लोहनालगतं सूतं भाण्डे लवणपूरिते ।
निरुद्धं विपचेत्प्राग्वन्नालिकायन्त्रमीरितम् ॥ ४० ॥

एक लोह की नली बनवाकर उसमें उपयुक्त औषधों के साथ पारद को भर कर उसका मुख बन्द कर के लवण यंत्र के मध्य में गाड़ दें । फिर लवण यंत्र के मुख को सकोरे द्वारा कपड़मिट्टी से बन्द करके पकाना चाहिए । इसको नालिकायंत्र कहते हैं ॥ ४० ॥

अथ भूधरयन्त्रम्—

वालुकागूढसर्वाङ्गां गर्ते मूषां रसान्विताम् ।
दीप्तोत्पलैः संवृणुयाद्यन्त्रं तद्भूधराह्वयम् ॥ ४१ ॥

पृथ्वी में एक हाथ गहरा गड्ढा खोद कर उसको वालुका से आधा भर दें, फिर उस वालुका पर औषध युक्त पारद से भरी हुई मूषा रख दें । मूषाका मुख बन्द कर के ऊपर से उस मूषा को रेत से ढक कर उस पर जंगली उपलों को जला देना चाहिए, इसको भूधर यंत्र कहते हैं ॥ ४१ ॥

अथ पुटयन्त्रम्—

शरावसम्पुटान्तःस्थं करीषेष्वग्निमानवित् ।
पचेच्चुल्ल्यां द्वियामं वा रसं तत्पुटयन्त्रकम् ॥ ४२ ॥

नवमोऽध्यायः । २५५

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नवमोऽध्यायः । २५५

एक सकोरे के अन्दर औषधमिश्रित पारद भर कर उस सकोरे को दूसरे सकोरे के साथ सम्पुट करके कपड़मिट्टी कर सुखा लेवे, फिर उस सम्पुट को उपलों की आँच अथवा चूल्हे पर रखकर यथाप्रमाण के अनुकूल समय तक या दो प्रहर तक पकाना चाहिए । इसको पुटयंत्र कहते हैं ॥ ४२ ॥

अथ कोष्ठीयन्त्रम्—

षोडशाङ्गुलविस्तीर्णं हस्तमात्रायतं समम् ।
धातुसत्त्वनिपातार्थं कोष्ठीयन्त्रमिति स्मृतम् ॥ ४३ ॥

सोलह अङ्गुल चौड़ी और एक हाथ भर लम्बी तथा समान आकार की एक मूषा बनवाना चाहिए । इसको कोष्ठीयंत्र कहते हैं । यह यंत्र धातु तथा रत्न इत्यादि के सत्त्वों को निकालने के लिये उत्तम होता है ॥ ४३ ॥

अथ वलभीयन्त्रम्—

यत्र लोहमये पात्रे पार्श्वयोर्वलयद्वयम् ।
तादृक् स्वल्पतरं पात्रं वलयप्रोतकोष्ठकम् ॥ ४४ ॥
पूर्वपात्रोपरि न्यस्य स्वल्पपात्रे परिक्षिपेत् ।
रसं सम्मूर्च्छितं स्थूलपात्रमापूर्य काञ्जिकैः ॥ ४५ ॥
द्वियामं स्वेदयेदेवं रसोत्थापनहेतवे ।
एतत्स्याद्वलभीयन्त्रं रसे षाड्गुण्यकारकम् ॥
सूक्ष्मकान्तमये पात्रे रसः स्याद्गुणवत्तरः ॥ ४६ ॥

एक बड़े आकार का कान्तलौह का पात्र (राउण्ड टव) बनवा कर उसके भीतर की ओर किनारों से कुछ नीचे दोनों पाश्र्वों में दो कड़े लगवा देना चाहिये । फिर एक दूसरा छोटा पात्र (राउण्ड टव) बनवा कर उसके बाह्य भाग के बीच में दोनों ओर दो कड़े लगवा देना चाहिए, इस छोटे पात्र को बड़े पात्र के अन्दर रख कर दोनों के कड़ों को परस्पर जञ्जीर से बांध दें । बड़े पात्र में काञ्जी और छोटे पात्र में सम्मूर्च्छित पारद डाल कर ऊपर से ढक देना चाहिये । फिर इस यंत्र को चूल्हे पर चढ़ा कर दो प्रहर तक स्वेदन करते हैं इस तरह के स्वेदन से संमूर्च्छित पारद फिर अपने रूप को प्राप्त हो जाता है । यह वलभीयंत्र कहा जाता है । इससे स्वेदित पारदके अन्दर ६ प्रकारके विद्या, वितर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता, क्रिया आदि गुण उत्पन्न होते हैं । साधारण लौहे की अपेक्षा सूक्ष्म कान्तलौह

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२५६ रसरत्नसमुच्चये—

के बने हुए पात्रमें रसका स्वेदन करने से वह अधिक गुणों वाला हो जाता है॥४४-४६॥

अथ तिर्यक्पातनयन्त्रम्—

क्षिपेद्रसं घटे दीर्घनताधोनालसंयुते ।
तन्नालं निक्षिपेदन्यघटकुड्यन्तरे खलु ॥ ४७ ॥
तत्र रुध्वा मृदा सम्यग्वदने घटयोरथ ।
अधस्ताद्रसकुम्भस्य ज्वालयेत्तीव्रपावकम् ॥ ४८ ॥
इतरस्मिन्घटे तोयं प्रक्षिपेत्स्वादु शीतलम् ।
तिर्यक्पातनमेतद्धि वार्तिकैरभिधीयते ॥ ४९ ॥

एक मिट्टी के घड़े में रस रखकर उसकी ग्रीवा के कुछ नीचे के भाग में एक छिद्र बना कर उस छिद्र में एक लम्बी तथा टेढी नली लगा देनी चाहिए। फिर उस नली के दूसरे भाग को एक दूसरे घड़े के मध्यभाग में छिद्र बनाकर उसमें प्रविष्ट कर देवें। फिर दोनों घड़ों के मुख तथा नालीप्रवेशजन्य छिद्रों को कपड़ मिट्टी द्वारा बन्द कर देना चाहिए। पश्चात् जिस घड़े में पारद रखा हो उसके नीचे अग्नि जला देवें और दूसरे पात्र के ऊपर शीतल जल डालते रहना चाहिए अथवा इस घड़े में मुखबन्धन के पूर्व ही थोड़ा सा शीतल जल भर देना चाहिए। इस तरह अग्नि के ताप से पूर्व घट से पारद उड़ कर तिर्यक् नली के द्वारा वह दूसरे घट के अन्दर पानी में गिर जाता है। वार्त्तिककारों ने इस यन्त्र को तिर्यक्पातन यन्त्र कहा है ॥ ४७-४९ ॥

अथ पालिकायन्त्रम्—

चषकं वर्त्तुलं लौहं विनताग्रोध्वर्दण्डकम् ।
एतद्धि पालिकायन्त्रं बलिजारणहेतवे ॥ ५० ॥

लोहे का एक गोल चषक (प्याला) बनाकर उसके किनारे के पास ही अग्र-भाग में झुका हुआ और ऊपर की ओर उठा हुआ एक दण्ड लगवा देना चाहिए। इसको पालिकायंत्र कहते हैं। यह यंत्र गन्धक के जारण करने में उपयोगी होता है ॥५०॥

अथ घटयन्त्रम्—

चतुष्प्रस्थजलाधारश्चतुरङ्गुलिकाऽऽननः ।
घटयन्त्रमिदं प्रोक्तं तदाप्यायनकं स्मृतम् ॥ ५१ ॥

एक ऐसा घट लेना चाहिए जिसमें चार प्रस्थ (६४ पल) पानी का समा-